देहरादून: उत्तराखंड की ठंडी वादियों में आज सियासी पारा अपने चरम पर है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आज यानी 17 जुलाई को देहरादून की धरती पर कदम रख रहे हैं। उनका यह दौरा किसी पारंपरिक राजनीतिक रैली जैसा नहीं, बल्कि सीधे राज्य के उस सबसे संवेदनशील तबके से संवाद स्थापित करने का जरिया है, जो पिछले कुछ सालों से व्यवस्था की कमियों का दंश झेल रहा है। राहुल गांधी आज देहरादून के ऐतिहासिक बन्नू स्कूल ग्राउंड में हजारों छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से सीधा संवाद करेंगे। कांग्रेस की यह रणनीति बेहद साफ है—उत्तराखंड के उन ज्वलंत मुद्दों को राष्ट्रीय पटल पर लाना, जिनका सीधा सरोकार युवाओं के रोजगार और मानिसक संघर्ष से जुड़ा है। इस पूरे दौरे के केंद्र में उत्तराखंड पेपर लीक का वो काला इतिहास रहने वाला है, जिसने देवभूमि के युवाओं के सपनों को झकझोर कर रख दिया था।
युवाओं पर केंद्रित कांग्रेस का चक्रव्यूह: सिर्फ भाषण नहीं, संवाद की तैयारी
कांग्रेस पार्टी ने राहुल गांधी के इस कार्यक्रम को बेहद व्यापक और आधुनिक स्वरूप दिया है। बन्नू स्कूल ग्राउंड में जहां भौतिक रूप से भारी संख्या में छात्र जुट रहे हैं, वहीं डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए इस संबोधन को सूबे के कोने-कोने तक पहुंचाने की पुख्ता व्यवस्था की गई है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का दावा है कि नेता प्रतिपक्ष यहां कोई घिसा-पिटा राजनीतिक भाषण देने नहीं आ रहे हैं, बल्कि वे रोजगार के संकट, पारदर्शी चयन प्रक्रिया और उत्तराखंड पेपर लीक जैसी प्रशासनिक नाकामियों पर युवाओं के मन की बात सुनेंगे और अपनी बात रखेंगे। पार्टी का मानना है कि उत्तराखंड का युवा इस समय सबसे ज्यादा ठगा हुआ महसूस कर रहा है, और राहुल गांधी की यह सीधी बातचीत उन्हें एक नया राजनीतिक विकल्प और भरोसा देगी।
2021 का वो दाग: जब यूकेएसएसएससी घोटाले ने हिला दी थी व्यवस्था की नींव
उत्तराखंड में जब भी प्रतियोगी परीक्षाओं की बात होती है, तो साल 2022 में सामने आए घोटाले जेहन में तैर जाते हैं। राज्य के इतिहास में सबसे चर्चित और विवादित मामला उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा-2021 का रहा। जुलाई 2022 में जब इस परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने का भंडाफोड़ हुआ, तो पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया। जांच एजेंसियों ने परत-दर-परत जब राज खोले, तो पता चला कि परीक्षा से कई घंटे पहले ही लाखों रुपयों में प्रश्नपत्रों का सौदा हो चुका था। हाकम सिंह जैसे रसूखदार नाम इस पूरे खेल के मुख्य सूत्रधार बनकर सामने आए। इस उत्तराखंड पेपर लीक मामले में 20 से अधिक आरोपियों की गिरफ्तारियां हुईं, जिसने राज्य की प्रशासनिक साख को कठघरे में खड़ा कर दिया। हालांकि, समय बीतने के साथ कई आरोपी तकनीकी आधार पर जमानत पर बाहर आ गए, जिससे युवाओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश और गहरा गया।
वन आरक्षी से पटवारी तक: जब साख बचाने को निरस्त करनी पड़ीं परीक्षाएं
यूकेएसएसएससी का घाव अभी भरा भी नहीं था कि वन आरक्षी (Forest Guard) भर्ती परीक्षा में भी व्यापक पैमाने पर अनियमितताओं और धांधली के गंभीर आरोप सामने आ गए। युवाओं के बढ़ते दबाव को देखते हुए सरकार को यह परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करने का फैसला लेना पड़ा। इसके तुरंत बाद, युवाओं के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया पटवारी-लेखपाल भर्ती परीक्षा ने। पटवारी परीक्षा का पेपर भी लीक हो गया, जिसके बाद राज्य सरकार के पास इस परीक्षा को निरस्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। एक के बाद एक परीक्षाओं के निरस्त होने से राज्य के उन युवाओं का मनोबल टूट गया, जो अपने घरों से दूर देहरादून, हल्द्वानी और मुखर्जी नगर जैसे शहरों में तंग कमरों में रहकर दिन-रात मेहनत कर रहे थे।
सड़कों पर उतरा था आक्रोश: गांधी पार्क से सचिवालय तक की वो गूंज
इन लगातार सामने आती प्रशासनिक नाकामियों ने शांत कही जाने वाली देवभूमि की सड़कों को आंदोलनों की आग में झोंक दिया। देहरादून का गांधी पार्क, परेड ग्राउंड और सचिवालय के बाहर का इलाका महीनों तक छात्रों के धरने और प्रदर्शनों का गवाह बना रहा। लाठियां चलीं, मुकदमे हुए, लेकिन युवाओं की मांग स्पष्ट थी—भर्ती प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता, दोषियों को सख्त से सख्त सजा और पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से निष्पक्ष जांच। सोशल मीडिया पर महीनों तक उत्तराखंड पेपर लीक का मुद्दा नेशनल ट्रेंड बना रहा, जिसने तत्कालीन पुष्कर सिंह धामी सरकार पर चौतरफा दबाव बना दिया था। आखिरकार, सरकार को इस मामले की जांच उत्तराखंड एसटीएफ से आगे बढ़ाकर सीबीआई को सौंपने की सिफारिश करनी पड़ी।
देश का सबसे सख्त ‘नकल विरोधी कानून’: धामी सरकार का पलटवार
चौतरफा घिरी भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस संकट को भांपते हुए एक बड़ा विधायी कदम उठाया। साल 2023 में उत्तराखंड विधानसभा ने ‘उत्तराखंड सार्वजनिक परीक्षा (भर्ती में अनुचित साधनों का निवारण एवं रोकथाम) कानून’ पारित किया। इस कानून को देश का सबसे कठोर एंटी-चीटिंग कानून बताया गया, जिसमें पेपर लीक करने वाले संगठित माफियाओं के खिलाफ आजीवन कारावास, करोड़ों रुपये का भारी-भरकम जुर्माना और दोषियों की संपत्ति जब्त करने जैसे कड़े प्रावधान शामिल किए गए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने साफ लहजे में संदेश दिया था कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले नकल माफियाओं को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सरकार का दावा है कि इस कानून के आने के बाद से भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लौटी है और परीक्षाएं निष्पक्ष रूप से संपन्न हो रही हैं।
कांग्रेस के संगीन आरोप: “कानून तो बना, लेकिन उजाड़ दिए गए सपने”
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के दौरे से ठीक पहले कांग्रेस ने सरकार के दावों पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना ने राष्ट्रीय मीडिया हाउस की तर्ज पर बयान जारी करते हुए कहा, “पेपर लीक केवल परीक्षा प्रणाली की खामी या कोई प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि यह देवभूमि के हजारों युवाओं के सपनों और उनके भविष्य की क्रूर हत्या थी। भाजपा सरकारों के कार्यकाल में एक के बाद एक भर्ती परीक्षाओं में हुए घोटालों ने युवाओं को मानसिक अवसाद की ओर धकेला। राहुल गांधी आज छात्रों के बीच इन्हीं पीड़ादायक मुद्दों को रखेंगे और यह रेखांकित करेंगे कि युवाओं को रोजगार देना और एक पारदर्शी, सुरक्षित भर्ती व्यवस्था बहाल करना ही कांग्रेस की सर्वोच्च प्राथमिकता है।” कांग्रेस का यह भी संगीन आरोप है कि इस लेटलतीफी और मानसिक तनाव के कारण कई होनहार युवाओं ने आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम भी उठाया, जिसके लिए सीधे तौर पर वर्तमान सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
भाजपा का दोटूक जवाब: “युवा जानते हैं कि न्याय किसने किया”
दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस के इन आरोपों को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और खोखला बता रही है। उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा, “विपक्ष इस संवेदनशील मुद्दे पर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना चाहता है। जब हमारी सरकार के सामने अनियमितताएं आईं, तो हमने उन्हें दबाया नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और कठोरतम कार्रवाई की। परीक्षाएं रद्द कर नए सिरे से कराई गईं, जांच एजेंसियां सक्रिय की गईं और आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा गया। भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हम देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून लेकर आए। राज्य का पढ़ा-लिखा और जागरूक युवा भली-भांति जानता है कि किस सरकार ने नकल माफियाओं की कमर तोड़ी है। राहुल गांधी के इन राजनीतिक आरोपों से उत्तराखंड का युवा भ्रमित होने वाला नहीं है, क्योंकि हमारी सरकार ने कथनी से नहीं, बल्कि अपने ठोस कार्यों से जवाब दिया है।”
क्या राहुल गांधी साध पाएंगे उत्तराखंड का युवा वोट बैंक?
उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं और सैनिकों की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। ऐसे में राहुल गांधी का यह दौरा राज्य की भावी सियासत की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। उत्तराखंड पेपर लीक के पुराने जख्मों को कुरेदकर कांग्रेस जहां युवाओं की सहानुभूति और आक्रोश को वोट बैंक में तब्दील करने की कोशिश में है, वहीं भाजपा अपने कड़े कानून और त्वरित कार्रवाइयों के रिपोर्ट कार्ड के भरोसे अपनी साख बचाने के लिए मैदान में है। देखना दिलचस्प होगा कि देहरादून की इस राजनीतिक बिसात पर आज राहुल गांधी युवाओं के दिलों में कितनी गहरी पैठ बना पाते हैं।
