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NCERT की किताब पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी: न्यायपालिका पर टिप्पणी को लेकर SC ने लिया स्वत: संज्ञान, कल होगी बड़ी सुनवाई

The Hill India News
Last updated: February 25, 2026 3:22 pm
The Hill India News
Published: February 25, 2026
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नई दिल्ली: देश की शिक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका के बीच एक नया टकराव पैदा होता दिख रहा है। NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) की आठवीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका को लेकर की गई कुछ टिप्पणियों ने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लिया है। अब इस पूरे विवाद पर गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय विशेष बेंच सुनवाई करेगी।

Contents
CJI की बेंच करेगी सुनवाई: कौन-कौन हैं शामिल?क्या है विवाद की जड़? NCERT की किताब में क्या लिखा है?सरकार का रुख: “छात्रों के लिए प्रेरणादायक होनी चाहिए शिक्षा”न्यायपालिका के सामने असली चुनौतियां बनाम अकादमिक चित्रणसुनवाई के संभावित परिणाम: क्या किताब से हटेगा हिस्सा?शिक्षा और सम्मान का संतुलन

CJI की बेंच करेगी सुनवाई: कौन-कौन हैं शामिल?

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश ने किताब में न्यायपालिका के खिलाफ लिखी गई बातों पर गहरी अप्रसन्नता व्यक्त की है। यह सुनवाई न केवल किताब के कंटेंट को तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि शिक्षण सामग्री में संवैधानिक संस्थाओं के चित्रण की सीमा क्या होनी चाहिए।


क्या है विवाद की जड़? NCERT की किताब में क्या लिखा है?

विवाद की शुरुआत तब हुई जब NCERT की कक्षा 8 की नई सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों पर एक अध्याय शामिल किया गया। इस चैप्टर में कुछ ऐसी बातें लिखी गई हैं जिन्हें सरकार और कानूनी विशेषज्ञों ने ‘नकारात्मक’ करार दिया है।

किताब में मौजूद आपत्तिजनक बिंदु:

  1. भ्रष्टाचार का जिक्र: किताब में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि भारतीय अदालतों को जिन प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उनमें भ्रष्टाचार भी एक है।

  2. लंबित मामलों का डेटा: अदालतों में करोड़ों की संख्या में पेंडिंग केसों का विवरण देते हुए इसे न्यायपालिका की विफलता के रूप में दर्शाने की कोशिश की गई है।

  3. जस्टिस गवई का उद्धरण: सबसे अधिक आपत्ति जस्टिस बी.आर. गवई के एक बयान को शामिल करने पर जताई गई है। किताब में उनके हवाले से न्यायपालिका के भीतर की खामियों और सिस्टम की कमजोरियों की बात कही गई है।


सरकार का रुख: “छात्रों के लिए प्रेरणादायक होनी चाहिए शिक्षा”

सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि स्कूली छात्रों के लिए शिक्षा प्रेरणादायक और सकारात्मक होनी चाहिए। आठवीं कक्षा के छोटे बच्चों के मन में देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के प्रति अविश्वास का भाव पैदा करना कतई उचित नहीं है।

सूत्रों ने बताया कि जस्टिस गवई जैसे वरिष्ठ न्यायाधीश को इस संदर्भ में कोट करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। सरकार का मानना है कि एनसीईआरटी को ऐसी चीजें लिखने से बचना चाहिए था जो संस्थागत विश्वसनीयता को कम करती हों।


न्यायपालिका के सामने असली चुनौतियां बनाम अकादमिक चित्रण

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय न्यायपालिका लंबित मामलों (Pending Cases) के बोझ तले दबी हुई है। लेकिन विवाद इस बात पर है कि क्या इसे छोटे बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में ‘भ्रष्टाचार’ जैसे शब्दों के साथ पेश किया जाना चाहिए?

विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य आलोचनात्मक सोच विकसित करना है, लेकिन न्यायपालिका जैसे लोकतंत्र के स्तंभ को केवल चुनौतियों और खामियों के चश्मे से दिखाना संतुलित दृष्टिकोण नहीं है। सरकार की ओर से संकेत मिले हैं कि विवादित हिस्से को जल्द ही पाठ्यक्रम से हटाया जा सकता है।


सुनवाई के संभावित परिणाम: क्या किताब से हटेगा हिस्सा?

कल होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट निम्नलिखित पहलुओं पर गौर कर सकता है:

  • क्या एनसीईआरटी ने न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है?

  • क्या कक्षा 8 के छात्रों के लिए न्यायपालिका की आंतरिक कमियों का अध्ययन शैक्षणिक रूप से अनिवार्य है?

  • जस्टिस गवई के बयान को बिना संदर्भ के इस्तेमाल करने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

माना जा रहा है कि कोर्ट एनसीईआरटी को कंटेंट संशोधित करने या उस विशेष अध्याय को हटाने का आदेश दे सकता है। सरकार पहले ही अपनी ओर से आपत्ति दर्ज करा चुकी है, जिससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में किताब में बड़े बदलाव तय हैं।


शिक्षा और सम्मान का संतुलन

लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका सर्वोपरि है। जहाँ एक ओर सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे छात्रों को देश के संस्थानों के प्रति सम्मान सिखाएं। NCERT विवाद ने एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है—क्या सच कड़वा ही क्यों न हो, उसे स्कूली बच्चों के सामने परोसना चाहिए या फिर एक सकारात्मक छवि का निर्माण करना प्राथमिकता होनी चाहिए? कल सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस बहस को एक नई दिशा देगा।

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