
नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) के मामलों में अक्सर अदालतों को पेचीदा स्थितियों का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक मामला देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सामने आया, जहाँ एक पति की आय और पत्नी की गुजारे भत्ते की मांग के बीच के अंतर ने जजों को भी चौंका दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ झारखंड के एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई कर रही थी, जहाँ कानून की बारीकियों के साथ-साथ एक मध्यमवर्गीय परिवार की आर्थिक मजबूरियों का कच्चा चिट्ठा भी खुला।
मामले की पृष्ठभूमि: 22 साल का रिश्ता और विवाद की जड़
यह मामला झारखंड के बोकारो का है। दंपती की शादी साल 2002 में हुई थी। शुरुआती साल सामान्य रहे और 2003 में उन्हें एक बेटा तथा 2005 में एक बेटी हुई। हालांकि, समय बीतने के साथ रिश्तों में कड़वाहट आ गई और साल 2016 से दोनों अलग रह रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि दोनों बच्चे अपने पिता के साथ ही रह रहे हैं, जिसका हवाला पति के वकील ने अदालत में दिया।
अदालत की टिप्पणी: ‘पत्नी को साथ रखिए, वह खाना बनाएगी’
सुनवाई के दौरान जब पीठ ने पति को अपनी पत्नी को ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का सुझाव दिया, तो पति के वकील जॉर्ज पोथन पूथिकोटे ने जो तथ्य रखे, उसने अदालत को हैरान कर दिया। वकील ने बताया कि पति बोकारो के एक कार शोरूम में काम करता है और उसकी दैनिक आय मात्र ₹325 है। यानी महीने भर की कुल कमाई लगभग ₹9,750 बैठती है।
इस पर पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि आप गुजारा भत्ता नहीं दे सकते, तो अपनी पत्नी को साथ रखिए। वह आपके और बच्चों के लिए खाना बनाएगी।” हालांकि, पति की ओर से पेश वकील ने इस विकल्प को असंभव बताया। उन्होंने तर्क दिया कि पत्नी ने पति और उसके वृद्ध माता-पिता के खिलाफ गंभीर आपराधिक शिकायतें दर्ज कराई हैं, जिसके बाद वैवाहिक संबंधों का सामान्य होना अब मुमकिन नहीं है।
वित्तीय क्षमता बनाम भरण-पोषण की मांग
पति के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाया। उन्होंने कहा:
“माननीय न्यायालय ने पूर्व में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि भरण-पोषण या गुज़ारा भत्ता निर्धारित करते समय पति की वित्तीय क्षमता के साथ-साथ उसके वर्तमान दायित्वों और देनदारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।”
वकील ने अदालत को बताया कि पति अपनी सीमित आय में अपने दो बच्चों की परवरिश कर रहा है और बाकी खर्चों के लिए वह अपने भाइयों और माता-पिता की मदद पर निर्भर है। ऐसे में अपनी कुल आय से अधिक का गुजारा भत्ता देना उसके लिए व्यावहारिक रूप से असंभव है।
लाखों की मांग और ‘जमीन बेचकर’ दिया गया हर्जाना
मामले की गहराई में जाने पर पता चला कि तलाक की प्रक्रिया के दौरान पहले अदालत ने पति को ₹6 लाख एकमुश्त देने का आदेश दिया था। पति के पास इतनी रकम नहीं थी, जिसके बाद उसके पिता ने अपनी जमीन बेचकर यह राशि पत्नी को दिलाई थी।
विवाद तब और बढ़ गया जब पत्नी ने इस राशि को अपर्याप्त बताया। अब पत्नी की ओर से ₹30 लाख एकमुश्त और ₹12,500 प्रति माह गुजारे भत्ते की मांग की जा रही है। पति पक्ष का तर्क है कि जब कुल आय ही ₹10,000 से कम है, तो इतनी भारी-भरकम राशि की मांग न्यायसंगत नहीं है।
कंपनी के वेतन पर कोर्ट का संदेह
पीठ ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि एक कार शोरूम में काम करने वाले व्यक्ति को इतना कम वेतन क्यों मिल रहा है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि वह उस कंपनी से संपर्क कर स्पष्टीकरण मांग सकती है। इस पर बचाव पक्ष के वकील ने चुटकी लेते हुए कहा कि यदि कोर्ट हस्तक्षेप करता है, तो यह अन्य कर्मचारियों के वेतन वृद्धि के लिए भी अच्छा रहेगा। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित (Reserved) रख लिया है।
क्या कहता है कानून?
यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती पेश करता है। एक तरफ पत्नी के सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है, तो दूसरी तरफ पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति। रजनीश बनाम नेहा मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि गुजारा भत्ता तय करते समय दोनों पक्षों की संपत्ति और देनदारियों का विस्तृत हलफनामा लिया जाना चाहिए। बोकारो के इस मामले में आने वाला फैसला भविष्य के ऐसे कई मामलों के लिए नजीर साबित होगा।


