मैहर के सरकारी स्कूल में कलेक्टर ने खुद परखी पढ़ाई की हकीकत, 9वीं-10वीं के करीब 60 छात्रों से पूछे सामान्य सवाल; एक भी विद्यार्थी नहीं दे पाया संतोषजनक जवाब
मैहर। मध्य प्रदेश के मैहर जिले में एक सरकारी स्कूल के निरीक्षण के दौरान शिक्षा व्यवस्था की ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। स्कूल में पढ़ने वाले कक्षा 9वीं और 10वीं के करीब 60 विद्यार्थियों से जब कलेक्टर ने सीधे सामान्य शैक्षणिक सवाल पूछे, तो एक भी छात्र संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। किसी से खाद और उर्वरक का अंतर पूछा गया तो किसी से भारतीय संविधान और बायोलॉजिकल सेल से जुड़े सवाल किए गए, लेकिन विद्यार्थियों की विषयगत समझ उम्मीद के मुताबिक नहीं मिली।
स्थिति देखकर मैहर कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने नाराजगी जाहिर की और स्कूल प्रबंधन की जवाबदेही तय करते हुए प्राचार्य ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह और राजनीति शास्त्र के अतिथि शिक्षक रामप्रकाश तिवारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। कलेक्टर ने शिक्षकों को साफ चेतावनी दी कि परीक्षाओं में अभी करीब पांच महीने का समय है। यदि इस अवधि में विद्यार्थियों की पढ़ाई और शैक्षणिक स्तर में सुधार नहीं हुआ तो संबंधित लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
अधिकारी बनकर नहीं, सीधे कक्षा में पहुंचीं कलेक्टर
मैहर कलेक्टर विदिशा मुखर्जी गोरसरी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के निरीक्षण के लिए पहुंचीं। आमतौर पर प्रशासनिक निरीक्षण के दौरान अधिकारी स्कूल की व्यवस्थाओं, उपस्थिति, भवन, साफ-सफाई और अन्य सुविधाओं की जानकारी लेते हैं, लेकिन इस निरीक्षण में कलेक्टर ने सीधे विद्यार्थियों के बीच पहुंचकर पढ़ाई की वास्तविक स्थिति जानने का फैसला किया।
उन्होंने कक्षा 9वीं और 10वीं के विद्यार्थियों से बातचीत की और अलग-अलग विषयों से जुड़े सवाल पूछने शुरू किए। कलेक्टर का उद्देश्य यह जानना था कि विद्यार्थी जिस कक्षा में पढ़ रहे हैं, उसके अनुरूप उन्हें विषयों की कितनी समझ है।
सवाल-जवाब शुरू हुआ तो स्थिति चिंताजनक नजर आई। करीब 60 विद्यार्थियों में से किसी भी विद्यार्थी ने पूछे गए सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इसके बाद कलेक्टर ने स्कूल में पढ़ाई की गुणवत्ता और शिक्षकों की भूमिका को लेकर गंभीर नाराजगी जताई।
खाद और उर्वरक से लेकर संविधान और सेल तक सवाल
कलेक्टर ने विद्यार्थियों से ऐसे सवाल पूछे जो उनके पाठ्यक्रम और सामान्य शैक्षणिक ज्ञान से जुड़े हुए थे। विद्यार्थियों से खाद और उर्वरक में अंतर, भारतीय संविधान और बायोलॉजिकल सेल से संबंधित प्रश्न किए गए।
इन सवालों का जवाब न मिलने पर कलेक्टर ने स्कूल में चल रही पढ़ाई को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना था कि विद्यार्थियों को केवल किताबों को पढ़ाने के बजाय विषय को समझाना भी जरूरी है। यदि छात्र कक्षा में पढ़ाई जा रही मूलभूत अवधारणाओं को नहीं समझ पा रहे हैं तो यह शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने छात्रों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि उन्हें किन विषयों में परेशानी हो रही है और स्कूल में पढ़ाई का माहौल कैसा है।
‘कलेक्टर कैसे बनते हैं?’ सवाल पर भी दिखी तैयारी की कमी
कलेक्टर ने विद्यार्थियों से सामान्य ज्ञान और प्रशासन से जुड़े सवाल भी पूछे। उन्होंने छात्रों से पूछा कि कलेक्टर कैसे बनते हैं और कलेक्टर की जिम्मेदारियां क्या होती हैं?
इस सवाल पर एक छात्रा ने जवाब दिया कि कलेक्टर स्कूल का निरीक्षण करती हैं और व्यवस्थाएं संभालती हैं। जवाब से यह स्पष्ट हुआ कि विद्यार्थियों को कलेक्टर की भूमिका की सीमित जानकारी थी।
इसके बाद कलेक्टर ने विद्यार्थियों को समझाया कि पढ़ाई केवल परीक्षा में अंक हासिल करने के लिए नहीं होती, बल्कि इससे सामान्य ज्ञान, सोचने की क्षमता और भविष्य की तैयारी भी मजबूत होती है।
विराट कोहली का नाम आया तो छात्र ने दिए सही जवाब
निरीक्षण के दौरान बातचीत का एक दिलचस्प हिस्सा उस समय सामने आया, जब विद्यार्थियों से पूछा गया कि वे भविष्य में क्या बनना चाहते हैं। एक छात्र ने भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली बनने की इच्छा जताई।
कलेक्टर ने छात्र की रुचि को समझने के लिए उससे भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के नाम पूछे। इस बार छात्र ने सवालों का सही जवाब दिया।
इस घटना ने निरीक्षण के दौरान मौजूद लोगों का ध्यान खींचा। कलेक्टर ने इसी उदाहरण के जरिए छात्रों को समझाया कि यदि वे खेल, क्रिकेट या किसी अन्य क्षेत्र में रुचि रखते हैं तो उसमें आगे बढ़ने के लिए भी मेहनत और अनुशासन जरूरी है। इसी तरह शिक्षा को लेकर भी गंभीरता और निरंतर प्रयास होना चाहिए।
यानी जिस छात्र को क्रिकेट से जुड़े खिलाड़ियों की जानकारी थी, उसी तरह यदि पढ़ाई के विषयों में भी रुचि पैदा की जाए तो उसका शैक्षणिक स्तर बेहतर किया जा सकता है।
‘एक भी बच्चे ने जवाब नहीं दिया’—कलेक्टर ने जताई नाराजगी
निरीक्षण के बाद कलेक्टर विदिशा मुखर्जी ने स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि स्कूल में करीब 60 बच्चे मौजूद थे और उनके द्वारा पूछे गए सवालों का किसी भी बच्चे ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
उन्होंने बताया कि इस मामले में प्राचार्य और अतिथि शिक्षक को नोटिस जारी किया गया है। साथ ही शिक्षकों को सुधार के लिए समय भी दिया गया है।
कलेक्टर ने कहा कि परीक्षा होने में अभी करीब पांच महीने का समय है। यदि इस दौरान पढ़ाई की व्यवस्था और विद्यार्थियों की तैयारी में सुधार नहीं हुआ तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
यह चेतावनी सिर्फ एक स्कूल तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों के शैक्षणिक स्तर और शिक्षकों की जवाबदेही को लेकर प्रशासन की गंभीरता को भी दर्शाती है।
विद्यार्थियों के बाद शिक्षकों की भी लगी ‘क्लास’
छात्रों के कमजोर प्रदर्शन के बाद कलेक्टर ने स्कूल के प्राचार्य से सभी शिक्षकों को बुलाने को कहा। इसके बाद उन्होंने शिक्षकों से भी सवाल-जवाब किए।
कलेक्टर ने यह जानने का प्रयास किया कि विद्यार्थियों की पढ़ाई किस स्तर पर चल रही है, पाठ्यक्रम कितना पूरा हुआ है और आगामी परीक्षाओं के लिए क्या तैयारी कराई जा रही है।
निरीक्षण के दौरान छात्रों की विषयगत समझ कमजोर मिलने के बाद शिक्षकों को पढ़ाई की गुणवत्ता में सुधार करने के निर्देश दिए गए। शिक्षकों को यह भी संदेश दिया गया कि विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने के बजाय विषय की मूल अवधारणाओं को समझाना जरूरी है।
प्राचार्य और अतिथि शिक्षक को कारण बताओ नोटिस
विद्यार्थियों के कमजोर शैक्षणिक स्तर और स्कूल में पढ़ाई की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने प्राचार्य ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह और राजनीति शास्त्र के अतिथि शिक्षक रामप्रकाश तिवारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
नोटिस के जरिए यह स्पष्ट किया गया है कि विद्यालय में विद्यार्थियों का शैक्षणिक स्तर अपेक्षित क्यों नहीं है और पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने के लिए अब तक क्या प्रयास किए गए हैं।
प्रशासन की ओर से संकेत दिया गया है कि यदि आने वाले महीनों में विद्यार्थियों के प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ तो जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
कलेक्टर ने उचित मूल्य दुकान और आंगनवाड़ी का भी किया निरीक्षण
स्कूल के निरीक्षण के बाद कलेक्टर ने क्षेत्र की अन्य सरकारी व्यवस्थाओं का भी जायजा लिया। उन्होंने उचित मूल्य की दुकान और आंगनवाड़ी केंद्र का निरीक्षण किया।
उचित मूल्य की दुकान पर उन्होंने सरकारी खाद्यान्न वितरण और लाभार्थियों को मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी ली। वहीं आंगनवाड़ी केंद्र में व्यवस्थाओं और शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति देखी।
कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देश दिए कि सरकार की योजनाओं का लाभ पात्र हितग्राहियों तक समय पर और पूरी पारदर्शिता के साथ पहुंचना चाहिए।
निरीक्षण ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर फिर खड़े किए सवाल
गोरसरी स्कूल की यह घटना सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती है। सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं और इन विद्यार्थियों के भविष्य की जिम्मेदारी शिक्षकों और शिक्षा विभाग पर होती है।
कक्षा 9वीं और 10वीं के विद्यार्थियों से सामान्य शैक्षणिक प्रश्न पूछे जाने पर संतोषजनक उत्तर न मिलना इस बात की ओर संकेत करता है कि केवल स्कूल में उपस्थिति और पाठ्यक्रम पूरा करना पर्याप्त नहीं है। बच्चों को वास्तव में कितना समझ आया, वे विषय को अपने शब्दों में कितना बता सकते हैं और परीक्षा के लिए कितने तैयार हैं—इन पहलुओं पर भी लगातार निगरानी जरूरी है।
कलेक्टर की कार्रवाई ने फिलहाल स्कूल प्रबंधन को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि विद्यार्थियों के शैक्षणिक प्रदर्शन में लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि नोटिस के बाद विद्यालय में पढ़ाई की व्यवस्था में कितना सुधार होता है और अगले कुछ महीनों में इन विद्यार्थियों का शैक्षणिक प्रदर्शन किस दिशा में जाता है। पांच महीने का समय मिलने के बाद यदि शिक्षक और स्कूल प्रबंधन गंभीरता से मेहनत करते हैं, तो कमजोर स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है।
मैहर के इस सरकारी स्कूल का निरीक्षण इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि कलेक्टर ने फाइलों और रिपोर्टों के बजाय सीधे बच्चों के बीच जाकर शिक्षा की वास्तविक तस्वीर देखने की कोशिश की। करीब 60 छात्रों से सवाल पूछे गए और जब जवाब नहीं मिले तो सिर्फ नाराजगी जताने तक मामला सीमित नहीं रहा, बल्कि प्राचार्य और अतिथि शिक्षक को नोटिस भी जारी किया गया। अब आने वाले महीने बताएंगे कि इस ‘कलेक्टर की क्लास’ का असर स्कूल की पढ़ाई और विद्यार्थियों के भविष्य पर कितना दिखाई देता है।
