
नैनीताल: उत्तराखंड में वर्षों से अपनी सेवाओं के नियमितीकरण की बाट जोह रहे उपनल (UPNL) संविदा कर्मचारियों और वन विभाग के दैनिक श्रमिकों के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने राज्य सरकार के टालमटोल वाले रवैये पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सचिव, सचिव कार्मिक और सचिव वित्त को एक साथ बैठकर समाधान निकालने का सुझाव दिया है। न्यायमूर्ति की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट के आदेशों की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी और सरकार को यह तय करना होगा कि वर्तमान नियमावली के दायरे में इन कर्मचारियों का भविष्य कैसे सुरक्षित किया जा सकता है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश हुए सचिव कार्मिक, कोर्ट ने दिए कड़े निर्देश
अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में सचिव कार्मिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूर्व में पारित आदेशों का गहराई से अवलोकन किया। अदालत ने सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज करने की कोशिश की जिसमें कहा गया था कि नियमितीकरण के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
अदालत ने सचिव कार्मिक को सुझाव देते हुए कहा कि यह केवल एक विभाग का मामला नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य सचिव, सचिव वित्त और सचिव कार्मिक आपस में समन्वय स्थापित करें और यह सुनिश्चित करें कि मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर इन कर्मचारियों को कैसे नियमित किया जा सकता है।
न्यूनतम वेतनमान पर हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
नियमितीकरण के साथ-साथ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के आर्थिक शोषण के मुद्दे पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि जब तक नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक इन दैनिक श्रमिकों और उपनल कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान (Minimum Pay Scale) देने के बारे में सरकार क्या सोच रही है?
न्यायालय ने कहा कि वर्षों से अल्प मानदेय पर सेवा दे रहे कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह न्यूनतम वेतनमान के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करे और 8 मई तक इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करे।
सरकार बनाम कर्मचारी संघ: अवमानना का गंभीर आरोप
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि उपनल के माध्यम से तैनात कर्मचारियों को नियमित करने का वर्तमान में कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। सरकार के इस पक्ष का संविदा कर्मचारी संघ के अधिवक्ताओं ने पुरजोर विरोध किया।
कर्मचारी संघ के वकीलों ने कोर्ट को याद दिलाया कि पूर्व में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उपनल कर्मचारियों के पक्ष में एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया था, जिसमें उनके नियमितीकरण के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए थे। अधिवक्ताओं का आरोप है कि राज्य सरकार ने न केवल उस आदेश पर कोई ठोस निर्णय लिया, बल्कि उसे रिकॉर्ड पर लाने में भी कोताही बरती। इसी आधार पर सरकार के खिलाफ अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखी कर्मचारियों की बात
उल्लेखनीय है कि इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व में कर्मचारी संघ की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी पैरवी की थी। याचिका ‘उत्तराखंड उपनल कर्मचारी संघ बनाम आनंद बर्धन (मुख्य सचिव)’ को प्राथमिकता के आधार पर सुनने की अपील की गई थी। कर्मचारियों का तर्क है कि वे दशकों से विभाग की रीढ़ बने हुए हैं, लेकिन जब उनके अधिकारों की बात आती है, तो सरकार नियमों का हवाला देकर पीछे हट जाती है।
क्या है पूरा विवाद?
उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी विभागों में हजारों कर्मचारी ‘उपनल’ (Uttarakhand Purv Sainik Kalyan Nigam Limited) के माध्यम से संविदा पर तैनात हैं। इसके अलावा, वन विभाग में बड़ी संख्या में दैनिक श्रमिक कार्यरत हैं जो पिछले 10 से 20 वर्षों से नियमित होने का इंतजार कर रहे हैं। 2018 में हाईकोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को नियमितीकरण की योजना बनाने को कहा था, लेकिन सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। अब मामला अवमानना याचिकाओं के जरिए फिर से हाईकोर्ट की दहलीज पर है।
अगली सुनवाई 8 मई को: टिकी हैं हजारों की नजरें
हाईकोर्ट ने अब इस पूरे प्रकरण की अगली सुनवाई के लिए 8 मई की तिथि निर्धारित की है। कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि अगली तारीख तक सरकार तीनों शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक कर कोई सकारात्मक प्रस्ताव लेकर आएगी। यदि 8 मई तक सरकार कोई ठोस कार्ययोजना पेश नहीं करती है, तो कोर्ट अवमानना के मामले में सख्त कार्रवाई कर सकता है।



