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होर्मुज़ की नाकेबंदी पर भड़का चीन, अमेरिका को दी ‘गंभीर परिणामों’ की सीधी चेतावनी

बीजिंग/वाशिंगटन। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के सुलगते हालातों के बीच अब दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां आमने-सामने आ गई हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनातनी में चीन की ‘आक्रामक एंट्री’ ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़, जिसे दुनिया की ‘तेल की नस’ कहा जाता है, उसकी संभावित नाकेबंदी को लेकर चीन ने पहली बार अमेरिका को कड़े लहजे में चेतावनी दी है। बीजिंग ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने व्यापारिक हितों और ईरान के साथ अपने संबंधों में किसी भी तीसरे देश की ‘दादागीरी’ बर्दाश्त नहीं करेगा।

तीसरे देश की दादागीरी का अंत: चीन की सख्त हुंकार

चीन के रक्षा मंत्री डॉन्ग जुन ने हालिया बयान में वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को हिला कर रख दिया है। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा, “चीन किसी भी देश के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।” यह सीधा हमला अमेरिका पर था, जो पिछले कुछ समय से ईरान की घेराबंदी तेज कर रहा है।

चीन के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ का खुला रहना उसकी अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है। डॉन्ग जुन ने चेतावनी दी कि यदि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न की गई, तो चीन चुप नहीं बैठेगा और अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘उचित कार्रवाई’ करेगा। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी अमेरिकी रुख को ‘गैर-जिम्मेदाराना’ करार देते हुए कहा कि होर्मुज़ की नाकेबंदी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी की आग में झोंक सकती है।

ट्रंप की 50% टैरिफ की धमकी और चीन का पलटवार

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चीन को आगाह किया था कि यदि उसने ईरान को हथियारों की आपूर्ति जारी रखी, तो चीनी उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लगा दिया जाएगा। हालांकि, बीजिंग ने इस आर्थिक धमकी के आगे झुकने से इनकार कर दिया है।

इस चीन-अमेरिका तनाव 2026 के बीच चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने एक नया और सख्त आदेश जारी किया है। इस आदेश के तहत, यदि कोई भी देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर चीन की संप्रभुता, सुरक्षा या विकास के हितों को चोट पहुँचाता है, तो बीजिंग उसके खिलाफ ‘काउंटर-मेजर’ (जवाबी कार्रवाई) करेगा। यह आदेश सीधे तौर पर अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ युद्ध के जवाब में देखा जा रहा है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी दुनिया को संदेश देते हुए कहा कि चीन अब वो देश नहीं रहा जिसे डराकर झुकाया जा सके। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय नियमों की दुहाई देते हुए विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की नसीहत दी है।

UAE को खरी-खरी: “हम तय करेंगे अपने दोस्त”

चीन ने केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि अपने करीबी व्यापारिक साझेदार संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को भी स्पष्ट संदेश दिया है। अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान की बीजिंग यात्रा के दौरान जब उन्होंने चीन-ईरान संबंधों पर चिंता जताई, तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्पष्ट कर दिया कि दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन UAE चीन की विदेश नीति और अन्य देशों से संबंधों की दिशा तय नहीं कर सकता।

जिनपिंग ने खाड़ी देशों को सुझाव दिया कि वे ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक मतभेदों को भुलाकर संबंध सुधारें, क्योंकि मिडिल ईस्ट की स्थिरता पूरे विश्व के लिए अनिवार्य है। चीन की यह रणनीति क्षेत्र में अमेरिका के पारंपरिक प्रभाव को कम करने और खुद को एक ‘शांतिदूत’ व ‘सशक्त विकल्प’ के रूप में स्थापित करने की है।

ऊर्जा सुरक्षा का गणित: क्यों अड़ा है चीन?

चीन की इस आक्रामकता के पीछे ठोस आर्थिक कारण हैं। मिडिल ईस्ट में चीन का वार्षिक व्यापार करीब 400 अरब डॉलर का है।

  • तेल की आपूर्ति: सऊदी अरब, ईरान और UAE चीन की अर्थव्यवस्था के लिए तेल के सबसे बड़े स्रोत हैं।

  • LNG और पेट्रोकेमिकल्स: कतर से होने वाली गैस की आपूर्ति चीन के उद्योगों की रीढ़ है।

यही कारण है कि चीन-अमेरिका तनाव 2026 महज एक बयानबाजी नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन गई है। इस रणनीति में चीन को रूस का भी पुरजोर समर्थन मिल रहा है, जो पहले से ही पश्चिम के प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की वर्तमान स्थिति ने पूरी दुनिया को 1970 के दशक के तेल संकट की याद दिला दी है। यदि अमेरिका नाकेबंदी की दिशा में बढ़ता है और चीन अपनी ‘उचित कार्रवाई’ की चेतावनी को अमल में लाता है, तो यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि एक वैश्विक महायुद्ध का रूप ले सकता है।

वर्तमान में, बीजिंग ने अपनी चाल चल दी है। अब गेंद वाशिंगटन के पाले में है कि वह टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाता है या कूटनीति के जरिए तनाव कम करने का प्रयास करता है। दुनिया की नजरें अब आगामी जी-20 सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र की बैठकों पर टिकी हैं, जहाँ इन महाशक्तियों का आमना-सामना होगा।

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