
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में हुआ एक सड़क हादसा अब महज दुर्घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला सियासत, दबाव और कानून व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। बीजेपी विधायक प्रीतम लोधी और उनके बेटे दिनेश लोधी को लेकर सामने आई घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में हलचल मचा दी है। 16 अप्रैल की सुबह हुए इस हादसे के बाद जिस तरह से घटनाक्रम बदला, उसने जनता, पुलिस और प्रशासन के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
जानकारी के मुताबिक, 16 अप्रैल को सुबह करीब 7:30 बजे करैरा थाना क्षेत्र के सामने दिनेश लोधी ने अपनी तेज रफ्तार थार गाड़ी से पांच लोगों को टक्कर मार दी। प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि हादसे के बाद न तो उसने घायलों की मदद की और न ही कोई जिम्मेदारी ली, बल्कि वह घटनास्थल से करीब 500 मीटर दूर जिम चला गया। पीड़ितों का यह भी कहना है कि उसने मौके पर मौजूद लोगों से कहा कि “मैं थाना इंचार्ज से बात कर लूंगा” और खुद को विधायक का बेटा बताते हुए मामले को संभाल लेने की बात कही।
घटना के तुरंत बाद विधायक प्रीतम लोधी का बयान सामने आया था, जिसमें उन्होंने “जनता सर्वोपरि” की बात कही और यह दावा किया कि उन्होंने खुद पुलिस से निष्पक्ष कार्रवाई करने को कहा है। लेकिन कुछ ही दिनों में उनका रुख पूरी तरह बदल गया। अब वे पुलिस अधिकारियों को खुलेआम चुनौती देते नजर आए। करैरा के एसडीओपी आयुष जाखर को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “हमारा इतिहास भी देख लेना”, जिसने पूरे मामले को और ज्यादा गंभीर बना दिया।
दरअसल, विधायक का यह बयान उनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड की ओर इशारा करता है। उनके चुनावी हलफनामे और पुराने रिकॉर्ड के अनुसार, उनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, बलवा, मारपीट और डकैती की साजिश जैसे गंभीर आरोपों में कई मामले दर्ज रहे हैं। बताया जाता है कि उन पर करीब 9 प्रमुख केस दर्ज हैं, जिनमें तीन हत्याओं से जुड़े मामले भी शामिल हैं। इतना ही नहीं, उन्हें एक बार जिला बदर भी किया जा चुका है।
पुलिस से टकराव का उनका इतिहास भी नया नहीं है। करीब दो दशक पहले ग्वालियर की हजीरा पुलिस चौकी में घुसकर पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट करने का आरोप भी उन पर लग चुका है। उस समय के चौकी प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मी इस विवाद में शामिल थे। साल 2012 तक उनके खिलाफ कुल 34 आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई थी।
इतना ही नहीं, कुछ साल पहले उन्हें एक अंतरराज्यीय अपराधी हरेंद्र राणा को शरण देने के आरोप में भी गिरफ्तार किया गया था। स्थानीय स्तर पर उनकी छवि लंबे समय तक एक बाहुबली नेता की रही है। इलाके में यह तक कहा जाता रहा है कि जब भी आसपास कोई बड़ा अपराध होता था, पुलिस सबसे पहले उन्हें तलाशती थी।
राजनीतिक जीवन में भी उनके साथ विवाद जुड़े रहे हैं। वे कभी उमा भारती के करीबी माने जाते थे और क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए दंगल जैसे आयोजनों का सहारा लेते थे। हालांकि, 2022 में ब्राह्मण समाज और कथावाचकों पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद उन्हें बीजेपी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया गया था। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पार्टी में वापसी हो गई।
इस पूरे मामले में उनके बेटे दिनेश लोधी का रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में है। पिछले कुछ वर्षों में उस पर धमकी देने, गाड़ी चढ़ाने की कोशिश करने और वसूली जैसे आरोप लग चुके हैं। 2024 में ग्वालियर में पड़ोसियों पर गाड़ी चढ़ाने के मामले में उसे जेल भी जाना पड़ा था।
विवाद यहीं खत्म नहीं होता। पिछले साल जनवरी में प्रीतम लोधी ने अपने क्षेत्र के थानों में ‘विधायक प्रतिनिधि’ नियुक्त करने की कोशिश की थी। इस कदम को पुलिस व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप माना गया और भारी विरोध के बाद उन्हें यह निर्णय वापस लेना पड़ा।
करैरा का यह ताजा मामला अब केवल एक सड़क हादसे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता के दुरुपयोग, कानून के प्रति जवाबदेही और राजनीतिक प्रभाव के मुद्दों को उजागर कर रहा है। जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रभावशाली लोगों के लिए कानून अलग है? वहीं पुलिस और प्रशासन पर भी निष्पक्ष कार्रवाई का दबाव बढ़ता जा रहा है।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि इस मामले में जांच किस दिशा में जाती है और क्या वास्तव में कानून अपना काम निष्पक्ष रूप से कर पाएगा या नहीं।



