देहरादून: उत्तराखंड में अपनी निजी गाड़ी से कमाई करने वाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। परिवहन विभाग ने अब निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ सख्ती शुरू कर दी है। यानी अगर कोई व्यक्ति अपनी निजी बाइक या कार से सवारी ढोने, खाना पहुंचाने, किराना या अन्य सामान की डिलीवरी करने जैसी व्यावसायिक गतिविधियां करता पाया गया, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। परिवहन विभाग की कार्रवाई सिर्फ चालान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों को सीज भी किया जा सकता है।
इस कार्रवाई ने खास तौर पर उन हजारों लोगों की चिंता बढ़ा दी है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए डिलीवरी का काम कर अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। डिलीवरी करने वालों का कहना है कि अगर निजी वाहन को कमर्शियल श्रेणी में बदलना पड़ा और उसके बाद टैक्स तथा अन्य खर्चों का बोझ बढ़ा, तो उनकी पहले से कम हो रही कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। कुछ डिलीवरी बॉय का कहना है कि कमाई इतनी नहीं है कि कमर्शियल वाहन से जुड़े अतिरिक्त टैक्स और खर्च आसानी से उठाए जा सकें।
रैपिडो, स्विगी, जोमैटो समेत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी नजर
देहरादून में निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए कई लोग अपनी निजी बाइक या कार का इस्तेमाल सवारी और सामान की डिलीवरी के लिए करते हैं। अब परिवहन विभाग ने ऐसे वाहनों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है।
बताया गया है कि रैपिडो, स्विगी, जोमैटो समेत अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से निजी वाहनों का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों में किया जा रहा है। ऐसे में परिवहन विभाग की नजर सिर्फ वाहन चालकों पर ही नहीं, बल्कि संबंधित प्लेटफॉर्म और कंपनियों पर भी है।
विभाग का कहना है कि निजी वाहन व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए पंजीकृत होते हैं। अगर इन्हीं वाहनों का इस्तेमाल नियमित रूप से कमाई के लिए किया जाता है, तो वह व्यावसायिक गतिविधि की श्रेणी में आ सकता है। ऐसे वाहनों के लिए परिवहन श्रेणी में पंजीकरण, वैध परमिट, फिटनेस और आवश्यक बीमा समेत दूसरे दस्तावेज जरूरी होते हैं।
निजी बाइक से डिलीवरी की तो सीज हो सकता है वाहन
परिवहन विभाग ने साफ संकेत दिया है कि अब निजी वाहन से व्यावसायिक गतिविधि करने वालों को राहत नहीं मिलने वाली। अगर जांच के दौरान कोई निजी बाइक या कार सवारी ढोते या व्यावसायिक पार्सल पहुंचाते पकड़ी जाती है, तो उसके खिलाफ चालान, वाहन सीज और अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
उप परिवहन आयुक्त शैलेश कुमार तिवारी के अनुसार कई लोग खाने-पीने की चीजों के साथ-साथ दूसरे सामान के पार्सल की डिलीवरी भी निजी वाहनों से कर रहे हैं। ऐसे लोगों को नोटिस दिए जा रहे हैं। विभाग की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर किसी व्यक्ति को अपने वाहन का व्यावसायिक इस्तेमाल करना है, तो उसे नियमों के अनुसार कमर्शियल वाहन की श्रेणी में पंजीकृत कराना होगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि नियमों का पालन नहीं करने पर वाहन सीज किया जा सकता है और सीज होने के बाद वाहन को छुड़ाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं होगी।
100 से ज्यादा दोपहिया वाहन हो चुके हैं सीज
परिवहन विभाग की कार्रवाई कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देहरादून में अब तक 100 से अधिक दोपहिया वाहनों को सीज किए जाने की बात सामने आई है।
विभाग के अधिकारी ऐसे वाहनों को पकड़ने के लिए अलग तरीका भी अपना रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक ऑनलाइन ऐप के माध्यम से वाहन बुक किए जाते हैं और जब यह पुष्टि हो जाती है कि निजी वाहन का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधि के लिए हो रहा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है।
यह तरीका इसलिए अपनाया जा रहा है क्योंकि सामान्य जांच के दौरान ऐसे वाहनों को पकड़ना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार निजी बाइक सामान्य वाहन की तरह दिखाई देती है और यह पता लगाना मुश्किल होता है कि उसका इस्तेमाल व्यक्तिगत काम के लिए हो रहा है या डिलीवरी के लिए।
कंपनियों के दफ्तर तक पहुंची कार्रवाई
परिवहन विभाग की कार्रवाई सिर्फ सड़कों पर वाहनों की जांच तक सीमित नहीं है। विभाग ने ऐप के संचालन से जुड़ी कंपनियों को भी नोटिस दिए हैं। कुछ कंपनियों के कार्यालयों में कार्रवाई और छापे की बात भी सामने आई है।
विभाग का तर्क है कि अगर किसी प्लेटफॉर्म के जरिए निजी वाहन का इस्तेमाल व्यावसायिक काम के लिए कराया जा रहा है, तो नियमों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित पक्षों की भी जिम्मेदारी है।
विभाग का तर्क—सुरक्षा से जुड़ा है पूरा मामला
परिवहन विभाग निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ कार्रवाई को सिर्फ टैक्स या परमिट का मामला नहीं मान रहा है। विभाग का कहना है कि इसके पीछे यात्रियों और सड़क सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है।
शैलेश कुमार तिवारी के अनुसार निजी वाहनों से सवारी ढोना सुरक्षित नहीं है। दुर्घटना की स्थिति में बीमा दावे को लेकर भी समस्या पैदा हो सकती है। इसके अलावा किसी आपराधिक घटना की स्थिति में वाहन और चालक से संबंधित सत्यापन तथा जवाबदेही भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
यही वजह है कि विभाग चाहता है कि व्यावसायिक गतिविधि करने वाले वाहनों के पास आवश्यक परमिट, फिटनेस, बीमा और दूसरे वैध दस्तावेज हों। विभाग के मुताबिक इससे यात्रियों की सुरक्षा और परिवहन व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहेगी।
डिलीवरी बॉय की परेशानी—कमाई से ज्यादा हो जाएगा खर्च?
परिवहन विभाग के इस फैसले का दूसरा पहलू उन लोगों से जुड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी डिलीवरी के काम पर निर्भर है। डिलीवरी करने वाले लोगों का कहना है कि वे पहले ही सीमित कमाई में पेट्रोल, वाहन की सर्विस, मोबाइल, समय और दूसरे खर्चों को संभाल रहे हैं। ऐसे में अगर निजी बाइक को कमर्शियल श्रेणी में बदलने के बाद अतिरिक्त टैक्स और दूसरे खर्च बढ़ गए, तो उनके लिए यह काम आर्थिक रूप से मुश्किल हो सकता है।
डिलीवरी बॉय राजकुमार गुप्ता ने परिवहन विभाग के फैसले पर अपनी चिंता जताई। उनका कहना है कि सामान की डिलीवरी से जितनी कमाई होती है, उससे ज्यादा रकम अगर कमर्शियल वाहन के टैक्स और अन्य खर्चों में चली जाएगी तो उनके लिए यह काम करना मुश्किल होगा।
राजकुमार के मुताबिक पहले से ही कमाई में कमी आई है और परिवार के खर्च लगातार बने हुए हैं। उनका कहना है कि अगर वाहन को कमर्शियल करवाने के बाद दूसरे राज्यों या क्षेत्रों में जाने पर भी अतिरिक्त टैक्स देना पड़ेगा, तो आर्थिक बोझ और बढ़ सकता है।
‘पहले ही कमाई कम, अब कमर्शियल वाहन का खर्च कैसे उठाएं?’
मुजफ्फरनगर निवासी डिलीवरी बॉय मोहम्मद शादिक ने भी इसी तरह की चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर निजी वाहन को कमर्शियल वाहन में बदल दिया जाता है, तो उन पर आर्थिक दबाव काफी बढ़ जाएगा।
शादिक के मुताबिक डिलीवरी का काम करने वालों की कमाई पहले ही बहुत ज्यादा नहीं है। ऊपर से अगर वाहन का कमर्शियल पंजीकरण कराया जाता है तो अतिरिक्त खर्च सामने आएंगे। उनकी एक और परेशानी यह है कि वे उसी वाहन का इस्तेमाल अपने निजी काम और घर आने-जाने के लिए भी करते हैं।
ऐसे में उनके लिए सवाल सिर्फ कमर्शियल टैक्स का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या एक ही वाहन को निजी और व्यावसायिक दोनों जरूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करने की व्यवस्था आसान होगी?
कहां-कहां चलेगा चेकिंग अभियान?
परिवहन विभाग ने देहरादून के साथ-साथ दूसरे क्षेत्रों में भी जांच अभियान चलाने का निर्णय लिया है। ऋषिकेश, विकासनगर, सहसपुर और अन्य क्षेत्रों में भी निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल की जांच की जाएगी।
इसके लिए सार्वजनिक स्थानों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशन और उन इलाकों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी जहां से निजी वाहनों के जरिए सवारी या पार्सल बुकिंग की गतिविधियां होने की संभावना रहती है।
इसका मतलब साफ है कि अब ऑनलाइन ऐप से मिलने वाली हर राइड या डिलीवरी के लिए निजी वाहन का इस्तेमाल करने वालों को अपने वाहन की श्रेणी और दस्तावेजों को लेकर सतर्क रहना होगा।
नियम जरूरी या रोजगार पर बोझ? असली बहस यही
परिवहन विभाग की कार्रवाई के पीछे सुरक्षा, परमिट व्यवस्था, बीमा और कर व्यवस्था को व्यवस्थित करने का तर्क है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सवारी और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए वाहनों का नियमन जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ डिलीवरी का काम करने वाले लोगों की परेशानी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
ऑनलाइन डिलीवरी के बढ़ते दौर में बड़ी संख्या में युवा और अन्य लोग अपनी बाइक के जरिए आय अर्जित कर रहे हैं। ऐसे में अचानक सख्ती होने से उनके सामने रोजगार और अतिरिक्त खर्च का सवाल खड़ा हो सकता है।
अब जरूरत इस बात की है कि नियमों के साथ-साथ छोटे डिलीवरी वर्कर्स के लिए ऐसी व्यवस्था पर भी विचार किया जाए, जिससे सड़क सुरक्षा और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित हो, लेकिन उनकी आजीविका पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
आगे क्या होगा?
फिलहाल परिवहन विभाग ने संकेत दे दिया है कि निजी वाहनों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी। जिन लोगों को नोटिस दिए जा रहे हैं, उन्हें नियमों के अनुसार वाहन का व्यावसायिक पंजीकरण कराने की सलाह दी जा रही है।
ऐसे में अब देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में निजी बाइक से डिलीवरी करने वालों के सामने दो रास्ते नजर आ रहे हैं—या तो वे नियमों के मुताबिक अपने वाहन को कमर्शियल श्रेणी में पंजीकृत कराएं या फिर निजी वाहन से व्यावसायिक गतिविधि बंद करें।
एक तरफ सरकार और परिवहन विभाग सड़क सुरक्षा, यात्रियों की सुरक्षा और परिवहन नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ डिलीवरी वर्कर्स की चिंता है कि कमाई सीमित होने के बीच टैक्स और अन्य खर्च बढ़ने से उनके लिए यह काम आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रहेगा।
यानी आने वाले दिनों में यह मामला सिर्फ ‘प्राइवेट या कमर्शियल वाहन’ तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि नियम, सुरक्षा और रोजगार के बीच संतुलन का बड़ा सवाल बन सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार करेगी जिसमें नियमों का पालन भी हो और डिलीवरी करने वाले छोटे कामगारों की रोजी-रोटी पर भी भारी असर न पड़े?
