
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के पूर्वजों और कुलवंश को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सोशल मीडिया बहस तेज हो गई है। इस बार यह विवाद प्रसिद्ध कवि और कथावाचक कुमार विश्वास के एक बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने ओवैसी को अपने “कुलवंश का इतिहास” पढ़ने की सलाह दी। कुमार विश्वास ने दावा किया कि ओवैसी के परदादा भी धार भोजशाला के समर्थन में खड़े थे। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर फिर से यह सवाल उठने लगा कि आखिर ओवैसी के पूर्वज कौन थे और उनके परिवार का इतिहास क्या रहा है।
पूरा विवाद मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर शुरू हुआ। हाल ही में भोजशाला मामले में अदालत की कार्यवाही और सर्वे को लेकर ओवैसी ने टिप्पणी की थी। ओवैसी ने आरोप लगाया कि अदालत का रवैया अयोध्या मामले जैसा दिखाई दे रहा है। उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कुमार विश्वास ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा कि ओवैसी को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास और अपने कुलवंश का इतिहास पढ़ना चाहिए।
कुमार विश्वास ने कहा, “असदुद्दीन ओवैसी पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं, वे बैरिस्टर हैं, लेकिन कई बार उनकी भाषा और व्यवहार देखकर ऐसा नहीं लगता। मैं उनसे विनम्र निवेदन करता हूं कि वे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास और अपने कुलवंश का इतिहास पढ़ें। चार पीढ़ी पीछे जाएंगे तो उन्हें समझ आएगा कि उनके पूर्वज भी इसी परंपरा से जुड़े हुए थे। वे भी भगवती के सामने उसी तरह नतमस्तक होते थे, जैसे उनके परदादा के पिता होते थे।”
उन्होंने आगे कहा कि “दो-तीन पीढ़ी पहले मतांतरण कर लेने के कारण इतना विद्वेष फैलाना ठीक नहीं है। ओवैसी साहब के परदादा भी उस समय हमारी ही तरफ खड़े थे।” कुमार विश्वास के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर ओवैसी के पूर्वजों को लेकर पुरानी चर्चाएं फिर से वायरल होने लगीं।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब ओवैसी के कुलवंश को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। इससे पहले वर्ष 2017 और 2023 में भी उनके पूर्वजों के धर्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर राजनीतिक बयानबाजी हो चुकी है।
साल 2023 में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने एक सभा के दौरान कहा था कि भारत में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे। उन्होंने कहा था कि इस्लाम लगभग 1500 साल पहले आया और भारत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान स्थानीय लोगों के वंशज हैं, जिन्होंने समय के साथ धर्म परिवर्तन किया।
गुलाम नबी आजाद के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर कई पोस्ट वायरल हुईं। एक वायरल पोस्ट में दावा किया गया था कि फारूक अब्दुल्ला के पूर्वज हिंदू ब्राह्मण थे, जबकि असदुद्दीन ओवैसी के परदादा का नाम “तुलसीरामदास” था और वे कथित रूप से हिंदू ब्राह्मण परिवार से थे। इसी पोस्ट में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के परिवार को भी हिंदू खोजा समुदाय से जुड़ा बताया गया था।
इन दावों के वायरल होने के बाद ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा था कि “यह हमेशा मजेदार होता है कि जब भी उन्हें मेरे लिए कोई वंश गढ़ना होता है, तब भी उन्हें मेरे लिए एक ब्राह्मण पूर्वज ही तलाशना पड़ता है। हम सभी को अपने कर्मों का जवाब देना होगा। हम सब आदम और हव्वा की संतान हैं।”
इससे पहले वर्ष 2017 में भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने भी दावा किया था कि ओवैसी के पूर्वज हैदराबाद के एक ब्राह्मण परिवार से थे और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया था। उस समय भी यह बयान काफी चर्चा में रहा था।
राकेश सिन्हा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ओवैसी ने साफ तौर पर इन दावों को खारिज किया था। उन्होंने कहा था, “मेरे परदादा, उनके परदादा और उनसे पहले के सभी पूर्वज पैगंबर आदम से आए थे। यह कहना गलत है कि हमारे पूर्वज हिंदू थे।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में नेताओं के पारिवारिक इतिहास और धार्मिक पृष्ठभूमि को लेकर समय-समय पर विवाद खड़े होते रहे हैं। कई बार ऐसे मुद्दे राजनीतिक बहस को और अधिक भावनात्मक बना देते हैं। हालांकि इतिहासकारों का कहना है कि किसी व्यक्ति के पूर्वजों के धर्म या जातीय पृष्ठभूमि को लेकर बिना प्रमाण के दावे करना उचित नहीं माना जा सकता।
धार भोजशाला का मुद्दा लंबे समय से विवादों में रहा है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद बताता है। इसी मुद्दे पर अदालत की कार्यवाही और सर्वे को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आती रही हैं।
अब कुमार विश्वास के बयान के बाद ओवैसी के कुलवंश और पूर्वजों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ लोग कुमार विश्वास के बयान का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक और धार्मिक विवाद को बढ़ाने वाला बयान बता रहे हैं।
फिलहाल ओवैसी की ओर से कुमार विश्वास के हालिया बयान पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।



