
ऋषिकेश। योग नगरी ऋषिकेश में गंगा नदी पर बन रहे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पहले ‘ग्लास फ्लोर ब्रिज’ यानी बजरंग सेतु को लेकर एक बार फिर चिंताओं के बादल गहरा गए हैं। अभी तक इस पुल का औपचारिक उद्घाटन भी नहीं हुआ है, लेकिन इसके फुटपाथ पर लगे पारदर्शी कांच ने एक बार फिर जवाब दे दिया है। यह तीसरी घटना है जब पुल का कांच टूटा है, जिसने न केवल लोक निर्माण विभाग (PWD) की कार्यप्रणाली बल्कि निर्माण की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
69.20 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बन रहे इस सेतु की स्थिति अब स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के बीच चर्चा और डर का विषय बन गई है।
तीसरी बार हुआ हादसा: गुणवत्ता पर बड़ा सवाल
ताजा मामला बजरंग सेतु के फुटपाथ वाले हिस्से का है, जहाँ लगे एक विशाल कांच में जगह-जगह गहरी दरारें आ गई हैं। जैसे ही कांच टूटने की खबर फैली, प्रशासन ने आनन-फानन में फुटपाथ के दोनों किनारों से आवाजाही पर रोक लगा दी। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है; इससे पहले भी दो बार इसी तरह कांच क्षतिग्रस्त हो चुका है।
हालांकि, निर्माणाधीन कंपनी ने पिछली बार कांच बदलवाकर खानापूर्ति कर दी थी, लेकिन उद्घाटन से पहले ही बार-बार ऋषिकेश बजरंग सेतु कांच का इस तरह चटकना किसी बड़ी तकनीकी खामी की ओर इशारा कर रहा है। 65 मिमी की मोटाई वाले जिस कांच को ‘अटूट’ मानकर लगाया गया था, उसकी मजबूती अब संशय के घेरे में है।
उद्घाटन से पहले ही ‘ट्रायल’ और लापरवाही का खेल
हैरानी की बात यह है कि जिस पुल को अभी तक जनता को समर्पित नहीं किया गया है, उस पर पिछले दो महीनों से पर्यटकों और स्थानीय लोगों की बेधड़क आवाजाही जारी है। विभाग की उदासीनता का आलम यह है कि विदेशी पर्यटक और स्थानीय युवा पुल के कांच वाले हिस्से पर खड़े होकर सेल्फी लेते और रील बनाते नजर आते हैं।
जनवरी 2026 में भी सेल्फी पॉइंट के पास इसी तरह कांच टूटा था। गनीमत यह रही कि उस समय कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन विभाग ने उस घटना से कोई सबक नहीं लिया। सुरक्षा मानकों और गाइडलाइन्स (SOP) के अभाव में यह पुल अब एक ‘खतरनाक टूरिस्ट स्पॉट’ बनता जा रहा है।
लक्ष्मण झूला का विकल्प, लेकिन सुरक्षा में विफल?
ऐतिहासिक लक्ष्मण झूला पुल को 16 अप्रैल 2022 को आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट के बाद सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया था। पुल की तारें जर्जर हो चुकी थीं और वह कभी भी गिर सकता था। लक्ष्मण झूला के विकल्प के रूप में ही बजरंग सेतु का निर्माण शुरू किया गया था।
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कुल लागत: ₹69.20 करोड़
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लंबाई: 132.30 मीटर
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चौड़ाई: 5 मीटर (जिसमें दोनों ओर 1.5 मीटर का कांच का फुटपाथ शामिल है)
उम्मीद थी कि यह आधुनिक पुल ऋषिकेश के पर्यटन को नए आयाम देगा, लेकिन वर्तमान स्थिति ने पर्यटकों के मन में खौफ पैदा कर दिया है।
अधिकारियों का ‘अनभिज्ञ’ रवैया
एक ओर जहाँ धरातल पर पुल का कांच दरक रहा है और आवाजाही रोकी गई है, वहीं दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारियों का रवैया बेहद ढुलमुल नजर आ रहा है। नरेंद्र नगर डिवीजन के अधिशासी अभियंता प्रवीण कर्णवाल का कहना है कि मामला फिलहाल उनके संज्ञान में नहीं है और जानकारी जुटाने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। अधिकारियों का यह ‘रटा-रटाया’ जवाब निर्माण की गंभीरता और जवाबदेही पर सवाल उठाता है।
स्थानीय लोगों में आक्रोश और डर
ऋषिकेश के स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पुल के निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग किया जा सकता है या फिर डिजाइन में कोई बुनियादी दोष है। लोगों का कहना है कि यदि उद्घाटन के बाद जब पुल पर क्षमता से अधिक भीड़ होगी, तब यदि ऐसा हादसा हुआ तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? पुल पर किसी सुरक्षाकर्मी की तैनाती न होना और बिना उद्घाटन के लोगों को जाने देना, विभाग की सबसे बड़ी चूक मानी जा रही है।
क्या कहते हैं सुरक्षा मानक?
आमतौर पर ग्लास ब्रिज पर चलने के लिए विशेष प्रकार के फुटवियर या कवर दिए जाते हैं ताकि कांच पर दबाव और घर्षण कम हो। लेकिन बजरंग सेतु पर लोग साधारण जूतों और भारी सामान के साथ चल रहे हैं। बिना किसी मानक (Standard) के कांच वाले हिस्से का उपयोग इसकी उम्र और मजबूती को तेजी से कम कर रहा है।
बजरंग सेतु ऋषिकेश की नई पहचान बनने वाला था, लेकिन बार-बार टूटते कांच ने इसे ‘विवादों का सेतु’ बना दिया है। यदि समय रहते गुणवत्ता की उच्च स्तरीय जांच नहीं कराई गई और सुरक्षा मानकों को सख्त नहीं किया गया, तो यह भविष्य में किसी बड़ी जनहानि का कारण बन सकता है। ऋषिकेश बजरंग सेतु कांच के बार-बार टूटने की घटना ने सरकार के ‘सुरक्षित पर्यटन’ के दावों को आईना दिखा दिया है। अब देखना यह होगा कि विभाग कब नींद से जागता है।



