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कॉर्बेट के जंगलों में प्रकृति का चमत्कार: 15 साल बाद दिखा दुर्लभ ‘डस्की ईगल आउल’, वन्यजीव प्रेमियों में भारी उत्साह

The Hill India News
Last updated: March 1, 2026 4:07 am
The Hill India News
Published: March 1, 2026
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Photo-Himanshu Thiruva
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रामनगर (नैनीताल): उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे तराई पश्चिमी वन प्रभाग के फाटो पर्यटन जोन से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक विस्मयकारी और सुखद खबर सामने आई है। यहाँ लगभग डेढ़ दशक (15 वर्ष) के लंबे अंतराल के बाद दुर्लभ डस्की ईगल आउल (Dusky Eagle Owl) के जोड़े को देखा गया है। इस दुर्लभ पक्षी की मौजूदगी ने न केवल शोधकर्ताओं को चौंका दिया है, बल्कि यह कॉर्बेट क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और बेहतर होते पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का एक जीवंत प्रमाण बनकर उभरा है।

Contents
कैमरे में कैद हुई दुर्लभ झलकडस्की ईगल आउल: क्यों है यह इतना खास?विशेषज्ञों की राय: पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती का संकेतपर्यटन और शोध के नए द्वारप्रमुख बिंदु:

कैमरे में कैद हुई दुर्लभ झलक

इस ऐतिहासिक साइटिंग का श्रेय युवा नेचुरलिस्ट हिमांशु तिरूवा को जाता है, जिन्होंने अपनी पैनी नजरों और धैर्य के बल पर इस दुर्लभ उल्लू के जोड़े को अपने कैमरे में कैद किया। हिमांशु के अनुसार, डस्की ईगल आउल को आखिरी बार करीब 15 साल पहले कॉर्बेट के जंगलों में रिकॉर्ड किया गया था। उसके बाद से कई पक्षी विशेषज्ञों ने इसकी तलाश की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी थी। इतने लंबे समय बाद इसे जोड़े में देखना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

डस्की ईगल आउल: क्यों है यह इतना खास?

डस्की ईगल आउल (Bubo coromandus) दक्षिण एशिया में पाया जाने वाला एक बड़ा और शक्तिशाली उल्लू है। इसकी विशेषता इसकी गहरे भूरे-धूसर रंग की पंख संरचना और इसकी आँखों का तीखापन है। अन्य उल्लुओं के विपरीत, यह प्रजाति घने पेड़ों के झुरमुट में रहना पसंद करती है और मानवीय हस्तक्षेप के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। यह पक्षी अपनी शांत प्रकृति और सतर्कता के लिए जाना जाता है, जिसके कारण इसे घने जंगलों में ढूंढ पाना लगभग नामुमकिन होता है।


विशेषज्ञों की राय: पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती का संकेत

इस दुर्लभ पक्षी की वापसी को लेकर वन विभाग और संरक्षणवादी काफी उत्साहित हैं। कुमाऊं के मुख्य वन संरक्षक (CCF) डॉ. साकेत बडोला ने इस घटना को संरक्षण प्रयासों की बड़ी जीत बताया है। उन्होंने कहा:

“कॉर्बेट और उसके आसपास के बफर जोन में जैव विविधता संरक्षण के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयास अब रंग ला रहे हैं। प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और वनों के भीतर मानवीय दखलंदाजी में आई कमी के कारण ही ऐसे दुर्लभ वन्यजीव वापस लौट रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यहाँ का फूड चेन और इकोसिस्टम पूरी तरह संतुलित है।”

वहीं, जाने-माने पक्षी प्रेमी सोमंता घोष का मानना है कि डस्की ईगल आउल का जोड़ा दिखना यह दर्शाता है कि क्षेत्र में शिकार (Prey base) की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। उल्लू जैसे शिकारी पक्षी तभी किसी क्षेत्र को अपना स्थायी निवास बनाते हैं जब वहाँ चूहों, छोटे पक्षियों और सरीसृपों की संख्या पर्याप्त हो।


पर्यटन और शोध के नए द्वार

फाटो जोन में डस्की ईगल आउल के दिखने के बाद अब यहाँ शोधकर्ताओं और बर्ड वॉचर्स (Bird Watchers) की आमद बढ़ने की उम्मीद है। फाटो पहले से ही अपनी प्राकृतिक सुंदरता और बाघों की उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन अब यह दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण केंद्र के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रजाति के प्रजनन और व्यवहार पर अध्ययन करने के लिए यह एक सुनहरा अवसर है।


प्रमुख बिंदु:

  • ऐतिहासिक वापसी: 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आधिकारिक रिकॉर्डिंग।

  • संरक्षण की सफलता: तराई पश्चिमी और कॉर्बेट क्षेत्र में बेहतर होते प्राकृतिक आवास का परिणाम।

  • नेचुरलिस्ट का योगदान: हिमांशु तिरूवा द्वारा दुर्लभ जोड़े की फोटोग्राफी।

  • पारिस्थितिकी संतुलन: शीर्ष शिकारी पक्षी की मौजूदगी स्वस्थ जंगल की निशानी।

डस्की ईगल आउल की वापसी केवल एक पक्षी का दिखना भर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के वन विभाग और स्थानीय समुदायों के संरक्षण संकल्प की जीत है। 15 साल बाद इसकी गूँज कॉर्बेट के जंगलों में सुनाई देना पर्यावरण प्रेमियों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं है। अब आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक सुरक्षित बनाने की ताकि यह दुर्लभ प्रजाति यहाँ फल-फूल सके।

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