
श्रीनगर गढ़वाल, 16 अप्रैल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर में गुरुवार को “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के विशेष संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य समकालीन शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका को रेखांकित करना और उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के साथ समन्वित करने पर सार्थक संवाद स्थापित करना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10 बजे मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिससे पूरे सभागार में पारंपरिक गरिमा और आध्यात्मिक वातावरण का संचार हुआ। इसके पश्चात विश्वविद्यालय कुलगीत की प्रस्तुति ने उपस्थित जनसमूह में एकता और सांस्कृतिक गौरव की भावना को प्रबल किया। मंचासीन अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र एवं तुलसी पौधा भेंट कर भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का निर्वहन किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अनु राही ने प्रभावी ढंग से किया।
स्वागत भाषण में शिक्षा संकायाध्यक्ष प्रो. सुनीता गोदियाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा को एक जीवंत और सतत विकसित होने वाली परंपरा बताते हुए उसकी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान केवल अतीत का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अमरजीत सिंह ने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शोध कार्यों के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो भारतीय मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का कार्य कर रही है।
मुख्य अतिथि के रूप में लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय संस्कृति, परंपरा और मूल्यों पर आधारित एक दूरदर्शी नीति है। उन्होंने ‘मेधा’, ‘विवेक’ और ‘नैतिकता’ को भारतीय शिक्षा की आधारशिला बताते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति का समग्र विकास करना है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह नीति वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण में अहम भूमिका निभाएगी।
विशिष्ट अतिथि प्रो. राज शरण शाही ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परंपरा की दार्शनिक गहराई और व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में ज्ञान और विज्ञान का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है, जो व्यक्ति के बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्री प्रकाश सिंह ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने प्रेरणादायक पंक्तियों के माध्यम से शिक्षा को समाज में प्रकाश फैलाने वाली शक्ति बताया और कहा कि ज्ञान के माध्यम से ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. अनिल कुमार नौटियाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के अदिति महाविद्यालय की प्रो. डॉ. पुनीता गुप्ता द्वारा “उत्तराखंड की रामलीलाः एक दृश्य यात्रा” विषय पर विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी में रामलीला की विविध शैलियों, वेशभूषा, मंचन परंपराओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों को उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया।
संगोष्ठी में प्रो. एम. एस. पंवार, डॉ. पुनीत वालिया और डॉ. शंकर सिंह सहित कई विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के समन्वय को देश के समग्र विकास के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी शोधार्थियों और शिक्षाविदों के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर रही है, जहां विचारों का आदान-प्रदान हो रहा है।
उद्घाटन सत्र में देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों और छात्रों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। लगभग 150 से अधिक प्रतिभागियों ने इसमें भाग लिया, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और महत्व और अधिक बढ़ गया। सत्र के अंत में ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
इस अवसर पर प्रो. राकेश मैखुरी, प्रो. डी. एस. नेगी और प्रो. आर. एस. फर्तियाल सहित कई शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता, तार्किकता और आधुनिक संदर्भ में उसकी उपयोगिता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा प्रणाली को अपनी जड़ों से जोड़कर ही हम वैश्विक स्तर पर एक मजबूत और मूल्यपरक शिक्षा मॉडल स्थापित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रही है, जो आने वाले समय में शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।



