
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा एक बार फिर सुर्खियों में हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान को दी गई उनकी सख्त चेतावनी का वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस घटनाक्रम ने चुनावी निष्पक्षता, प्रशासनिक भूमिका और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
क्या है पूरा मामला?
दक्षिण 24 परगना जिले में चुनाव के दौरान ऑब्जर्वर के रूप में तैनात अजय पाल शर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में वह फाल्टा विधानसभा क्षेत्र से टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान को चेतावनी देते नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि स्थानीय लोगों की ओर से शिकायत मिली थी कि उम्मीदवार के समर्थक मतदाताओं को धमका रहे हैं।
इसी शिकायत के आधार पर अजय पाल शर्मा केंद्रीय बलों के साथ मौके पर पहुंचे और कथित तौर पर सख्त लहजे में कहा कि यदि डराने-धमकाने की शिकायतें दोबारा मिलीं तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उनके बयान—“अच्छे से खबर लेंगे”—को लेकर विवाद खड़ा हो गया और इसे लेकर विपक्ष ने सवाल उठाने शुरू कर दिए।
सियासत भी गरमाई
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों में निष्पक्षता बनाए रखने के बजाय केंद्र सरकार अपने “परीक्षित अधिकारियों” को दूसरे राज्यों में भेज रही है। उनके इस बयान के बाद मामला और ज्यादा राजनीतिक रंग ले गया।
वहीं, दक्षिण 24 परगना जिला राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह क्षेत्र टीएमसी के वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इस तरह की घटना ने राजनीतिक संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है।
कौन हैं अजय पाल शर्मा?
अजय पाल शर्मा 2011 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। उनकी पहचान एक सख्त और तेज-तर्रार अफसर के रूप में होती रही है। पुलिसिंग के अपने अलग अंदाज के कारण उन्हें अक्सर “यूपी का सिंघम” और “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” जैसे नामों से भी जाना जाता है।
उनका जन्म 26 अक्टूबर 1985 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। उन्होंने न केवल सिविल सेवा में सफलता हासिल की बल्कि डेंटल साइंस की पढ़ाई भी की है, जिससे वह पेशे से डॉक्टर भी रहे हैं। 2011 में आईपीएस सेवा में शामिल होने के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिलों में जिम्मेदार पदों पर काम किया है।
हाल ही में उन्हें पदोन्नति देकर डीआईजी रैंक दी गई थी। उनकी कार्यशैली अक्सर चर्चा में रहती है—कभी अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई को लेकर तो कभी अपने बयानों के कारण।
प्रशासनिक सख्ती या राजनीतिक विवाद?
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है। एक पक्ष का कहना है कि चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और यदि शिकायतें मिलती हैं तो सख्त कदम उठाना जरूरी होता है। वहीं, दूसरा पक्ष इसे “अत्यधिक आक्रामक रवैया” बताते हुए सवाल उठा रहा है कि क्या इस तरह की भाषा एक ऑब्जर्वर के पद पर बैठे अधिकारी के लिए उचित है।
आगे क्या?
वीडियो के वायरल होने के बाद चुनाव आयोग की भूमिका और अधिकारियों के आचरण को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अब देखना होगा कि इस मामले में कोई आधिकारिक जांच या स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।
फिलहाल, अजय पाल शर्मा एक बार फिर सुर्खियों में हैं—इस बार अपनी कार्रवाई से ज्यादा अपने शब्दों को लेकर। बंगाल चुनाव के बीच यह विवाद आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है।



