
देहरादून। उत्तराखंड में आउटसोर्सिंग के माध्यम से वर्षों से सेवाएं दे रहे उपनल (UPNAL) कर्मचारियों के भविष्य और रिक्त पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया को लेकर एक नया मोड़ आ गया है। प्रदेश के कार्मिक विभाग द्वारा जारी एक ताजा आदेश ने न केवल शासन के गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि सियासी पारे को भी गरमा दिया है। इस आदेश के तहत अब उन पदों पर सीधी भर्ती के लिए अधियाचन (Requisition) भेजना आसान नहीं होगा, जिन पर वर्तमान में उपनल कर्मी तैनात हैं।
क्या है कार्मिक विभाग का नया फरमान?
कार्मिक विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, प्रदेश के सभी विभागाध्यक्षों को अब उन पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया शुरू करने से पहले तीन प्रमुख विभागों— कार्मिक, वित्त और न्याय—से अनिवार्य रूप से अनुमति लेनी होगी। यह नियम विशेष रूप से उन पदों के लिए प्रभावी होगा, जहाँ वर्तमान में उपनल के माध्यम से कर्मचारी कार्य कर रहे हैं, लेकिन वे पद मूल रूप से सीधी भर्ती के श्रेणी में आते हैं।
अब तक की व्यवस्था में विभाग रिक्तियों का विवरण सीधे चयन आयोगों को भेज देते थे, लेकिन अब इसे एक बहुस्तरीय और जटिल प्रक्रिया बना दिया गया है। जानकारों का मानना है कि इस ‘फिल्टर’ के लगने से नई भर्तियों की गति पर असर पड़ सकता है, लेकिन सरकार इसे कानूनी पेचीदगियों से बचने का रास्ता बता रही है।
अस्थाई व्यवस्था बनाम स्थाई पद: एक पुराना संघर्ष
उत्तराखंड में उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड) के माध्यम से हजारों युवा और पूर्व सैनिक विभिन्न विभागों में डाटा एंट्री ऑपरेटर, चालक और चतुर्थ श्रेणी जैसे पदों पर तैनात हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश पद ‘स्थाई प्रकृति’ के हैं। नियमानुसार इन पदों को लोक सेवा आयोग या अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से भरा जाना चाहिए।
वर्षों से इन पदों पर कार्य कर रहे कर्मियों की मांग है कि उन्हें नियमित किया जाए, जबकि सरकार पर रिक्त पदों को स्थाई भर्ती से भरने का संवैधानिक दबाव है। कार्मिक विभाग का हालिया आदेश इसी कशमकश के बीच एक मध्यमार्ग खोजने की कोशिश नजर आता है।
न्यायिक लड़ाई और ‘समान कार्य-समान वेतन’ का पेंच
उपनल कर्मियों का यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक लंबी कानूनी लड़ाई का भी हिस्सा है। साल 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि उपनल कर्मियों को नियमित किया जाए और उन्हें ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ (Equal Pay for Equal Work) का लाभ मिले।
राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिससे नियमितीकरण की प्रक्रिया पर तो ब्रेक लग गया, लेकिन हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने ‘समान वेतन’ की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। हालांकि, इसके लिए प्रस्तावित नए अनुबंधों को कर्मचारियों ने यह कहकर ठुकरा दिया कि यह उनकी सेवाओं को सीमित करने की एक साजिश है।
सरकार की मंशा: सुरक्षा या सावधानी?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि सरकार इस आदेश के जरिए “चेक एंड बैलेंस” की नीति पर चल रही है। उत्तराखंड उपनल कर्मी समाचार के केंद्र में इस समय सबसे बड़ा डर कानूनी अवमानना का है। चूंकि मामला अभी भी न्यायालयों में विचाराधीन है, इसलिए वित्त और न्याय विभाग की अनुमति अनिवार्य कर सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भविष्य में किसी भी भर्ती प्रक्रिया को अदालत में चुनौती न दी जा सके।
दूसरी ओर, कैबिनेट मंत्री खजान दास का कहना है कि सरकार कर्मचारियों के हितों के प्रति संवेदनशील है। उनके अनुसार, “यह आदेश प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने और किसी भी संभावित कानूनी बाधा को दूर करने के लिए लिया गया है। हम चाहते हैं कि जो भी कदम उठे, वह भविष्य में कर्मियों के लिए भी हितकारी हो।”
कर्मचारी संगठनों का रुख: उम्मीद और आशंका
उपनल कर्मचारी नेताओं के बीच इस आदेश को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया है। कर्मचारी नेता विनोद कवि का तर्क है कि सरकार को अब घुमावदार आदेशों के बजाय एक स्पष्ट ‘नियमितीकरण नियमावली’ लानी चाहिए। उन्होंने कहा, “दशकों से अपनी जवानी प्रदेश की सेवा में झोंकने वाले कर्मचारियों को अब भी फाइलों और अनुमतियों के चक्रव्यूह में उलझाना न्यायसंगत नहीं है।”
वहीं, कुछ कर्मचारियों का मानना है कि भर्ती प्रक्रिया को जटिल बनाकर सरकार परोक्ष रूप से वर्तमान में कार्यरत उपनल कर्मियों को लंबे समय तक बनाए रखने का आधार तैयार कर रही है। यदि सीधी भर्ती का अधियाचन वित्त या न्याय विभाग के स्तर पर रुकता है, तो स्वाभाविक रूप से उपनल कर्मियों की सेवाएं जारी रहेंगी।
कार्मिक विभाग के इस आदेश ने उत्तराखंड की नौकरशाही के सामने एक नई चुनौती पेश कर दी है। एक तरफ बेरोजगार युवाओं का दबाव है जो सीधी भर्ती के जरिए स्थाई नौकरी चाहते हैं, तो दूसरी तरफ वे हजारों उपनल कर्मी हैं जो व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कार्मिक, वित्त और न्याय विभाग मिलकर इन पदों पर क्या निर्णय लेते हैं।
फिलहाल, इस आदेश ने इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड में ‘आउटसोर्स बनाम स्थाई भर्ती’ की यह जंग अभी थमने वाली नहीं है। उत्तराखंड उपनल कर्मी समाचार आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति का एक मुख्य केंद्र बिंदु बना रहेगा।



