
पटना: बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव जल्द देखने को मिल सकता है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी दिल्ली दौरे से लौटने के बाद संभावित मंत्रियों की सूची लेकर पटना पहुंच चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक, राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार की प्रक्रिया अब तेज हो गई है और फ्लोर टेस्ट के बाद मई की शुरुआत में नई कैबिनेट का गठन किया जा सकता है। इस बार विस्तार में कई पुराने चेहरों की छुट्टी तय मानी जा रही है, जबकि नए नेताओं को प्राथमिकता मिलने के संकेत हैं।
दिल्ली में मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, जिसे आधिकारिक तौर पर शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात में बिहार सरकार के भविष्य, मंत्रिमंडल विस्तार और सत्ता संतुलन जैसे अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इसके अलावा गृह मंत्री अमित शाह के साथ भी समन्वय को लेकर विचार-विमर्श हुआ।
सूत्रों की मानें तो मंत्रिमंडल विस्तार की जिम्मेदारी भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन को सौंपी गई है। वे संगठन और गठबंधन के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए संभावित मंत्रियों के नामों पर अंतिम रूप देने में जुटे हैं। खास बात यह है कि इस बार पार्टी संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए नए और युवा चेहरों को मौका दिया जा सकता है।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो बिहार में अभी पूरी कैबिनेट लगभग खाली है। केवल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अलावा जनता दल (यूनाइटेड) के कोटे से दो उपमुख्यमंत्री—बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय चौधरी—ने ही शपथ ली है। भाजपा के किसी भी विधायक को अब तक मंत्री नहीं बनाया गया है, जिससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है। कई विभाग बिना मंत्री के चल रहे हैं, जिससे निर्णय लेने में देरी हो रही है।
संविधान के अनुसार बिहार में अधिकतम 33 मंत्रियों का प्रावधान है, लेकिन नई सरकार बनने के बाद भी अब तक पूर्ण मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो पाया है। यही कारण है कि सरकार पर जल्द से जल्द कैबिनेट विस्तार करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से चर्चा के बाद अब इस प्रक्रिया में तेजी आएगी और संतुलित कैबिनेट बनाने की कोशिश की जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 24 अप्रैल को बिहार विधानसभा में विशेष सत्र बुलाया गया है, जहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी विश्वास मत प्रस्ताव पेश करेंगे। यह फ्लोर टेस्ट सरकार के लिए बेहद अहम होगा, क्योंकि इसके जरिए वे सदन में अपनी बहुमत की स्थिति स्पष्ट करेंगे। एनडीए के पास बहुमत होने के बावजूद यह प्रक्रिया औपचारिक रूप से सरकार की स्थिरता को साबित करेगी।
बिहार की राजनीति में यह भी एक नया प्रयोग माना जा रहा है कि इस बार राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री है, जबकि जदयू के दो नेता उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं। इससे पहले लंबे समय तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे और भाजपा सहयोगी दल के रूप में सरकार में शामिल रही। इस बदले हुए राजनीतिक समीकरण के चलते कैबिनेट गठन में संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, नए मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक मजबूती को ध्यान में रखा जाएगा। साथ ही उन नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है जिन्होंने हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में पार्टी के प्रति वफादारी दिखाई है या जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ रखते हैं।
कुल मिलाकर, बिहार में आने वाले दिनों में राजनीतिक हलचल तेज रहने वाली है। फ्लोर टेस्ट के बाद जैसे ही कैबिनेट विस्तार की औपचारिक घोषणा होगी, राज्य की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं। जनता भी नई सरकार से तेज और प्रभावी शासन की उम्मीद कर रही है, ऐसे में यह विस्तार राज्य की प्रशासनिक गति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।



