गुवाहाटी: मुस्लिम तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि इस तरीके पर भारत में मौजूदा समय में कोई प्रतिबंध नहीं है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पति ने एक ही बार में तीन तलाक कहने के बजाय अलग-अलग महीनों में तीन बार तलाक का उच्चारण करने का दावा किया था।
मामला गुवाहाटी हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण देव चौधरी की अदालत के सामने पहुंचा। याचिकाकर्ता ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन देने का दावा करते हुए उसके पंजीकरण की मांग की थी। हालांकि अदालत ने सीधे पुराने प्राधिकरण को तलाकनामा दर्ज करने का निर्देश देने के बजाय स्पष्ट किया कि अब ऐसे मामलों का पंजीकरण असम कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एंड डिवोर्स एक्ट, 2024 के तहत संबंधित रजिस्ट्रार के माध्यम से होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले संबंधित अधिकारी को यह जांच करनी होगी कि तलाक वास्तव में याचिकाकर्ता ने ही दिया है या नहीं। साथ ही पहचान और कानून के तहत जरूरी शर्तों की भी जांच की जाएगी। वहीं पत्नी की गैरमौजूदगी को उसके अधिकार खत्म होने के तौर पर नहीं देखा गया है। यदि वह चाहे तो सक्षम न्यायिक या कानूनी मंच के सामने इस तलाक को चुनौती दे सकती है।
क्या है पूरा मामला?
गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने पहुंचे मामले में याचिकाकर्ता की शादी वर्ष 2016 में हुई थी। याचिका में बताया गया कि शादी के कुछ वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ने लगे। दोनों के बीच रिश्ते में लगातार तनाव बना रहा और याचिकाकर्ता के अनुसार वर्ष 2018 में पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर चली गई।
इसके बाद पति-पत्नी के बीच संबंधों को सुधारने और विवाद को खत्म करने के लिए कई बार सुलह और समझौते की कोशिश की गई। लेकिन याचिकाकर्ता के अनुसार इन प्रयासों का कोई स्थायी परिणाम नहीं निकला।
जब रिश्ते को सामान्य करने की कोशिशें सफल नहीं हुईं, तो पति ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया अपनाने का दावा किया।
याचिकाकर्ता के मुताबिक उसने 22 मार्च 2026, 26 अप्रैल 2026 और 27 मई 2026 को अलग-अलग मौकों पर तलाक का उच्चारण किया। इसके बाद उसने तलाक के पंजीकरण के लिए संबंधित प्राधिकरण के सामने आवेदन किया।
लेकिन यहीं से कानूनी विवाद शुरू हुआ और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
एक साथ तीन तलाक नहीं, अलग-अलग मौकों पर उच्चारण
इस मामले को समझने के लिए ‘तलाक-ए-हसन’ और ‘तलाक-ए-बिद्दत’ के बीच अंतर समझना जरूरी है।
तलाक-ए-हसन में पति द्वारा तलाक का उच्चारण एक ही समय में तीन बार करने के बजाय अलग-अलग अंतराल पर किया जाता है। परंपरागत रूप से इसके बीच अंतर रखने का उद्देश्य पति-पत्नी को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने और सुलह की संभावना तलाशने का अवसर देना माना जाता है।
वहीं तलाक-ए-बिद्दत, जिसे आम तौर पर ‘तत्काल तीन तलाक’ के रूप में जाना जाता है, में एक ही बैठक या एक ही समय में तीन तलाक कहकर तत्काल वैवाहिक संबंध समाप्त करने का प्रयास किया जाता है।
भारत में तत्काल तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2017 का फैसला महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में तलाक के अलग-अलग रूपों को एक ही नजर से देखना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
गुवाहाटी हाईकोर्ट के सामने भी यही महत्वपूर्ण सवाल था कि याचिकाकर्ता द्वारा दावा किया गया तलाक-ए-हसन उस कानूनी स्थिति के अंतर्गत आता है या नहीं, जिस पर भारत में प्रतिबंध लगाया गया है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अरुण देव चौधरी की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा अपनाए गए तलाक-ए-हसन पर भारत में प्रतिबंध नहीं है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति केवल अपने दावे के आधार पर तलाक को स्वतः पंजीकृत करा सकता है।
अदालत ने तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
कोर्ट ने पुराने बारपेटा प्राधिकरण के माध्यम से तलाकनामा पंजीकृत कराने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। इसकी वजह यह थी कि जिस पुराने कानून के तहत वह व्यवस्था चलती थी, वह अब लागू नहीं है।
अदालत ने इसके बजाय याचिकाकर्ता को नए कानून के तहत सक्षम अधिकारी के पास जाने को कहा।
1935 का कानून खत्म, 2024 के कानून के तहत होगा पंजीकरण
मामले में एक अहम कानूनी पेच असम में मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण से जुड़े पुराने कानून को लेकर था।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि 1935 में लागू कानून अब समाप्त किया जा चुका है। इसलिए उस पुराने कानून के तहत नियुक्त प्राधिकरण के पास अब तलाक का पंजीकरण करने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने भी इस स्थिति को स्वीकार किया और कहा कि पुराने कानून के तहत बनाए गए पद और प्राधिकरण के जरिए अब तलाक का पंजीकरण नहीं कराया जा सकता।
इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ता को असम कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एंड डिवोर्स एक्ट, 2024 के तहत क्षेत्राधिकार वाले मैरिज एंड डिवोर्स रजिस्ट्रार से संपर्क करने का निर्देश दिया।
यानी अदालत ने सीधे यह नहीं कहा कि संबंधित तलाक अंतिम रूप से पंजीकृत हो गया है। बल्कि उसने कानून के तहत उचित प्रक्रिया अपनाने का रास्ता बताया है।
रजिस्ट्रार पहले करेगा दावे की जांच
हाईकोर्ट के निर्देश के मुताबिक संबंधित रजिस्ट्रार को कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच करनी होगी।
सबसे पहले यह देखा जाएगा कि तलाक का दावा वास्तव में याचिकाकर्ता ने ही किया है या नहीं। इसके लिए पहचान और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किया जाएगा।
इसके बाद यह भी देखा जाएगा कि तलाक का पंजीकरण 2024 के कानून की धारा 12 के तहत किया जा सकता है या नहीं।
इसका मतलब यह है कि केवल ‘तलाक-ए-हसन भारत में प्रतिबंधित नहीं है’ कह देने भर से पंजीकरण स्वतः नहीं हो जाता। संबंधित कानूनी प्रक्रिया और आवश्यक सत्यापन पूरा होना जरूरी है।
यदि रजिस्ट्रार पंजीकरण करने से इनकार करता है, तो याचिकाकर्ता के पास 2024 के कानून की धारा 17 के तहत अपील करने का अधिकार भी रहेगा।
पत्नी सुनवाई में नहीं पहुंची, फिर भी अधिकार सुरक्षित
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू पत्नी की अनुपस्थिति भी है।
रिकॉर्ड के अनुसार पत्नी को अदालत की कार्यवाही की जानकारी देने के लिए नोटिस भेजे गए थे, लेकिन वह सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित नहीं हुई।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने उसकी गैरमौजूदगी को उसके अधिकारों की समाप्ति नहीं माना।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी इस तलाक को चुनौती देना चाहती है, तो वह किसी सक्षम न्यायिक या कानूनी मंच का रुख कर सकती है।
यानी पति द्वारा तलाक-ए-हसन का दावा किए जाने और पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू होने का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी के लिए सभी कानूनी रास्ते बंद हो गए हैं।
क्या तलाक-ए-हसन को कोर्ट ने ‘पूरी तरह वैध’ घोषित किया?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी का अर्थ यह नहीं है कि इस विशेष मामले में बिना किसी जांच के तलाक को अंतिम रूप से प्रमाणित कर दिया गया है। अदालत ने यह कहा कि तलाक-ए-हसन भारत में प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन पंजीकरण के लिए संबंधित कानून के तहत प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
यानी इस मामले में तलाक के दावे की जांच, पहचान का सत्यापन और 2024 के कानून के तहत आवश्यक प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।
इसलिए इसे सीधे तौर पर ऐसा फैसला समझना सही नहीं होगा कि हर मामले में तीन अलग-अलग मौकों पर तलाक कह देने से विवाह स्वतः और तुरंत कानूनी रूप से समाप्त हो जाएगा।
तलाक-ए-हसन और तत्काल तीन तलाक में बड़ा अंतर
मुस्लिम तलाक की चर्चा होने पर अक्सर ‘तीन तलाक’ शब्द सामने आता है, लेकिन सभी प्रक्रियाओं को एक जैसा समझना सही नहीं है।
तलाक-ए-बिद्दत में एक ही समय में तीन तलाक कहकर तत्काल विवाह समाप्त करने की परंपरा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 में महत्वपूर्ण फैसला दिया था।
इसके विपरीत तलाक-ए-हसन में तलाक के उच्चारण अलग-अलग अंतराल पर किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में पुनर्विचार और सुलह के लिए समय का पहलू जुड़ा हुआ माना जाता है।
यही अंतर इस मामले में भी महत्वपूर्ण रहा। याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह दावा किया कि उसने तीन अलग-अलग तारीखों पर तलाक का उच्चारण किया था, न कि एक ही बार में तीन तलाक दिया।
असम का 2024 कानून क्यों है महत्वपूर्ण?
इस मामले में असम का नया कानून भी बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य में मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया को नए कानूनी ढांचे के तहत व्यवस्थित किया गया है।
असम कंपल्सरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेज एंड डिवोर्स एक्ट, 2024 ने पुराने 1935 के कानून की जगह ली है। इसका उद्देश्य मुस्लिम विवाह और तलाक के पंजीकरण को एक नई कानूनी व्यवस्था के तहत लाना है।
नए कानून के तहत रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने के साथ-साथ रिकॉर्ड रखने और संबंधित मामलों की निगरानी का रास्ता भी तैयार होता है।
असम सरकार की ओर से इस तरह के कानून के पीछे विवाह पंजीकरण को व्यवस्थित करने और नाबालिग विवाह जैसे मामलों पर निगरानी मजबूत करने की बात कही गई है।
गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने पुराने कानून के बजाय नए कानून के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया है।
क्या इस फैसले से हर मुस्लिम तलाक के मामले पर असर पड़ेगा?
हाईकोर्ट का यह आदेश अपने आप में एक विशेष मामले से जुड़ा है। इसलिए इसे हर मुस्लिम विवाह और तलाक के मामले पर लागू होने वाला स्वतः आदेश समझना उचित नहीं होगा।
हर मामले में परिस्थितियां, दस्तावेज, तलाक की प्रक्रिया, पक्षकारों की स्थिति और लागू कानून अलग हो सकते हैं। खासकर जब पत्नी तलाक को चुनौती देती है या तलाक की प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आता है, तब सक्षम न्यायिक मंच पर मामला अलग तरीके से विचाराधीन हो सकता है।
इस मामले में भी हाईकोर्ट ने पत्नी के चुनौती देने के अधिकार को बरकरार रखा है।
फैसले का सबसे अहम संदेश क्या है?
गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने एक तरफ तलाक-ए-हसन को भारत में प्रतिबंधित न होने की बात कही, वहीं दूसरी तरफ यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे तलाक के पंजीकरण के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
पुराने कानून के तहत नियुक्त प्राधिकरण अब तलाक पंजीकृत नहीं कर सकता और संबंधित व्यक्ति को नए 2024 कानून के तहत सक्षम रजिस्ट्रार के पास जाना होगा।
साथ ही पत्नी की गैरमौजूदगी को उसके अधिकारों का अंत नहीं माना गया है। यदि वह चाहे तो कानूनी मंच पर जाकर तलाक को चुनौती दे सकती है।
इस तरह यह मामला सिर्फ ‘तीन महीने में तीन बार तलाक’ की चर्चा तक सीमित नहीं है। इसके भीतर मुस्लिम पर्सनल लॉ, तलाक के अलग-अलग तरीके, विवाह और तलाक के पंजीकरण, पुराने और नए कानून तथा पति-पत्नी के कानूनी अधिकार जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।
फिलहाल इस मामले में आगे की प्रक्रिया नए असम कानून के तहत संबंधित रजिस्ट्रार के सामने होगी। वहीं यदि पंजीकरण से इनकार होता है तो कानून में निर्धारित अपील का रास्ता भी उपलब्ध रहेगा। दूसरी ओर पत्नी के पास भी सक्षम न्यायिक या कानूनी मंच पर इस तलाक को चुनौती देने का अधिकार सुरक्षित है।
यही वजह है कि गुवाहाटी हाईकोर्ट का यह आदेश मुस्लिम तलाक से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों की भूमिका को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
