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भारत-बांग्लादेश सीमा पर मगरमच्छ और सांपों की “तैनाती” प्रस्ताव पर विवाद, पर्यावरण और मानवाधिकार संगठनों ने उठाए गंभीर सवाल

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए गृह मंत्रालय द्वारा कथित तौर पर “सांप और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के उपयोग” पर विचार किए जाने की खबर सामने आने के बाद देशभर में विवाद तेज हो गया है। इस प्रस्ताव को लेकर पर्यावरणविदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वन्यजीव विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह कदम न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक है, बल्कि मानव जीवन और वन्यजीव संरक्षण कानूनों के खिलाफ भी हो सकता है।

जानकारी के अनुसार, भारत-बांग्लादेश सीमा का बड़ा हिस्सा नदियों, दलदली क्षेत्रों और मैंग्रोव क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जहां पारंपरिक बाड़ लगाना बेहद कठिन माना जाता है। इसी कारण सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा वैकल्पिक सुरक्षा उपायों पर विचार किया जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक आंतरिक निर्देश में “कमजोर नदी क्षेत्रों में सरीसृपों की तैनाती की संभावना का अध्ययन” करने की बात कही गई है, ताकि घुसपैठ और तस्करी को रोका जा सके।

हालांकि, इस विचार ने ही बड़े विवाद को जन्म दे दिया है। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि किसी भी जंगली जीव का इस तरह उपयोग सुरक्षा उपकरण की तरह करना न तो वैज्ञानिक रूप से उचित है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य।

पर्यावरणविदों की कड़ी आपत्ति

पर्यावरण विशेषज्ञों और संरक्षण कार्यकर्ताओं ने इस प्रस्ताव को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का संभावित उल्लंघन बताया है। उनका कहना है कि भारत में वन्यजीवों को संरक्षित करने के लिए स्पष्ट कानून मौजूद हैं, जिनके तहत किसी भी जंगली जीव को पकड़कर मानव उपयोग के लिए स्थानांतरित करना या उसका इस्तेमाल करना अवैध माना जा सकता है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि सांप और मगरमच्छ जैसे जीवों को सीमा सुरक्षा के लिए “तैनात” करना न केवल असंभव है, बल्कि इससे इन जीवों के प्राकृतिक आवास और जैविक संतुलन पर गंभीर असर पड़ेगा। कई विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि इससे स्थानीय लोगों के जीवन को खतरा हो सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां नदी किनारे बड़ी आबादी रहती है।

मानवाधिकार संगठनों ने भी इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सीमा क्षेत्र के लोग पहले से ही कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, और ऐसे प्रयोग उनके जीवन और आजीविका को और अधिक जोखिम में डाल सकते हैं।

स्थानीय आबादी पर संभावित प्रभाव

भारत-बांग्लादेश सीमा का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण और नदी-आधारित इलाकों से जुड़ा हुआ है, जहां लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती, मछली पकड़ने और छोटे व्यापार पर निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन क्षेत्रों में सांपों या मगरमच्छों की उपस्थिति बढ़ाई जाती है या उन्हें “सक्रिय रूप से तैनात” किया जाता है, तो इससे स्थानीय लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसे किसी भी कदम से ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत फैल सकती है और लोगों का रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हो सकता है। खासकर बच्चों, मछुआरों और किसानों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है।

वन्यजीव विशेषज्ञों की राय

वन्यजीव विशेषज्ञों ने भी इस प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताया है। उनका कहना है कि सांप और मगरमच्छ जैसे जीव अपने प्राकृतिक व्यवहार के अनुसार कार्य करते हैं और उन्हें किसी “सीमा सुरक्षा उपकरण” की तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मगरमच्छ और जहरीले सांप दोनों ही संरक्षित प्रजातियों की श्रेणी में आते हैं या संरक्षण की आवश्यकता वाली प्रजातियों में शामिल हैं। इन्हें उनके प्राकृतिक आवास से हटाना या किसी विशेष उद्देश्य के लिए उपयोग करना उनके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

इसके अलावा, विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि ऐसे जीवों का व्यवहार अनियंत्रित होता है और वे कभी भी मानवों पर हमला कर सकते हैं, जिससे सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और स्थानीय लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।

कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है, तो उसे कई स्तरों पर अनुमति लेनी होगी। इसमें राज्य वन विभाग, पर्यावरण मंत्रालय और अन्य संबंधित एजेंसियों की मंजूरी आवश्यक होगी।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत किसी भी संरक्षित जीव को पकड़ना, स्थानांतरित करना या उसका उपयोग करना सख्त नियमों के अंतर्गत आता है। ऐसे में इस प्रस्ताव के लागू होने से पहले व्यापक कानूनी जांच और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अनिवार्य होगा।

सीमा सुरक्षा की जटिल चुनौतियां

भारत-बांग्लादेश सीमा लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से बड़ा हिस्सा नदी और दलदली इलाकों से होकर गुजरता है। इस कारण यह सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानी जाती है। यहां तस्करी और अवैध घुसपैठ की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के जटिल भौगोलिक क्षेत्रों में पारंपरिक बाड़ लगाना संभव नहीं है, इसलिए तकनीकी निगरानी, ड्रोन, सेंसर और गश्त जैसे आधुनिक उपायों का उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है।

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