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Reading: यूएपीए मामलों में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “जमानत नियम है, जेल अपवाद”, उमर खालिद केस का भी किया जिक्र
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यूएपीए मामलों में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “जमानत नियम है, जेल अपवाद”, उमर खालिद केस का भी किया जिक्र

The Hill India News
Last updated: May 18, 2026 6:32 am
The Hill India News
Published: May 18, 2026
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देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत केवल सामान्य आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में भी समान रूप से लागू होता है। अदालत ने यह टिप्पणी एक ऐसे आरोपी को जमानत देते हुए की, जो पिछले पांच वर्षों से कथित नार्को-टेरर गतिविधियों के आरोप में जेल में बंद था।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि यदि किसी मामले में मुकदमे की सुनवाई लंबे समय तक लंबित रहे और आरोपी वर्षों तक जेल में बंद रहे, तो अदालतों को संविधान द्वारा दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्राथमिकता देनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) का उपयोग किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद से जुड़े जमानत मामले का भी अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि उमर खालिद को जमानत न देने के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ द्वारा स्थापित सिद्धांतों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि छोटी पीठें बड़ी पीठ के फैसलों को कमजोर नहीं कर सकतीं और उन्हें उन निर्णयों का पालन करना अनिवार्य होता है।

पीठ ने कहा कि तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए “के.ए. नजीब” फैसले में यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया था कि यदि किसी आरोपी का मुकदमा अत्यधिक देरी का शिकार हो और वह लंबे समय से जेल में बंद हो, तो संवैधानिक अदालतें उसे जमानत दे सकती हैं, भले ही उसके खिलाफ यूएपीए लागू हो। अदालत ने कहा कि बाद में आए कुछ फैसलों में इस सिद्धांत की अनदेखी की गई, जो न्यायिक अनुशासन के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी छोटी पीठ को बड़ी पीठ के फैसले पर संदेह हो, तो वह उसे दरकिनार नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास बड़ी पीठ के गठन के लिए भेजा जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कम संख्या वाली पीठें बड़ी पीठ के निर्णयों को कमजोर, नजरअंदाज या अप्रभावी नहीं बना सकतीं।

अदालत ने अपने फैसले में “ट्विन-प्रोंग टेस्ट” का भी उल्लेख किया, जिसे कुछ मामलों में जमानत पर विचार करते समय अपनाया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह परीक्षण सीधे तौर पर न तो यूएपीए की धारा 43डी(5) से निकलता है और न ही के.ए. नजीब के फैसले से। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि केवल पहली नजर में लगाए गए आरोपों के आधार पर लगातार जमानत रोकी जाती रही, तो मुकदमे से पहले की हिरासत एक तरह की सजा में बदल सकती है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। जस्टिस उज्जल भुइयां ने अपने फैसले में कहा कि यूएपीए मामलों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से 2023 के बीच पूरे देश में यूएपीए मामलों में सजा की दर न्यूनतम 1.5 प्रतिशत और अधिकतम लगभग 4 प्रतिशत तक रही है।

अदालत ने जम्मू-कश्मीर के आंकड़ों का भी उल्लेख किया और कहा कि वर्ष 2019 में वहां यूएपीए मामलों में दोषसिद्धि दर शून्य थी, जबकि वर्ष 2022 में यह अधिकतम केवल 0.89 प्रतिशत तक पहुंची। अदालत ने टिप्पणी की कि पूरे देश में यूएपीए मामलों में 94 से 98 प्रतिशत तक आरोपियों के अंततः बरी होने की संभावना रहती है, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह संभावना लगभग 99 प्रतिशत तक है।

इन आंकड़ों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी को वर्षों तक जेल में रखा जाए और बाद में वह बरी हो जाए, तो यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर आघात होगा। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराध रोकना नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी है।

पीठ ने यह भी कहा कि अदालतों को राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। हालांकि यूएपीए जैसे कानून गंभीर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन उनका उपयोग इस तरह नहीं होना चाहिए कि आरोपी का मुकदमा वर्षों तक लंबित रहे और वह बिना दोष सिद्ध हुए ही लंबे समय तक जेल में बंद रहे।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि हाल के वर्षों में यूएपीए के तहत बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुई हैं और कई मामलों में मुकदमे लंबे समय तक चलते रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह फैसला भविष्य में यूएपीए मामलों में जमानत याचिकाओं पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।

अदालत ने अंत में दोहराया कि भारतीय संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोच्च मूल्यों में से एक है और किसी भी कानून की व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि वह व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने का माध्यम बन जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अब देशभर में कानूनी और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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