
देहरादून। उत्तराखंड की सामाजिक और आर्थिक दिशा को नई पहचान देने के लिए राज्य में जनगणना का बिगुल बज चुका है। साल 2011 के एक लंबे अंतराल के बाद, देवभूमि एक ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का गवाह बनने जा रही है, जो न केवल तकनीक से लैस होगी, बल्कि राज्य के भविष्य के नीति-निर्माण का आधार भी बनेगी। इस बार की उत्तराखंड जनगणना 2027 कई मायनों में खास है—यह पूरी तरह पेपरलेस होगी और मोबाइल एप के जरिए घर-घर की जानकारी जुटाएगी।
डिजिटल बदलाव: कागज की जगह अब एप का दौर
पिछले दशकों में जनगणना की प्रक्रिया भारी-भरकम रजिस्टरों और कागजी फॉर्मों के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसमें मानवीय त्रुटि की संभावना बनी रहती थी। लेकिन इस बार, जनगणना निदेशालय ने इसे पूरी तरह डिजिटल जनगणना का स्वरूप दिया है। राज्य भर में लगभग 34 हजार कर्मियों को इस कार्य के लिए तैनात किया जा रहा है, जिन्हें विशेष रूप से डिजिटल डेटा एंट्री का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
डिजिटल एंट्री का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि डेटा सीधे सेंट्रल सर्वर पर अपलोड होगा, जिससे विश्लेषण में लगने वाले सालों के समय को कम किया जा सकेगा। हर मकान का भौगोलिक स्थान (Geo-location) भी मैप किया जाएगा, जिससे यह पता चल सकेगा कि राज्य के किस हिस्से में शहरीकरण का दबाव बढ़ रहा है और कहाँ पलायन की स्थिति गंभीर है।
30 हजार डिजिटल मानचित्र: जनगणना की नई ‘रीढ़’
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है—मकान सूचीकरण (Houselisting)। जनगणना के पहले चरण में राज्य के कोने-कोने को कवर करने के लिए 30,000 डिजिटल मानचित्रों का उपयोग किया जाएगा। ये मानचित्र न केवल कर्मियों को उनके कार्यक्षेत्र की पहचान करने में मदद करेंगे, बल्कि इनके माध्यम से हर संरचना की सटीक स्थिति, उसका उपयोग (आवासीय या व्यावसायिक) और निर्माण सामग्री जैसी सूक्ष्म जानकारियां भी संकलित की जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ये मानचित्र भविष्य में आपदा प्रबंधन और शहरी नियोजन के लिए भी मील का पत्थर साबित होंगे।
भौगोलिक चुनौतियां: बर्फबारी से पहले ‘ऊंचाई’ पर गणना
उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियां हमेशा से प्रशासन के लिए चुनौती रही हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, जनगणना निदेशालय ने एक रणनीतिक समय-सारिणी तैयार की है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों, जहाँ सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं, वहां गणना का कार्य देश के बाकी हिस्सों से पहले पूरा किया जाएगा।
-
लक्ष्य क्षेत्र: बदरीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और ऊंचाई पर स्थित 131 गांव।
-
समय सीमा: अक्टूबर से नवंबर के बीच इन क्षेत्रों में डेटा संग्रह पूरा कर लिया जाएगा।
-
उद्देश्य: कड़ाके की ठंड और बर्फबारी से पहले हर नागरिक का डेटा सुरक्षित करना।
16 साल का अंतराल: विकास और बदलाव का विश्लेषण
आमतौर पर जनगणना हर 10 वर्ष में होती है, लेकिन वैश्विक महामारी और अन्य तकनीकी कारणों से इस बार यह अंतराल 16 साल (2011 से 2027) का हो गया है। यह 16 साल का रिकॉर्ड उत्तराखंड के लिए बेहद अहम है।
-
जनसांख्यिकीय बदलाव: इन वर्षों में उत्तराखंड की आबादी का स्वरूप कितना बदला है?
-
शिक्षा और रोजगार: साक्षरता दर में कितनी वृद्धि हुई और कार्यबल का रुझान किस ओर है?
-
पलायन: पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी इलाकों की ओर हुए विस्थापन की स्पष्ट तस्वीर इस बार के हाउस होल्ड एन्यूमरेशन से साफ हो जाएगी।
अधिकारी इन आंकड़ों की तुलना 2011 के डेटा से करेंगे ताकि यह समझा जा सके कि बीते डेढ़ दशक में राज्य ने कितनी प्रगति की है।
2027 का मुख्य अभियान: 9 से 28 फरवरी तक की समय-सीमा
राज्य के मैदानी और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मुख्य जनगणना अभियान 9 फरवरी से 28 फरवरी 2027 के बीच संचालित किया जाएगा। इस दौरान ‘एन्यूमरेशन’ प्रक्रिया के तहत प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जानकारी, आर्थिक स्थिति और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे सटीक जानकारी साझा करें, क्योंकि यही डेटा भविष्य की सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक पहुँचाने में मदद करेगा।
नीति निर्माण में डेटा की शक्ति
किसी भी राज्य के विकास के लिए ‘डेटा’ ही सबसे बड़ा हथियार होता है। डिजिटल जनगणना से प्राप्त आंकड़े सीधे तौर पर निम्नलिखित क्षेत्रों को प्रभावित करेंगे:
-
स्वास्थ्य सेवाएं: कहाँ नए अस्पतालों और सीएचसी की आवश्यकता है।
-
शिक्षा: स्कूलों का सुदृढ़ीकरण और नए संस्थानों की स्थापना।
-
बुनियादी ढांचा: सड़कों, पेयजल लाइनों और बिजली आपूर्ति का विस्तार।
-
सामाजिक सुरक्षा: पेंशन और सब्सिडी योजनाओं का सटीक लक्ष्यीकरण।
उत्तराखंड में शुरू होने वाली यह डिजिटल जनगणना केवल एक गिनती नहीं है, बल्कि यह राज्य के पुनरुद्धार का खाका है। 34 हजार कर्मियों की मेहनत और डिजिटल मानचित्रों की सटीकता जब मिलेगी, तो उत्तराखंड के पास अपनी समस्याओं और संभावनाओं का एक वैज्ञानिक दस्तावेज होगा। 2027 की यह गणना निश्चित रूप से ‘विकसित उत्तराखंड’ के संकल्प को सिद्ध करने में सहायक होगी।



