करीब आठ दशकों तक अमेरिका को दुनिया की सबसे प्रभावशाली महाशक्ति माना जाता रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति, तकनीकी नवाचार और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अमेरिका ने विश्व व्यवस्था का नेतृत्व किया। अधिकांश देशों के लिए अमेरिका विकास, सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक रहा। लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा है। अमेरिका के प्रतिष्ठित प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा वर्ष 2026 में किए गए ग्लोबल एटीट्यूड्स सर्वे ने संकेत दिया है कि दुनिया का नजरिया तेजी से बदल रहा है। सर्वे के अनुसार अब 36 देशों में से लगभग 30 देशों में चीन की छवि अमेरिका से बेहतर हो चुकी है, जबकि केवल छह देशों में ही अमेरिका को चीन से अधिक सकारात्मक दृष्टि से देखा जा रहा है। यह बदलाव केवल लोकप्रियता का आंकड़ा नहीं है, बल्कि भविष्य की वैश्विक राजनीति, कूटनीति और आर्थिक शक्ति संतुलन में संभावित परिवर्तन का संकेत भी माना जा रहा है।
यह सर्वे 8 फरवरी से 13 मई 2026 के बीच 36 देशों में किया गया, जिसमें लोगों से अमेरिका और चीन के प्रति उनकी राय, दोनों देशों के नेताओं पर विश्वास, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, वैश्विक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर प्रश्न पूछे गए। रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि दुनिया के कई देशों में पहली बार चीन की स्वीकार्यता अमेरिका से अधिक हो गई है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अब इस सर्वे को बदलते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन का शुरुआती संकेत मान रहे हैं।
कुछ वर्ष पहले तक स्थिति बिल्कुल अलग थी। अधिकांश देशों में अमेरिका को चीन की तुलना में अधिक विश्वसनीय, लोकतांत्रिक और प्रभावशाली माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दो बड़े बदलाव समानांतर रूप से हुए। एक ओर चीन ने अपनी वैश्विक छवि सुधारने के लिए आर्थिक निवेश, बुनियादी ढांचा विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर लगातार जोर दिया, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की विदेश नीति, व्यापारिक विवादों, सैन्य हस्तक्षेपों और राजनीतिक बदलावों के कारण उसकी लोकप्रियता में लगातार गिरावट दर्ज की गई। इन दोनों रुझानों ने मिलकर वैश्विक जनमत की दिशा बदल दी।
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका की छवि में सबसे बड़ी गिरावट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद दर्ज की गई। हालांकि जो बाइडन के कार्यकाल में भी कुछ देशों में अमेरिका की लोकप्रियता घटी थी, लेकिन तब भी अधिकांश देशों में अमेरिका की छवि चीन से बेहतर बनी हुई थी। वर्ष 2026 तक आते-आते स्थिति पूरी तरह बदल गई। ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद दुनिया के कई देशों में अमेरिकी नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ा और इसका सीधा असर अमेरिका की वैश्विक छवि पर पड़ा। सर्वे में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि दुनिया के कई हिस्सों में अब अमेरिका के प्रति पहले जैसी सकारात्मक सोच नहीं रही।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन देशों में चीन की लोकप्रियता अमेरिका से आगे निकल गई है, उनमें कई ऐसे देश भी शामिल हैं जो वर्षों से अमेरिका के करीबी सहयोगी और नाटो (NATO) के सदस्य रहे हैं। यूरोप के कई पारंपरिक सहयोगी देशों में भी चीन की स्वीकार्यता बढ़ी है। इससे यह संकेत मिलता है कि वैश्विक राजनीति अब केवल पुराने सैन्य गठबंधनों के आधार पर नहीं चल रही, बल्कि आर्थिक सहयोग, निवेश और व्यावहारिक हित भी देशों की सोच को प्रभावित कर रहे हैं।
कनाडा इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। वर्ष 2023 में जहां 57 प्रतिशत कनाडाई अमेरिका को सकारात्मक दृष्टि से देखते थे और केवल 14 प्रतिशत लोग चीन के पक्ष में थे, वहीं 2025 तक दोनों लगभग बराबरी पर पहुंच गए। अब वर्ष 2026 में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। 44 प्रतिशत कनाडाई चीन को सकारात्मक मानते हैं, जबकि केवल 33 प्रतिशत लोग अमेरिका के पक्ष में हैं। केवल तीन वर्षों के भीतर इतना बड़ा बदलाव यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय जनमत कितनी तेजी से बदल रहा है।
मेक्सिको में भी चीन की लोकप्रियता अमेरिका से आगे निकल चुकी है। अमेरिका के सबसे करीबी पड़ोसी देशों में इस प्रकार का बदलाव अमेरिकी विदेश नीति के लिए एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका अपने सबसे निकट सहयोगियों का विश्वास खोने लगता है तो इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में वैश्विक रणनीतिक समीकरणों पर भी दिखाई देगा।
हालांकि पूरी दुनिया में तस्वीर एक जैसी नहीं है। सर्वे के अनुसार केवल छह देशों में अमेरिका की लोकप्रियता अब भी चीन से अधिक बनी हुई है। इनमें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस जैसे एशियाई देश प्रमुख हैं। इसके पीछे मुख्य कारण चीन के साथ सीमा विवाद, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को माना जा रहा है। इन देशों में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय दावों के कारण अमेरिका को अब भी सुरक्षा साझेदार के रूप में अधिक भरोसेमंद माना जाता है।
भारत इस मामले में अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। भारतीयों का भरोसा अमेरिका और विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तुलना में अधिक दिखाई देता है। भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, तकनीक, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति के क्षेत्र में सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। वहीं भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा भू-राजनीतिक तनाव ने भारतीय जनमत को भी प्रभावित किया है। यही कारण है कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहां अमेरिका अब भी चीन से अधिक लोकप्रिय है।
सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि विश्व मामलों में सही निर्णय लेने के लिए वे किस नेता पर अधिक भरोसा करते हैं। इस प्रश्न का उत्तर भी वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। अधिकांश देशों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में अधिक भरोसेमंद माना गया। हालांकि दोनों नेताओं को बहुत ऊंची रेटिंग नहीं मिली, लेकिन शी जिनपिंग कई देशों में ट्रंप से आगे रहे।
यूरोप के लगभग सभी प्रमुख देशों—जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, ग्रीस और स्वीडन—में शी जिनपिंग को ट्रंप की तुलना में अधिक समर्थन मिला। ब्रिटेन में शी जिनपिंग को सबसे अधिक 37 प्रतिशत लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ। इसका अर्थ यह नहीं है कि दुनिया पूरी तरह चीन के पक्ष में खड़ी हो गई है, बल्कि यह संकेत है कि ट्रंप के नेतृत्व पर विश्वास पहले की तुलना में काफी कमजोर हुआ है।
दक्षिण कोरिया का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। पिछले वर्ष तक वहां ट्रंप पर भरोसा शी जिनपिंग की तुलना में लगभग दोगुना था, लेकिन अब दोनों नेताओं को लगभग समान समर्थन मिल रहा है। यह दर्शाता है कि दुनिया के कई देशों में राजनीतिक धारणा बहुत तेजी से बदल रही है।
सर्वे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे गए। लोगों से पूछा गया कि क्या अमेरिका और चीन की सरकारें अपने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करती हैं। इस मामले में अमेरिका अब भी चीन से आगे है। अधिकांश देशों के लोग मानते हैं कि अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चीन की तुलना में अधिक सम्मान करती है। हालांकि यहां भी अमेरिका की बढ़त लगातार घट रही है।
स्वीडन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2021 में वहां 61 प्रतिशत लोग मानते थे कि अमेरिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करता है, जबकि अब यह आंकड़ा घटकर केवल 27 प्रतिशत रह गया है। इसी प्रकार कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी अमेरिका के प्रति इस धारणा में 25 प्रतिशत या उससे अधिक की गिरावट दर्ज की गई।
दूसरी ओर कुछ देशों में चीन की छवि में सुधार देखने को मिला है। ऑस्ट्रेलिया सहित कुछ देशों में अब पहले की तुलना में अधिक लोग मानते हैं कि चीन भी अपने नागरिकों की स्वतंत्रता का सम्मान करता है। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी सीमित है, लेकिन इसमें लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में अलग-अलग देशों की राय भी काफी भिन्न दिखाई देती है। इजराइल में 80 प्रतिशत लोग मानते हैं कि अमेरिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करता है, जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा केवल 15 प्रतिशत है। जापान में भी अमेरिका को इस मामले में स्पष्ट बढ़त प्राप्त है। इसके विपरीत बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड तथा वेस्ट बैंक और ईस्ट जेरूसलम जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों का मानना है कि चीन अपने नागरिकों के साथ अधिक सम्मानजनक व्यवहार करता है।
सर्वे में अमेरिका और चीन की विदेश नीति को लेकर भी लोगों की राय ली गई। 17 मध्यम आय वाले देशों में 75 प्रतिशत लोगों ने माना कि अमेरिका दूसरे देशों के मामलों में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करता है। इसके विपरीत केवल 45 प्रतिशत लोगों ने चीन के बारे में ऐसा कहा। इसका अर्थ यह है कि कई देशों में अमेरिका को अत्यधिक हस्तक्षेप करने वाली शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जबकि चीन को अपेक्षाकृत कम दखल देने वाला देश माना जा रहा है।
भरोसेमंद साझेदार के प्रश्न पर भी चीन ने कई विकासशील देशों में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। दक्षिण अफ्रीका में 72 प्रतिशत लोगों ने चीन को भरोसेमंद साझेदार बताया, जबकि अमेरिका के पक्ष में केवल 46 प्रतिशत लोग थे। वहीं 64 प्रतिशत लोगों का मानना है कि चीन वैश्विक शांति और स्थिरता में योगदान देता है। वर्ष 2023 में यही आंकड़ा केवल 47 प्रतिशत था, जिससे स्पष्ट है कि चीन की छवि तेजी से मजबूत हुई है।
पाकिस्तान में चीन की लोकप्रियता सबसे अधिक दिखाई देती है। वहां 84 प्रतिशत लोगों ने चीन को भरोसेमंद साझेदार माना, जबकि अमेरिका के पक्ष में केवल 36 प्रतिशत लोगों ने राय दी। दूसरी ओर फिलीपींस में स्थिति बिल्कुल उलट है। वहां 81 प्रतिशत लोगों ने अमेरिका को भरोसेमंद माना, जबकि चीन को केवल 42 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला। इसका कारण दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच बढ़ता समुद्री विवाद माना जा रहा है।
लैटिन अमेरिका में भी उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। अर्जेंटीना, ब्राजील, कोलंबिया और पेरू जैसे देशों में अब अमेरिका और चीन लगभग बराबरी के स्तर पर पहुंच चुके हैं। जहां कभी अमेरिका का स्पष्ट प्रभाव हुआ करता था, वहां अब चीन ने मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक उपस्थिति दर्ज करा ली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। पिछले एक दशक में चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के माध्यम से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश किया है। सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा और औद्योगिक परियोजनाओं के जरिए चीन ने कई विकासशील देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध स्थापित किए हैं। इन परियोजनाओं ने चीन को केवल निवेशक ही नहीं, बल्कि विकास सहयोगी के रूप में भी स्थापित किया है।
इसके विपरीत अमेरिका की विदेश नीति, व्यापार युद्ध, आयात शुल्क, सैन्य हस्तक्षेप और वैश्विक संगठनों के प्रति बदलते रवैये ने कई देशों में उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर यूरोप, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देशों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस सर्वे का अर्थ यह नहीं है कि चीन ने अमेरिका को हर क्षेत्र में पीछे छोड़ दिया है। सैन्य शक्ति, तकनीकी नवाचार, उच्च शिक्षा, वित्तीय बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में अमेरिका अब भी अग्रणी बना हुआ है। वर्तमान समय में अमेरिका लगभग 31.8 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है, जबकि चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 20.8 ट्रिलियन डॉलर की है। वैश्विक वित्तीय प्रणाली, डॉलर की भूमिका, अत्याधुनिक तकनीक और रक्षा क्षमता जैसे क्षेत्रों में अमेरिका की स्थिति अभी भी मजबूत बनी हुई है।
फिर भी जनमत में दिखाई देने वाला यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। किसी भी महाशक्ति की ताकत केवल उसकी सेना या अर्थव्यवस्था से नहीं मापी जाती, बल्कि दुनिया के देशों का उस पर विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि वैश्विक जनमत लगातार चीन की ओर झुकता रहा और अमेरिका की विश्वसनीयता कमजोर होती गई, तो आने वाले वर्षों में कूटनीतिक गठबंधनों, व्यापारिक साझेदारियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका में भी बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे किसी चुनाव का परिणाम नहीं है, लेकिन यह दुनिया की बदलती सोच का एक महत्वपूर्ण संकेत अवश्य है। इससे स्पष्ट होता है कि अब विश्व व्यवस्था पहले जैसी एकध्रुवीय नहीं रही। चीन आर्थिक शक्ति के साथ-साथ कूटनीतिक प्रभाव भी तेजी से बढ़ा रहा है, जबकि अमेरिका को अपनी वैश्विक छवि बनाए रखने के लिए नई रणनीति अपनानी पड़ सकती है। आने वाले वर्षों में यह प्रतिस्पर्धा केवल अर्थव्यवस्था या सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दुनिया के देशों के विश्वास और जनमत की लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। यही कारण है कि वर्ष 2026 का यह सर्वे भविष्य की संभावित नई विश्व व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जा रहा है।
