रुद्रप्रयाग: किताबें केवल कागज के पन्नों का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि वे ज्ञान, विचार और अनुभव की ऐसी धरोहर हैं, जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचते हुए समाज को नई दिशा देने का काम करती हैं। इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी आईएएस विशाल मिश्रा की पहल ‘एक पुस्तक दान करें, ज्ञान का वृक्ष लगाएं’ अब धीरे-धीरे एक बड़े जनअभियान का रूप लेती जा रही है। अभियान के तहत अब तक 2500 से अधिक पुस्तकें एकत्रित की जा चुकी हैं। खास बात यह है कि इस पहल को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का भी समर्थन मिला है और उन्होंने अभियान के तहत 151 पुस्तकें दान की हैं।
घर की अलमारियों और पुराने बक्सों में लंबे समय से अनुपयोगी पड़ी किताबें अब उन विद्यार्थियों और पाठकों के लिए ज्ञान का माध्यम बन रही हैं, जिन्हें पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उपयोगी अध्ययन सामग्री की आवश्यकता है। इस पहल ने यह संदेश भी दिया है कि किसी के लिए अनुपयोगी हो चुकी एक किताब किसी दूसरे विद्यार्थी के लिए उसके भविष्य की राह आसान कर सकती है।
किताबों के महत्व को समझने का संदेश दे रही पहल
अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को किताबें पढ़ने का बेहद शौक था। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसिद्ध विचार है कि सबसे अच्छा मित्र वह है जो ऐसी किताब दे, जिसे व्यक्ति ने अभी तक नहीं पढ़ा हो। यह बात अपने आप में किताबों की महत्ता को दर्शाती है। किताबें मनुष्य के ज्ञान का विस्तार करती हैं, सोचने की क्षमता विकसित करती हैं और नए विचारों से परिचित कराती हैं।
रुद्रप्रयाग में शुरू किया गया यह अभियान भी इसी विचार को आगे बढ़ाने का प्रयास है। जिलाधिकारी विशाल मिश्रा की पहल का उद्देश्य केवल पुस्तकें इकट्ठा करना नहीं है, बल्कि पढ़ने की आदत और अध्ययन की संस्कृति को समाज में मजबूत करना है। खासकर उन विद्यार्थियों तक किताबें पहुंचाना इस अभियान की प्राथमिकता है, जो महंगी अध्ययन सामग्री खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
2500 से ज्यादा किताबें बनीं ज्ञान की पूंजी
‘एक पुस्तक दान करें, ज्ञान का वृक्ष लगाएं’ अभियान के तहत अब तक 2500 से अधिक पुस्तकें एकत्रित हो चुकी हैं। इन पुस्तकों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से जुड़ी किताबें, सामान्य ज्ञान, साहित्य, उपन्यास, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पुस्तकें और विभिन्न विषयों से संबंधित अध्ययन सामग्री शामिल है।
इन किताबों को जिले के विभिन्न पुस्तकालयों तक पहुंचाया जा रहा है, जहां विद्यार्थी और अन्य पाठक इन्हें निःशुल्क पढ़ सकते हैं। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा उन युवाओं को मिल रहा है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और जिन्हें अलग-अलग विषयों की किताबों की जरूरत होती है।
कई बार आर्थिक कारणों से विद्यार्थी सभी आवश्यक पुस्तकें नहीं खरीद पाते। ऐसे में पुस्तकालय उनके लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र बन सकते हैं। दान के माध्यम से पुस्तकालयों में पुस्तकों की संख्या बढ़ने से विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर विभिन्न विषयों की अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो रही है।
मुख्यमंत्री धामी ने दान की 151 पुस्तकें
इस अभियान को उस समय और मजबूती मिली, जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इससे जुड़े और उन्होंने 151 पुस्तकें दान कीं। मुख्यमंत्री के इस योगदान ने अभियान को व्यापक पहचान देने के साथ ही अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों को भी पुस्तक दान के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद जिले के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और अन्य नागरिक भी अपनी उपयोगी पुस्तकें अभियान के लिए उपलब्ध कराने के लिए आगे आए। इस तरह एक प्रशासनिक पहल धीरे-धीरे जनसहभागिता से जुड़ती गई और अब इसे लोगों का अपना अभियान माना जाने लगा है।
एक किताब, कई विद्यार्थियों के भविष्य में रोशनी
इस अभियान की सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक व्यक्ति द्वारा दान की गई पुस्तक सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। एक ही किताब को कई विद्यार्थी पढ़ सकते हैं और उससे ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। यानी एक पुस्तक कई पाठकों के जीवन में उपयोगी साबित हो सकती है।
इसी वजह से इस अभियान का नाम ‘एक पुस्तक दान करें, ज्ञान का वृक्ष लगाएं’ भी अपने आप में बेहद सार्थक है। जैसे एक पेड़ समय के साथ बढ़कर अनेक लोगों को छाया, फल और जीवन देता है, उसी तरह एक पुस्तक भी लगातार कई लोगों तक ज्ञान पहुंचा सकती है।
एक विद्यार्थी किसी पुस्तक से परीक्षा की तैयारी कर सकता है, दूसरा उससे सामान्य ज्ञान हासिल कर सकता है और कोई तीसरा पाठक उसी पुस्तक के माध्यम से साहित्य या किसी नए विषय को समझ सकता है। इस तरह पुस्तक दान का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।
पढ़ने की संस्कृति को मिल रही नई दिशा
आज के डिजिटल दौर में जब मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने युवाओं के समय का बड़ा हिस्सा घेर लिया है, ऐसे समय में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना अपने आप में महत्वपूर्ण पहल है। रुद्रप्रयाग में चल रहा यह अभियान लोगों को किताबों से दोबारा जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
पुस्तकालयों में अलग-अलग विषयों की किताबों की उपलब्धता से विद्यार्थियों को नियमित अध्ययन के लिए बेहतर माहौल मिल रहा है। वहीं, आम लोग भी अपनी पुरानी लेकिन उपयोगी किताबों को घर में बंद रखने के बजाय किसी जरूरतमंद पाठक तक पहुंचाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
यह अभियान समाज में यह सोच विकसित कर रहा है कि किताब को केवल वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान की विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए।
डीएम विशाल मिश्रा की आम जनता से अपील
जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने आम जनता से इस अभियान से जुड़ने की अपील की है। उनका कहना है कि लोग अपने घरों में मौजूद ऐसी उपयोगी किताबें, जिनका अब नियमित इस्तेमाल नहीं हो रहा है, उन्हें दान कर सकते हैं। इन पुस्तकों को जनपद के पुस्तकालयों में उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि विद्यार्थी और अन्य पाठक उनका लाभ उठा सकें।
डीएम की अपील का असर भी दिखाई दे रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ आम नागरिक भी इस मुहिम में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। इससे अभियान केवल प्रशासन तक सीमित न रहकर समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच रहा है।
पुस्तकालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मिल रहा लाभ
पुस्तकालय में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों का कहना है कि अभियान के बाद उन्हें अलग-अलग विषयों से जुड़ी उपयोगी पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिल रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ-साथ सामान्य अध्ययन और साहित्य से संबंधित पुस्तकों की उपलब्धता उनकी तैयारी में मददगार साबित हो रही है।
विशेष रूप से उन छात्रों के लिए यह पहल महत्वपूर्ण है, जिनके लिए हर विषय की किताब खरीदना आसान नहीं है। ऐसे विद्यार्थियों को पुस्तकालय में एक साथ कई विकल्प मिल रहे हैं। इससे उनकी पढ़ाई का खर्च कम होने के साथ-साथ अध्ययन के लिए बेहतर संसाधन भी उपलब्ध हो रहे हैं।
आध्यात्मिक और साहित्यिक विरासत वाले रुद्रप्रयाग में अनूठी पहल
रुद्रप्रयाग केवल उत्तराखंड का एक जिला नहीं, बल्कि धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां केदारनाथ धाम, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर, त्रियुगीनारायण, कालीमठ, कार्तिक स्वामी और ओंकारेश्वर जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मौजूद हैं।
रुद्रप्रयाग की पहचान साहित्य और आध्यात्मिक परंपराओं से भी जुड़ी हुई है। महान साहित्यकार कालिदास के जन्मस्थान के रूप में कविल्ठा गांव का उल्लेख किया जाता है। ऐसे क्षेत्र में ज्ञान और पुस्तकों को लोगों तक पहुंचाने की यह पहल अपने आप में विशेष महत्व रखती है।
2500 से अधिक पुस्तकों का एकत्रित होना इस बात का संकेत है कि अभियान को लोगों का समर्थन मिल रहा है। प्रशासन की पहल जब जनता की भागीदारी से जुड़ती है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो जाता है।
ज्ञान बांटने का अभियान बन रहा सामाजिक आंदोलन
‘एक पुस्तक दान करें, ज्ञान का वृक्ष लगाएं’ केवल किताबें इकट्ठा करने की मुहिम नहीं, बल्कि समाज में ज्ञान साझा करने और पढ़ने की संस्कृति को मजबूत करने का प्रयास है। एक ओर जहां घरों में लंबे समय से बंद पड़ी किताबों को नया उपयोग मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद विद्यार्थियों को अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो रही है।
रुद्रप्रयाग में शुरू हुई यह पहल यह संदेश दे रही है कि समाज में बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी एक छोटी सी पहल भी बड़ी सोच को जन्म दे सकती है। एक व्यक्ति द्वारा दान की गई एक किताब कई विद्यार्थियों के लिए उपयोगी बन सकती है और उनके ज्ञान को नई दिशा दे सकती है।
यही वजह है कि डीएम विशाल मिश्रा की यह पहल अब प्रशासनिक कार्यक्रम से आगे बढ़कर जनभागीदारी और ज्ञान के प्रसार की मुहिम बनती दिखाई दे रही है। 2500 से अधिक पुस्तकों का संग्रह इस अभियान की शुरुआती सफलता है, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य तब पूरा होगा, जब अधिक से अधिक लोग अपनी उपयोगी पुस्तकों को दान करेंगे और पुस्तकालयों के माध्यम से ज्ञान का यह सिलसिला लगातार आगे बढ़ेगा।
एक किताब किसी एक व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन वही किताब जब कई लोगों तक पहुंचती है तो वह ज्ञान का ऐसा वृक्ष बन जाती है, जिसकी छाया आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सकती है।
