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The Hill India > Blog > देश > एआई से टीबी जांच में क्रांति: दवा-प्रतिरोध की पहचान अब होगी तेज और सटीक
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एआई से टीबी जांच में क्रांति: दवा-प्रतिरोध की पहचान अब होगी तेज और सटीक

The Hill India News
Last updated: April 11, 2026 5:49 am
The Hill India News
Published: April 11, 2026
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देश में तपेदिक यानी Tuberculosis (टीबी) से लड़ाई को एक नई तकनीकी ताकत मिलने जा रही है। भारतीय वैज्ञानिकों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से टीबी के दवा-प्रतिरोध (Drug Resistance) की पहचान को अधिक सटीक और तेज बनाने में बड़ी सफलता हासिल की है। यह शोध Indian Council of Medical Research के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय क्षय रोग अनुसंधान संस्थान (NIRT) द्वारा किया गया है और इसे Indian Journal of Medical Research में प्रकाशित किया गया है।

Contents
क्या है यह नई तकनीक?कितनी सटीक है यह प्रणाली?कैसे किया गया अध्ययन?क्यों है यह तकनीक महत्वपूर्ण?क्या होंगे इसके फायदे?विशेषज्ञों की रायटीबी उन्मूलन की दिशा में बड़ा कदम

इस नई तकनीक के जरिए टीबी की जांच प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले लाइन प्रोब असे (LPA) स्ट्रिप्स की रिपोर्ट को एआई द्वारा पढ़ा गया, जिसमें 92% से लेकर 100% तक की सटीकता दर्ज की गई। यह परिणाम न केवल उत्साहजनक हैं बल्कि देश में टीबी उन्मूलन अभियान के लिए एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं।

क्या है यह नई तकनीक?

टीबी की पहचान और खासतौर पर उसके दवा-प्रतिरोध की जांच के लिए LPA टेस्ट का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस (Mycobacterium Tuberculosis) के जीन में बदलावों को पहचाना जाता है, जो यह तय करते हैं कि कौन-सी दवाएं प्रभावी होंगी और कौन-सी नहीं।

अब तक इस प्रक्रिया को विशेषज्ञों द्वारा मैन्युअली पढ़ा जाता था, जिसमें त्रुटियों की संभावना बनी रहती थी। लेकिन नई एआई तकनीक में उन्नत एल्गोरिदम—जैसे Faster Region-based Convolutional Neural Network (FR-CNN), Detection Transformer (DETR) और Hierarchical Neural Network (HNN)—का उपयोग किया गया है, जो LPA स्ट्रिप्स की इमेज को स्कैन करके स्वतः परिणाम तैयार करते हैं।

कितनी सटीक है यह प्रणाली?

शोध में पाया गया कि एआई आधारित प्रणाली ने rpoB, katG और inhA जैसे महत्वपूर्ण जीनों में दवा-प्रतिरोध की पहचान लगभग पूरी तरह सही की। केवल 3% से 9% मामलों में ही विशेषज्ञों को सुधार करने की आवश्यकता पड़ी। यह दर्शाता है कि यह तकनीक न केवल भरोसेमंद है बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उपयोगी हो सकती है।

इसके अलावा, यह सिस्टम विभिन्न लैब और अलग-अलग स्कैनिंग उपकरणों पर भी समान रूप से सटीक परिणाम देने में सक्षम रहा, जो इसकी मजबूती और विश्वसनीयता को दर्शाता है।

कैसे किया गया अध्ययन?

यह अध्ययन वर्ष 2023 से 2024 के बीच किया गया, जिसमें देशभर की 10 इंटरमीडिएट रेफरेंस लैबोरेट्री (IRLs) से प्राप्त सैंपल शामिल किए गए। कुल 2,810 प्रथम-पंक्ति (First-Line) और द्वितीय-पंक्ति (Second-Line) दवाओं से जुड़े मामलों में से 241 LPA स्ट्रिप्स का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन में केवल उन्हीं सैंपल को शामिल किया गया जिनमें आंतरिक गुणवत्ता नियंत्रण (IQC) सही था और टीबी संक्रमण की पुष्टि हो चुकी थी। इस तरह सुनिश्चित किया गया कि परिणाम पूरी तरह वैज्ञानिक और सटीक हों।

क्यों है यह तकनीक महत्वपूर्ण?

टीबी के कुछ रूप जैसे मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट (MDR) और रिफैम्पिसिन-रेसिस्टेंट (RR) बेहद खतरनाक होते हैं और इनका इलाज कठिन होता है। ऐसे मामलों में जितनी जल्दी दवा-प्रतिरोध की पहचान हो जाए, उतना ही बेहतर इलाज संभव होता है।

वर्तमान में National Tuberculosis Elimination Programme (NTEP) के तहत टीबी की जांच और उपचार किया जाता है, लेकिन मैन्युअल रिपोर्टिंग के कारण देरी और त्रुटियों की संभावना बनी रहती है। एआई आधारित यह नई प्रणाली इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकती है।

क्या होंगे इसके फायदे?

इस तकनीक के लागू होने से कई बड़े फायदे सामने आ सकते हैं:

  • तेज जांच प्रक्रिया: रिपोर्ट तैयार होने में लगने वाला समय कम होगा।
  • सटीकता में वृद्धि: मानवीय त्रुटियों की संभावना घटेगी।
  • बेहतर इलाज: समय पर सही दवाओं का चयन संभव होगा।
  • देशभर में एकरूपता: सभी लैब में एक समान जांच मानक लागू हो सकेंगे।

विशेषज्ञों की राय

शोध की प्रमुख वैज्ञानिक सुचारिता कन्नप्पन मोहनवेल के अनुसार, यह तकनीक टीबी के गंभीर रूपों की जल्दी पहचान करने में मदद करेगी, जिससे मरीजों का उपचार समय पर शुरू किया जा सकेगा। वहीं, सह-शोधकर्ता आर. राधाकृष्णन का कहना है कि विशेषज्ञ निगरानी में इस तकनीक का उपयोग देशभर की लैब में निदान प्रणाली को और अधिक मजबूत और प्रभावी बनाएगा।

टीबी उन्मूलन की दिशा में बड़ा कदम

भारत सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में टीबी को पूरी तरह खत्म करना है। ऐसे में एआई आधारित यह तकनीक राष्ट्रीय स्तर पर टीबी नियंत्रण कार्यक्रम को गति दे सकती है। तेज, सटीक और विश्वसनीय जांच के जरिए न केवल मरीजों की जान बचाई जा सकेगी, बल्कि संक्रमण के फैलाव को भी रोका जा सकेगा।

हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस तकनीक को पूरी तरह लागू करने से पहले बड़े स्तर पर परीक्षण और प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी, ताकि इसे सुरक्षित और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सके।

(अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या उपचार के लिए हमेशा योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।)

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