उत्तराखंडफीचर्ड

नैनीताल: तिहरे हत्याकांड के दोषी की फांसी की सजा पर हाईकोर्ट में सुनवाई, ‘मानसिक स्वास्थ्य’ को लेकर सरकार से जवाब तलब

नैनीताल। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में हुए उस रोंगटे खड़े कर देने वाले तिहरे हत्याकांड में, जिसने 2014 में पूरे प्रदेश को हिला कर रख दिया था, अब कानूनी दांव-पेंच ‘मानसिक स्वास्थ्य’ की धुरी पर टिक गए हैं। अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की तलवार से काटकर निर्मम हत्या करने वाले दोषी संजय सिंह की फांसी की सजा पर उत्तराखंड हाईकोर्ट में सोमवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई।

वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह जानना चाहा है कि क्या अपराध के समय दोषी किसी मानसिक रोग से ग्रसित था और क्या इस पहलू की गहराई से जांच की गई है?


क्या ‘पागलपन’ बचा पाएगा फांसी के फंदे से?

सुनवाई के दौरान कोर्ट के इस सवाल पर सरकारी वकील ने तर्क दिया कि आरोपी घटना के समय किसी भी प्रकार के मानसिक रोग से ग्रसित नहीं था और उसने पूरे होशोहवास में इस वीभत्स वारदात को अंजाम दिया था। हालांकि, बचाव पक्ष और न्याय मित्र (Amicus Curiae) के तर्क इससे बिलकुल विपरीत हैं।

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने पूर्व में इस मामले को वापस निचली अदालत (टिहरी) भेजा था, क्योंकि तब यह तथ्य सामने आया था कि दोषी की मानसिक स्थिति पर पर्याप्त सुनवाई नहीं हुई है। निचली अदालत ने पुन: सुनवाई की, लेकिन आरोपी के व्यवहार और अपराध की क्रूरता को देखते हुए उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा। अब इसी सजा की पुष्टि (Confirmation) के लिए निचली अदालत ने हाईकोर्ट को ‘रिफरेंस आदेश’ भेजा है, जिस पर वर्तमान में सुनवाई चल रही है।

13 दिसंबर 2014: जब तलवार से अपनों का ही लहू बहाया

यह दिल दहला देने वाली घटना टिहरी गढ़वाल के गुमाल गांव की है। 13 दिसंबर 2014 की उस मनहूस शाम को संजय सिंह का अपने परिवार के साथ मामूली बात पर विवाद हुआ था। क्रोध में अंधे होकर संजय ने तलवार उठाई और अपनी सगी मां, अपने बड़े भाई और अपनी गर्भवती भाभी पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।

वारदात इतनी जघन्य थी कि तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। इस हत्याकांड की रिपोर्ट किसी और ने नहीं, बल्कि संजय के बदहवास पिता राम सिंह पवार ने ही दर्ज कराई थी। एक ही झटके में पूरा परिवार खत्म करने वाले इस नरपिशाच को अगस्त 2021 में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमा पांडेय की अदालत ने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला मानते हुए मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा सुनाई थी।

न्याय मित्र का तर्क: ‘दोषी अपने कृत्य के परिणामों से अनजान था’

हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता और न्याय मित्र अरविंद वशिष्ठ ने अदालत के समक्ष दोषी की मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु रखा। उन्होंने बताया कि मेडिकल बोर्ड ने भी माना है कि आरोपी मानसिक रूप से अस्वस्थ है।

न्याय मित्र ने दलील दी कि, दोषी मानसिक रूप से इस कदर बीमार है कि वह अपने द्वारा किए जाने वाले कृत्य के परिणामों को समझने में सक्षम नहीं है। मेडिकल बोर्ड का कहना है कि वह इलाज से ठीक हो सकता है, लेकिन निचली अदालत ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर सीधे मृत्युदंड की सजा सुना दी। भारतीय दंड संहिता की धारा 84 के तहत, यदि कोई व्यक्ति मानसिक अस्वस्थता के कारण अपराध की प्रकृति को समझने में असमर्थ है, तो उसे कुछ कानूनी राहत मिल सकती है। अब हाईकोर्ट को इसी बारीक कानूनी रेखा पर फैसला करना है।

हाईकोर्ट की अगली तिथि और कानूनी महत्व

आज की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 मई 2026 की तिथि नियत की है। तब तक सरकार को आरोपी के मेडिकल इतिहास और घटना के समय उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े ठोस साक्ष्य पेश करने होंगे।

यह मामला कानून के छात्रों और मानवाधिकार विशेषज्ञों के लिए भी चर्चा का विषय है। क्या एक जघन्य हत्यारे को केवल इसलिए जीवनदान मिल सकता है क्योंकि वह मानसिक रूप से बीमार है? या फिर तीन निर्दोष जानों (जिसमें एक अजन्मा बच्चा भी शामिल था) की हत्या का प्रतिशोध केवल फांसी ही है? इन सवालों के जवाब अब नैनीताल हाईकोर्ट के आगामी फैसलों में छिपे हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button