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The Hill India > Blog > उत्तर प्रदेश > इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘खर्चा नहीं उठा सकते तो न करें शादी’, भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता पति
उत्तर प्रदेशफीचर्ड

इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘खर्चा नहीं उठा सकते तो न करें शादी’, भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता पति

The Hill India News
Last updated: April 21, 2026 3:17 am
The Hill India News
Published: April 21, 2026
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प्रयागराज: वैवाहिक संबंधों और कानूनी उत्तरदायित्वों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक बार विवाह के बंधन में बंधने के बाद कोई भी पुरुष अपनी आर्थिक तंगी या खराब वित्तीय स्थिति का हवाला देकर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण (Maintenance) की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। हाई कोर्ट ने यहां तक कहा कि यदि किसी व्यक्ति को यह अंदेशा हो कि वह भविष्य में परिवार का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होगा, तो उसे विवाह के विचार को ही त्याग देना चाहिए।

Contents
न्यायपालिका का कड़ा संदेश: ‘विवाह मतलब कानूनी उत्तरदायित्व’क्या था पूरा मामला? 4,000 रुपये के लिए हाई कोर्ट पहुंचा था पतिअदालत ने खारिज किए पति के तर्क: ‘4,000 रुपये अत्यधिक नहीं’बच्चों के लिए अलग से कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफशादी से पहले सोचें: हाई कोर्ट की ‘नेक नसीहत’

न्यायपालिका का कड़ा संदेश: ‘विवाह मतलब कानूनी उत्तरदायित्व’

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने अपीलकर्ता तेज बहादुर मौर्य की याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत, एक पुरुष अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है।

अदालत ने कहा, “एक बार जब कोई पुरुष किसी महिला से शादी कर लेता है, तो कानूनन वह उसका गुजारा करने के लिए उत्तरदायी हो जाता है। कोई भी पति अपनी खराब आर्थिक स्थिति को ढाल बनाकर अपने परिवार को लाचार नहीं छोड़ सकता। यह जिम्मेदारी एक अनिवार्य कानूनी कर्तव्य है, जिससे इनकार करने का कोई विकल्प नहीं है।”


क्या था पूरा मामला? 4,000 रुपये के लिए हाई कोर्ट पहुंचा था पति

यह पूरा मामला प्रयागराज की एक फैमिली कोर्ट के आदेश से शुरू हुआ था। एडिशनल प्रिंसिपल जज ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 24 के तहत सुनवाई करते हुए पति तेज बहादुर मौर्य को आदेश दिया था कि वह मुकदमे की लंबित अवधि के दौरान अपनी पत्नी को 4,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम मेंटेनेंस दे।

पति ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि वह महज एक साधारण मजदूर है और उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह हर महीने 4,000 रुपये दे सके। पति के वकील ने कोर्ट में यह दलील भी दी कि ट्रायल कोर्ट ने उसकी आय के सीमित स्रोतों पर विचार नहीं किया। इसके अतिरिक्त, पति ने अपनी पत्नी पर किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने और आपसी सहमति से अलग होने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए।


अदालत ने खारिज किए पति के तर्क: ‘4,000 रुपये अत्यधिक नहीं’

हाई कोर्ट ने पति के सभी तर्कों को दरकिनार करते हुए कहा कि वर्तमान महंगाई के दौर में 4,000 रुपये की राशि किसी भी दृष्टिकोण से अत्यधिक नहीं कही जा सकती। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने अपनी आय को लेकर कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए कि वह यह राशि देने में असमर्थ है।

अदालत ने पत्नी के उस बयान पर भी संज्ञान लिया जिसमें उसने कहा था कि वह अधिक शिक्षित नहीं है और बच्चों का पालन-पोषण अकेले कर रही है। पत्नी ने आरोप लगाया था कि उससे धोखे से कुछ हलफनामों पर हस्ताक्षर लिए गए थे। कोर्ट ने माना कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है, इसलिए पति की यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।


बच्चों के लिए अलग से कानूनी कार्रवाई का रास्ता साफ

सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 24 के तहत केवल पति या पत्नी ही एक-दूसरे से मेंटेनेंस मांग सकते हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि पत्नी अपने बच्चों के बेहतर भविष्य और उनके भरण-पोषण के लिए अलग से कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। फैमिली कोर्ट ने अपीलकर्ता को बकाया राशि पांच किश्तों में जमा करने का जो निर्देश दिया था, उसे भी हाई कोर्ट ने सही ठहराया।


शादी से पहले सोचें: हाई कोर्ट की ‘नेक नसीहत’

हाई कोर्ट ने अपने फैसले के अंत में उन पुरुषों के लिए एक बड़ी नसीहत दी जो शादी के बाद जिम्मेदारियों से भागते हैं। बेंच ने दो टूक शब्दों में कहा कि विवाह केवल एक सामाजिक रस्म नहीं है, बल्कि एक गंभीर कानूनी अनुबंध है। यदि कोई पुरुष आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि वह एक परिवार का पेट पाल सके, तो उसे इस सामाजिक बंधन में बंधने से बचना चाहिए। एक बार विवाह होने के बाद, अदालती कार्यवाही के दौरान खराब आर्थिक स्थिति का रोना रोकर अपनी पत्नी को बेसहारा छोड़ना कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में मेंटेनेंस के अन्य मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा, जहां पति अक्सर बेरोजगारी या कम आय का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते हैं।

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TAGGED:Alimony LawAllahabad High Court Maintenance NewsHusband-Wife Dispute LawIndiaJustice Atul Shridhar's DecisionSection 24 of the Hindu Marriage ActUttar Pradesh
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