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उत्तराखंड: “मैं तांत्रिक हूं, मैं घमंडी हूं…”, हरीश रावत का बयान, कांग्रेस में छिड़ी सियासी बहस तेज

The Hill India News
Last updated: April 13, 2026 5:58 am
The Hill India News
Published: April 13, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों बयानबाजी का दौर तेज हो गया है और इसकी ताज़ा कड़ी बने हैं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखते हुए खुद को ‘तांत्रिक’ और ‘घमंडी’ कहे जाने के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। उनके इस बयान ने न सिर्फ राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी को भी उजागर कर दिया है।

दरअसल, विवाद की शुरुआत हल्द्वानी में आयोजित एक कार्यक्रम से हुई, जहां कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की मौजूदगी में पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी ने अपने संबोधन में ‘नेता और तांत्रिक’ का जिक्र किया था। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान के बाद पार्टी के भीतर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने इस बयान को इशारों-इशारों में किसी वरिष्ठ नेता पर निशाना माना।

इसी बीच अब हरीश रावत ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपनी पोस्ट की शुरुआत ही एक सवालिया अंदाज में की—“वाह, am I – #Tantrik…!!”। इसके बाद उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि उनके बिना कांग्रेस नहीं चल सकती।

हरीश रावत ने अपने राजनीतिक सफर को याद करते हुए 1968 का जिक्र किया, जब देश में इंदिरा गांधी के खिलाफ बड़े-बड़े नेता खड़े हो गए थे और ‘सिंडिकेट बनाम इंदिकेट’ का संघर्ष चल रहा था। उस समय उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में इंदिरा गांधी की सभा आयोजित करवाई, जबकि इसका कड़ा विरोध भी हो रहा था। रावत ने कहा कि उस दौर में उन्होंने संगठन के लिए काम किया और कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई।

उन्होंने आगे लिखा कि 1977 में जब कांग्रेस कमजोर हो गई थी, तब भी वह पार्टी के साथ खड़े रहे। इसके अलावा 1990 के दशक में जब उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के पहाड़ी क्षेत्रों में कांग्रेस संकट में थी, तब भी उन्होंने पार्टी का झंडा नहीं छोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि जब 1996 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे, तब भी उन्होंने संगठन के लिए काम किया।

अपने हालिया राजनीतिक अनुभवों का जिक्र करते हुए रावत ने कहा कि आज भी वह चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कांग्रेस और ‘उत्तराखंडियत’ के लिए खड़े हैं। उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ संघर्ष का भी जिक्र किया और कहा कि उन्होंने हार के बाद भी न पार्टी छोड़ी और न ही अपने क्षेत्र से दूरी बनाई।

हरीश रावत ने हरिद्वार सीट का जिक्र करते हुए कहा कि वहां के लोगों ने उन्हें अपनाया है और वह पूरी ताकत के साथ जनता के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी चुनावी सुविधा के लिए सीट नहीं बदली और कार्यकर्ताओं के साथ हमेशा खड़े रहे। उनका दावा है कि जिन सीटों पर वह हारे, वहां बाद में कांग्रेस ने जीत हासिल की।

अपने ऊपर लगे ‘तांत्रिक’ और ‘घमंडी’ होने के आरोपों पर कटाक्ष करते हुए रावत ने लिखा—“शायद इसलिए मैं तांत्रिक हूं, शायद इसीलिए मैं घमंडी हूं और गलतफहमी का शिकार हूं।” उन्होंने आगे कहा कि अगर यह ‘तंत्र’ है, तो वह कार्यकर्ताओं और उत्तराखंड की जनता पर विश्वास का तंत्र है।

यह पहली बार नहीं है जब हरीश रावत पर इस तरह के आरोप लगे हों। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणजीत रावत भी पहले उन पर तंत्र-मंत्र का सहारा लेने का आरोप लगा चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच मतभेद पहले भी कई बार सामने आ चुके हैं, जिससे पार्टी के अंदरूनी हालात पर सवाल उठते रहे हैं।

इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे प्रकाश जोशी के बयान के बाद अब यह मुद्दा और गहरा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक बयानबाजी नहीं, बल्कि कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी का संकेत है। आने वाले समय में यह विवाद और बढ़ सकता है, जिससे पार्टी की एकजुटता पर असर पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, हरीश रावत के बयान ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने खिलाफ उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं और उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव को अपनी ताकत के रूप में पेश किया है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस विवाद को कैसे संभालता है और क्या पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को खत्म किया जा सकेगा या नहीं।

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