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शक सबूत का विकल्प नहीं: छेड़छाड़ के आरोप में आरोपी बरी, अदालत ने साक्ष्यों की कमी बताई

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की एक अदालत ने महिला से छेड़छाड़ और घर में अवैध रूप से घुसने के आरोप में गिरफ्तार एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में स्पष्ट कहा कि “सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता” और आपराधिक न्याय प्रणाली में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।

यह मामला वर्ष 2014 का है, जब एक महिला ने आरोप लगाया था कि 31 जुलाई की रात करीब 9:30 बजे आरोपी नशे की हालत में उसके घर में घुस आया और उसके साथ अभद्र व्यवहार किया। महिला के अनुसार, आरोपी ने उसे जबरदस्ती पकड़ा, उसके शरीर को गलत तरीके से छुआ और विरोध करने पर उसे थप्पड़ भी मारे। महिला ने बताया कि उसके चिल्लाने पर घर के अन्य सदस्य और पड़ोसी मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी वहां से फरार हो गया।

हालांकि, अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गंभीर सवाल उठाए। सबसे अहम बात यह रही कि घटना के लगभग छह दिन बाद शिकायत दर्ज कराई गई। अदालत ने कहा कि इतनी देरी के पीछे कोई ठोस और संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया, जबकि संबंधित पुलिस थाना घटना स्थल से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर था। शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि इस दौरान वह अपने घर पर ही थी और आरोपी ने उसे पुलिस के पास जाने से नहीं रोका था।

अदालत ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता के बयान में कई विरोधाभास हैं। पुलिस के समक्ष दिए गए बयान और अदालत में प्रस्तुत गवाही में महत्वपूर्ण अंतर सामने आए। उदाहरण के तौर पर, पुलिस को दिए गए बयान में महिला ने कहा था कि आरोपी ने उसकी गर्दन पकड़ी थी, जबकि अदालत में उसने कहा कि आरोपी ने उसका मुंह दबाया। अदालत ने इसे मामूली अंतर न मानते हुए कहा कि यह मामले की मूल कहानी को प्रभावित करता है।

इसके अलावा, आरोपी द्वारा थप्पड़ मारने का आरोप भी ट्रायल के दौरान पहली बार सामने आया, जबकि यह बात न तो लिखित शिकायत में थी और न ही प्रारंभिक पुलिस बयान में। अदालत ने इसे एक “महत्वपूर्ण सुधार” माना, जिससे अभियोजन पक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।

मामले में पंचायत के माध्यम से समझौते की कोशिश का भी उल्लेख किया गया था, लेकिन अदालत ने पाया कि इसके समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। पंचायत के किसी सदस्य को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया और न ही कोई दस्तावेजी प्रमाण दिया गया कि ऐसी कोई प्रक्रिया वास्तव में हुई थी।

अदालत ने शिकायतकर्ता के जिरह के दौरान दिए गए बयानों को भी महत्वपूर्ण माना। महिला ने कहा था कि यदि आरोपी को बरी किया जाता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी और वह उसे माफ करना चाहती है। अदालत ने इन बयानों को हिचकिचाहट का संकेत मानते हुए कहा कि इससे आरोपों की गंभीरता और विश्वसनीयता कमजोर होती है।

अंततः अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को “संदेह से परे” साबित करने में असफल रहा है। इसी आधार पर आरोपी को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं—451 (घर में अनधिकृत प्रवेश), 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और 509 (महिला की मर्यादा का अपमान)—के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में न्याय का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक आरोप पूरी तरह से सिद्ध न हों, तब तक आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। केवल संदेह या अनुमान के आधार पर सजा देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

यह फैसला एक बार फिर न्यायपालिका के उस रुख को दर्शाता है, जिसमें साक्ष्यों की मजबूती और गवाही की विश्वसनीयता को सर्वोपरि माना जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भावनात्मक या अपूर्ण दावों के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

इस मामले ने यह भी उजागर किया है कि शिकायत दर्ज कराने में देरी, बयानों में असंगति और साक्ष्यों की कमी किसी भी मामले को कमजोर बना सकती है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सटीकता बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

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