
मध्यप्रदेश में इस बार गेहूं की फसल सिर्फ खेतों में नहीं लहलहाई, बल्कि किसानों की परेशानियों का कारण भी बन गई। सरकार जहां खेती को आधुनिक बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैटेलाइट इमेजिंग और ड्रोन सर्वे जैसी तकनीकों को भविष्य की खेती बता रही है, वहीं जमीन पर इन तकनीकों की खामियों ने हजारों किसानों को संकट में डाल दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि जिन खेतों में सुनहरी गेहूं की फसल खड़ी है, उन्हें सरकारी डिजिटल सिस्टम में कहीं चना, कहीं सरसों, तो कहीं टमाटर और मिर्ची की खेती दिखा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि किसानों का पंजीयन निरस्त होने लगा और लाखों किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं बेचने से वंचित हो गए।
बताया जा रहा है कि प्रदेश में करीब 3 लाख किसान इस तकनीकी गड़बड़ी की मार झेल रहे हैं। किसान अब सरकारी खरीद केंद्रों के बजाय मंडियों में कम कीमत पर गेहूं बेचने को मजबूर हैं। MSP पर जहां सरकार 2625 रुपये प्रति क्विंटल देने का दावा कर रही है, वहीं खुले बाजार में किसानों को 1700 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही भाव मिल रहा है। इससे किसानों को प्रति क्विंटल 700 से 900 रुपये तक का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
खेत में गेहूं, सिस्टम में चना और सब्जी
मध्यप्रदेश के कई जिलों से किसानों की शिकायतें सामने आई हैं कि उनके खेतों में गेहूं की फसल होने के बावजूद सरकारी पोर्टल पर दूसरी फसलें दर्ज हो गई हैं। किसी खेत को खाली प्लॉट बताया गया, तो कहीं सब्जी की खेती दिखा दी गई। किसानों का कहना है कि उन्हें यह भी पता नहीं चला कि सर्वे कब और कैसे किया गया।
भैरूपुरा गांव के किसान उमेश श्रीवास बताते हैं कि उन्होंने पूरे खेत में गेहूं बोया था, लेकिन पोर्टल पर उसे चना दिखा दिया गया। इसी वजह से उनका पंजीयन रद्द हो गया। अब उन्हें सरकारी खरीद केंद्र पर गेहूं बेचने की अनुमति नहीं मिल रही। उमेश कहते हैं कि अधिकारी अगर एक बार जमीन पर आकर देख लेते तो सारी सच्चाई सामने आ जाती, लेकिन पूरा सिस्टम सिर्फ सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल डेटा पर निर्भर हो गया है।
किसान शुभम गौर भी इसी परेशानी से जूझ रहे हैं। उनके पांच खसरों में गेहूं की फसल थी, लेकिन रिकॉर्ड में कहीं चना तो कहीं टमाटर और मिर्ची दर्ज कर दी गई। इसका असर यह हुआ कि वे अपनी पूरी उपज बेच ही नहीं पा रहे। उनके मुताबिक लगभग 50 क्विंटल गेहूं तैयार पड़ा है, लेकिन सिस्टम सिर्फ 30 क्विंटल खरीदने की अनुमति दे रहा है। बाकी फसल को उन्हें खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है।
AI और सैटेलाइट तकनीक बनी किसानों की मुसीबत
प्रदेश सरकार ने खेती और भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने के लिए ‘सारा’ और ‘उन्नति’ जैसी एग्री-जीआईएस आधारित प्रणालियां लागू की हैं। दावा किया गया था कि इन तकनीकों के जरिए करोड़ों खेतों की डिजिटल मैपिंग होगी और फसलों की सही पहचान कर खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाएगा। सरकार का कहना है कि सैटेलाइट और ड्रोन सर्वे से 85 प्रतिशत तक सटीकता हासिल की गई है।
लेकिन किसानों का आरोप है कि यह तकनीक जमीनी हकीकत समझने में नाकाम रही है। खेतों की गलत मैपिंग ने उन्हें आर्थिक संकट में डाल दिया है। पहले जहां पटवारी और स्थानीय अधिकारी खेतों का निरीक्षण करते थे, वहीं अब पूरा भरोसा मशीनों और सॉफ्टवेयर पर कर दिया गया है।
कई किसानों का कहना है कि खेतों की मेड़, फसल की स्थिति और मौसम के असर को सैटेलाइट सही तरीके से नहीं समझ पाया। कहीं पानी भराव के कारण खेत की तस्वीर बदल गई, तो कहीं मिश्रित खेती की वजह से सिस्टम भ्रमित हो गया। लेकिन इन गलतियों का खामियाजा सीधे किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
MSP का सपना टूटा, मंडियों में सस्ते दामों पर बिक्री
मध्यप्रदेश सरकार ने इस बार गेहूं के लिए 2625 रुपये प्रति क्विंटल MSP तय किया है। किसानों को उम्मीद थी कि इस समर्थन मूल्य पर उनकी फसल बिकेगी और उन्हें उचित लाभ मिलेगा। लेकिन तकनीकी गड़बड़ियों ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
अब किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों को कम दाम पर गेहूं बेच रहे हैं। मंडियों में 1700 से 2200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही कीमत मिल रही है। ऊपर से ट्रैक्टर किराया, मजदूरी और कटाई का खर्च अलग से जुड़ रहा है। इससे किसानों की लागत तक निकलना मुश्किल हो गया है।
किसानों का कहना है कि अगर सरकार समय पर खरीद कर लेती और पंजीयन में गड़बड़ी नहीं होती, तो उन्हें इतना नुकसान नहीं उठाना पड़ता। कई किसान ऐसे हैं जिन्होंने सोसायटी से कर्ज लिया हुआ है और अब फसल सस्ते में बेचने के कारण कर्ज चुकाने में भी मुश्किल आ रही है।
ई-उपार्जन और स्लॉट बुकिंग ने बढ़ाई परेशानी
तकनीकी गड़बड़ी के साथ-साथ ई-उपार्जन व्यवस्था भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बन गई है। किसानों का आरोप है कि पहले बारदाने की कमी का हवाला देकर खरीदी टाली गई, फिर स्लॉट बुकिंग और कैपिंग जैसी शर्तें लगा दी गईं।
सरकार ने खरीद केंद्रों पर एक सीमा तय कर दी है, जिसके तहत एक केंद्र पर सीमित मात्रा में ही खरीदी हो रही है। छोटे किसानों को प्राथमिकता देने के नाम पर कई मध्यम और बड़े किसान खरीद प्रक्रिया से बाहर हो गए।
इसके अलावा आधार लिंकिंग और बैंक सत्यापन की प्रक्रिया ने भी किसानों को परेशान कर दिया है। कई किसानों का कहना है कि उनका आधार पहले से बैंक खाते से जुड़ा हुआ है, फिर भी पोर्टल पर खाते को इनवैलिड बताया जा रहा है।
अरुण मीणा नाम के किसान बताते हैं कि उनके घर में शादी है, लेकिन वे पिछले कई दिनों से बैंक और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। स्लॉट बुक नहीं हो रहा और गेहूं खरीद केंद्र तक नहीं पहुंच पा रहा। ऐसी स्थिति में परिवार चलाना और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाना दोनों मुश्किल हो गया है।
विपक्ष ने सरकार को घेरा
इस मुद्दे पर विपक्ष ने भी सरकार को निशाने पर लिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि सरकार किसानों की फसल खरीदने से बचने के लिए नए-नए बहाने बना रही है। विपक्ष का कहना है कि जब पटवारी और तहसील स्तर पर पहले ही सत्यापन हो चुका था, तो फिर सैटेलाइट सर्वे की जरूरत क्यों पड़ी।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार डिजिटल तकनीक के नाम पर किसानों को भ्रमित कर रही है। कभी आधार लिंकिंग, कभी डीबीटी और कभी सर्वर की समस्या बताकर किसानों को खरीद प्रक्रिया से बाहर किया जा रहा है।
विपक्ष का यह भी कहना है कि तकनीक का इस्तेमाल किसानों की मदद के लिए होना चाहिए, न कि उन्हें परेशान करने के लिए। अगर डिजिटल सिस्टम में इतनी बड़ी त्रुटियां हैं, तो सरकार को तत्काल मैनुअल सत्यापन शुरू करना चाहिए।
सरकार ने माना, हुई हैं गड़बड़ियां
खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने माना है कि सैटेलाइट सर्वे में कुछ गड़बड़ियां हुई हैं। उन्होंने कहा कि कहीं-कहीं गेहूं की जगह दूसरी फसलें दिखाई दी हैं, लेकिन स्थिति अब नियंत्रण में है। सरकार का दावा है कि सभी किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है और खरीद प्रक्रिया सुचारु रूप से चल रही है।
सरकार के अनुसार अब तक 19 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है और 5 लाख से ज्यादा किसानों से 22 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं खरीदा जा चुका है। इसके बदले हजारों करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अधिकारियों को खरीद केंद्रों का निरीक्षण करने और किसानों की समस्याओं का समाधान करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन किसानों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अभी भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं।
तकनीक बनाम जमीनी हकीकत
यह पूरा मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या तकनीक पर पूरी तरह निर्भर होना सही है? AI, ड्रोन और सैटेलाइट खेती को आधुनिक बनाने में मददगार जरूर हो सकते हैं, लेकिन अगर उनमें त्रुटियां हों और उनका सुधार समय पर न हो, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसानों को ही उठाना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को सहायक माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि अंतिम सत्य मान लिया जाना चाहिए। खेतों का भौतिक सत्यापन, स्थानीय अधिकारियों की भूमिका और किसानों की बात सुनना भी उतना ही जरूरी है।
मध्यप्रदेश का यह मामला बताता है कि डिजिटल इंडिया का सपना तभी सफल होगा जब तकनीक के साथ मानवीय संवेदनशीलता और जवाबदेही भी जुड़ी होगी। वरना खेत में खड़ी गेहूं की फसल कागजों और कंप्यूटर स्क्रीन पर चना, सरसों या टमाटर बनती रहेगी और किसान अपनी मेहनत का उचित मूल्य पाने के लिए सिस्टम के आगे बेबस खड़ा रहेगा।



