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The Hill India > Blog > फीचर्ड > पेंटागन में उथल-पुथल: ईरान युद्ध के बीच ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर उठे सवाल
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पेंटागन में उथल-पुथल: ईरान युद्ध के बीच ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: April 23, 2026 9:47 am
The Hill India News
Published: April 23, 2026
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अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य टकराव के बीच एक नई बहस ने जन्म ले लिया है—क्या युद्ध सिर्फ मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन के भीतर भी चल रहा है? हाल ही में अमेरिकी नौसेना सचिव जॉन फेलन को अचानक पद से हटाए जाने के फैसले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और एक अस्थायी सीजफायर लागू है।

इतिहास पर नजर डालें तो 1864 में अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी—“नदी पार करते समय घोड़े नहीं बदलने चाहिए।” इसका मतलब यह था कि युद्ध के दौरान नेतृत्व में अचानक बदलाव करना खतरनाक हो सकता है। लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले इस सिद्धांत के उलट नजर आ रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने पहले सेना प्रमुख स्तर पर बदलाव किए और अब नौसेना सचिव को हटाकर यह संकेत दिया है कि रक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर फेरबदल जारी है।

पेंटागन की ओर से 22 अप्रैल को जारी बयान में कहा गया कि जॉन फेलन “तुरंत प्रभाव से” अपना पद छोड़ देंगे। हालांकि उनके हटाए जाने के पीछे कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया, लेकिन अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे आंतरिक मतभेदों की बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और फेलन के बीच पिछले कई महीनों से तनाव चल रहा था।

सूत्रों के मुताबिक, हेगसेथ को यह महसूस हो रहा था कि जॉन फेलन अमेरिकी नौसेना के लिए नए युद्धपोतों के निर्माण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में अपेक्षित तेजी नहीं दिखा पा रहे हैं। इसके अलावा, फेलन का सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से संपर्क बनाए रखना भी विवाद का कारण बना। हेगसेथ को यह कदम उनके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप जैसा लग रहा था। इस तनाव ने धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लिया।

बताया जाता है कि व्हाइट हाउस में जहाज निर्माण से जुड़े मुद्दों पर हुई एक अहम बैठक के दौरान स्थिति चरम पर पहुंच गई। राष्ट्रपति ट्रंप भी युद्धपोत निर्माण की धीमी गति से असंतुष्ट थे। इसी बैठक में यह निर्णय लिया गया कि फेलन को हटाकर किसी ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाए जो तेज गति से काम कर सके। इसके बाद फेलन को संदेश भेजा गया कि या तो वे इस्तीफा दें या उन्हें पद से हटा दिया जाएगा।

जॉन फेलन का हटाया जाना कोई अकेली घटना नहीं है। ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही रक्षा विभाग में बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिले हैं। इससे पहले जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल चार्ल्स “सीक्यू” ब्राउन को भी पद से हटा दिया गया था। इसके अलावा नौसेना, कोस्ट गार्ड, वायु सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी बदला जा चुका है।

इन लगातार हो रहे बदलावों ने अमेरिकी राजनीति और रक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता पैदा कर दी है। सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के वरिष्ठ डेमोक्रेट नेता जैक रीड ने इस कदम को “चिंताजनक” करार दिया है। उनका कहना है कि यह रक्षा विभाग में बढ़ती अस्थिरता और अव्यवस्था का संकेत है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि इस तरह के फैसलों से सेना के राजनीतिकरण का खतरा बढ़ सकता है।

अमेरिका की सेना को परंपरागत रूप से एक निष्पक्ष और पेशेवर संस्था माना जाता रहा है, जो राजनीतिक प्रभाव से दूर रहती है। लेकिन जिस तरह से शीर्ष सैन्य अधिकारियों को हटाया जा रहा है, उससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब सेना भी राजनीतिक निर्णयों के प्रभाव में आ रही है।

दूसरी ओर, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि राष्ट्रपति को अपनी टीम चुनने का पूरा अधिकार है। उनका कहना है कि मौजूदा हालात में तेजी से फैसले लेने और काम करने वाले नेताओं की जरूरत है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।

ईरान के साथ जारी तनाव के बीच इन बदलावों का रणनीतिक असर भी पड़ सकता है। जब किसी देश की सेना के शीर्ष नेतृत्व में लगातार बदलाव होते हैं, तो इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और जमीनी स्तर पर भी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। खासकर तब, जब सेना किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में शामिल हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता होती है, ताकि युद्ध की रणनीति में निरंतरता बनी रहे। अचानक बदलाव न केवल सैन्य संचालन को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि सहयोगी देशों के साथ तालमेल पर भी असर डाल सकते हैं।

कुल मिलाकर, जॉन फेलन को हटाने का फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि अमेरिकी रक्षा व्यवस्था के भीतर चल रहे बड़े बदलावों का संकेत है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में ट्रंप प्रशासन और क्या कदम उठाता है और इसका अमेरिका की सैन्य नीति और वैश्विक राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

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