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Uttarakhand: हरिद्वार में मासूम के ‘सौदागरों’ को सबक: अपहरण और मानव तस्करी के मामले में दो महिलाओं को 10-10 साल की कठोर कैद

The Hill India News
Last updated: April 14, 2026 2:58 am
The Hill India News
Published: April 14, 2026
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Photo: ANI
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हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार की एक अदालत ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाले एक पुराने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सात माह के मासूम बच्चे का अपहरण कर उसे बेचने की साजिश रचने वाली दो महिलाओं को चतुर्थ अपर जिला जज आरके श्रीवास्तव की अदालत ने दोषी करार देते हुए 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत के इस फैसले ने न केवल अपराधियों को कड़ा संदेश दिया है, बल्कि न्याय व्यवस्था पर जनता के विश्वास को भी और सुदृढ़ किया है।

Contents
क्या था रूह कंपा देने वाला यह मामला?पुलिस की तत्परता और सकुशल बरामदगीअदालती कार्यवाही और सजा का ऐलानसमाज के लिए एक कड़ा संदेश

क्या था रूह कंपा देने वाला यह मामला?

यह मामला 10 दिसंबर 2022 का है, जिसने पूरी धर्मनगरी को हिलाकर रख दिया था। ज्वालापुर क्षेत्र के निवासी रविंद्र का महज सात महीने का बेटा अचानक अपने घर से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गया। एक दुधमुंहे बच्चे के गायब होने की खबर फैलते ही इलाके में हड़कंप मच गया और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था।

घटना की गंभीरता को देखते हुए ज्वालापुर कोतवाली पुलिस ने तत्काल अज्ञात बदमाशों के खिलाफ अपहरण की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। तात्कालीन पुलिस प्रशासन के लिए यह मामला साख का सवाल बन गया था, जिसके बाद शहर के हर निकास द्वार पर नाकेबंदी कर दी गई।

पुलिस की तत्परता और सकुशल बरामदगी

हरिद्वार कोर्ट का फैसला आज जिस ठोस आधार पर आया है, उसकी नींव घटना के अगले ही दिन पुलिस की शानदार कार्रवाई ने रख दी थी। 11 दिसंबर 2022 को नगर कोतवाली पुलिस को सूचना मिली कि सप्तऋषि क्षेत्र स्थित भारत माता मंदिर के पास दो संदिग्ध महिलाएं एक बच्चे के साथ देखी गई हैं।

पुलिस ने बिना वक्त गंवाए घेराबंदी की और दोनों महिलाओं को धर दबोचा। जांच करने पर पुलिस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उनके पास से वही सात महीने का मासूम सकुशल बरामद हुआ। पुलिस की इस मुस्तैदी की उस समय भी काफी सराहना हुई थी, क्योंकि बच्चे को राज्य से बाहर ले जाने या उसे किसी और को सौंपने से पहले ही पुलिस ने अपराधियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया था।

अदालती कार्यवाही और सजा का ऐलान

शासकीय अधिवक्ता अनुज कुमार सैनी ने कोर्ट में अभियोजन पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी की। विवेचना के दौरान यह कड़वा सच सामने आया कि इन महिलाओं ने केवल बच्चे का अपहरण ही नहीं किया था, बल्कि वे एक रैकेट का हिस्सा थीं जो मासूमों का सौदा करते थे। जांच में खुलासा हुआ कि आरोपियों ने बच्चे को एक निसंतान दंपति को बेचने की पूरी तैयारी कर ली थी।

इस मामले में कुल सात लोगों के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया गया था। अभियोजन पक्ष ने अपनी दलीलों को पुख्ता करने के लिए अदालत के समक्ष सात महत्वपूर्ण गवाह पेश किए। साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को सुनने के बाद जज आरके श्रीवास्तव ने दोनों महिलाओं को मुख्य दोषी माना।

अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा:

  • मुख्य सजा: दोनों महिलाओं को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा।

  • जुर्माना: प्रत्येक महिला पर आठ-आठ हजार रुपये का अर्थदंड।

  • अतिरिक्त सजा: जुर्माने की राशि और अपराध की प्रकृति को देखते हुए तीन-तीन वर्ष का अतिरिक्त कठोर कारावास और तीन-तीन हजार रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया गया है।

हालांकि, साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने इसी मामले में नामजद पांच अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

समाज के लिए एक कड़ा संदेश

हरिद्वार कोर्ट का फैसला आने के बाद पीड़ित पिता रविंद्र और उनके परिवार ने राहत की सांस ली है। यह फैसला उन लोगों के लिए एक नजीर है जो मासूमों को चंद रुपयों के लिए ढाल बनाते हैं। मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराधों में कोर्ट का यह सख्त रवैया स्वागत योग्य है।

अधिवक्ताओं का मानना है कि इस तरह के फैसलों से पुलिस का मनोबल भी बढ़ता है। ज्वालापुर पुलिस की उस समय की टीम, जिसने 24 घंटे के भीतर बच्चे को खोज निकाला था, आज इस कानूनी जीत की असली हकदार मानी जा रही है।

हरिद्वार की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कानून के हाथ लंबे होते हैं। भले ही मामले में कुछ आरोपी साक्ष्यों के अभाव में बच निकले हों, लेकिन मुख्य साजिशकर्ताओं को मिली 10 साल की कठोर सजा यह बताने के लिए काफी है कि मासूमों के साथ अन्याय करने वालों का अंत सलाखों के पीछे ही होता है। प्रशासन अब अन्य लंबित मानव तस्करी के मामलों में भी इसी तरह की त्वरित पैरवी करने की तैयारी में है।

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