
उत्तराखंड के काशीपुर स्थित ऐतिहासिक द्रोण सागर लेक से जुड़े अतिक्रमण और कथित अनियमितताओं के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य सरकार से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में उठाए गए गंभीर सवालों पर विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट आवश्यक है, ताकि स्थिति की वास्तविकता सामने आ सके।
यह जनहित याचिका काशीपुर निवासी चक्रेश कुमार जैन द्वारा दायर की गई है, जिसमें द्रोण सागर लेक क्षेत्र में कथित अतिक्रमण, मंदिरों से जुड़े चढ़ावे के दुरुपयोग और क्षेत्र में बढ़ती अनैतिक गतिविधियों का मुद्दा उठाया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि यह स्थान ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका संबंध महाभारत काल से माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस सरोवर का निर्माण पांडवों द्वारा अपने गुरु द्रोणाचार्य के सम्मान में किया गया था, जिसके कारण इसका नाम द्रोण सागर पड़ा।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत में पूर्व आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि जिला अधिकारी की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की गई थी, जिसने स्थल का निरीक्षण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि वहां कोई अतिक्रमण नहीं पाया गया है। हालांकि, इस रिपोर्ट को याचिकाकर्ता पक्ष ने चुनौती दी और आरोप लगाया कि स्थल पर वास्तविक रूप से अतिक्रमण मौजूद है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में फोटोग्राफ और अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें अतिक्रमण की स्थिति को दर्शाने का दावा किया गया।
इन विरोधाभासी दावों को देखते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी तथ्यों की विस्तृत जांच कर एक स्पष्ट और विस्तृत शपथपत्र प्रस्तुत करे। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि केवल औपचारिक रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्थल की वास्तविक स्थिति, संरचनात्मक बदलाव, भूमि उपयोग और ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण विवरण देना होगा।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि द्रोण सागर क्षेत्र में लगभग 30 ऐतिहासिक मंदिर स्थित हैं, जो इस स्थल की सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता को और बढ़ाते हैं। आरोप लगाया गया है कि इस क्षेत्र में समय के साथ अनियंत्रित गतिविधियाँ बढ़ी हैं, जिससे न केवल ऐतिहासिक धरोहर को नुकसान पहुंचने की आशंका है, बल्कि इसकी पवित्रता भी प्रभावित हो रही है।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि वर्ष 2018 में एक पूर्व जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने इस क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन लाने पर सहमति जताई थी। बावजूद इसके, आज तक इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इसी तरह, वर्ष 2020 में ऊधम सिंह नगर के जिलाधिकारी द्वारा लेक के संरक्षण के लिए उप जिलाधिकारी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी, लेकिन इस समिति की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि अदालत के पूर्व निर्देशों के बावजूद द्रोण सागर क्षेत्र से होने वाली आय को अलग खाते में जमा करने की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू नहीं की गई। इससे वित्तीय पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट किया कि मामला केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए राज्य सरकार को हर पहलू पर गंभीरता से विचार करते हुए विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार की विस्तृत रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि द्रोण सागर क्षेत्र में वास्तव में अतिक्रमण है या नहीं और यदि है तो उसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।



