आजम खान कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम थे, जिनका प्रभाव सिर्फ रामपुर तक सीमित नहीं था बल्कि पूरे प्रदेश की सत्ता और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी। समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेताओं में गिने जाने वाले आजम खान ने लगभग चार दशकों तक रामपुर की राजनीति पर एकछत्र राज किया। उनकी पहचान एक तेज-तर्रार, प्रभावशाली और बेबाक नेता की रही। लेकिन समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, सत्ता बदली, कानूनी मामलों का दायरा बढ़ा और धीरे-धीरे उनका राजनीतिक कद भी सिकुड़ता चला गया। आज स्थिति यह है कि कभी जिस नेता के नाम से प्रशासनिक तंत्र सक्रिय हो जाता था, उसी नेता का सबसे महत्वाकांक्षी सपना मानी जाने वाली मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी अब सरकारी कार्रवाई के केंद्र में है।
आजम खान ने वर्ष 1980 में पहली बार रामपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1985, 1989, 1991, 1993, 2002, 2007, 2012, 2017 और 2022 तक वे लगातार रामपुर से चुनाव जीतते रहे। वह दो बार लोकसभा सांसद भी बने और उत्तर प्रदेश सरकार में चार बार कैबिनेट मंत्री रहे। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाले दौर में आजम खान समाजवादी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। पार्टी के भीतर उनकी राय को बेहद अहम माना जाता था और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी उनका प्रभाव साफ दिखाई देता था।
उनके राजनीतिक रसूख का सबसे चर्चित उदाहरण वर्ष 2014 का वह मामला माना जाता है, जब उनके फार्महाउस से सात भैंसें चोरी हो गई थीं। उस समय पुलिस ने भैंसों की तलाश के लिए कई टीमें गठित कर दी थीं और कुछ ही घंटों के भीतर सभी भैंसों को बरामद कर लिया गया था। इतना ही नहीं, बरामदगी के बाद भैंसों को थाने में विशेष देखभाल के साथ रखा गया था। इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं और इसे आजम खान के प्रभाव का प्रतीक माना गया था।
हालांकि इसके बाद उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। वर्ष 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी और 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई। इसके बाद आजम खान और उनके परिवार से जुड़े कई पुराने मामलों की जांच तेज हुई। एक-एक कर कई मुकदमे दर्ज हुए और अदालतों में सुनवाई शुरू हुई। इन मामलों में भूमि कब्जाने, सरकारी संपत्तियों के दुरुपयोग, फर्जी दस्तावेज तैयार कराने, भड़काऊ भाषण देने और अन्य गंभीर आरोप शामिल रहे।
आजम खान के राजनीतिक भविष्य को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब फर्जी जन्म प्रमाण पत्र से जुड़े मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया। इस मामले में उनके बेटे अब्दुल्ला आजम का नाम भी सामने आया। आरोप था कि चुनाव लड़ने की पात्रता हासिल करने के लिए दो अलग-अलग जन्म प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज तैयार कराए गए। अदालत के फैसले के बाद आजम खान की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गई। इससे उनका सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो गया।
आजम खान के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या लगातार बढ़ती गई। भूमि कब्जाने, सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण, फर्जीवाड़े और सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे मामलों में कई मुकदमे दर्ज हुए। कानूनी कार्रवाई का असर उनके पूरे परिवार पर भी पड़ा। उनकी पत्नी और बेटे को भी विभिन्न मामलों में अदालतों का सामना करना पड़ा। इससे उनकी राजनीतिक छवि और संगठनात्मक पकड़ दोनों कमजोर होती चली गई।
आजम खान के राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में सबसे महत्वपूर्ण परियोजना रही मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी। उन्होंने इसे शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया था। विश्वविद्यालय की स्थापना बड़े पैमाने पर की गई और इसे आधुनिक सुविधाओं से लैस शैक्षणिक संस्थान के रूप में विकसित करने का दावा किया गया। लेकिन समय के साथ इसी विश्वविद्यालय को लेकर सबसे अधिक विवाद सामने आए। विश्वविद्यालय की भूमि, निर्माण कार्य और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर सौ से अधिक मामले दर्ज किए गए। प्रशासन का आरोप है कि विश्वविद्यालय के लिए कई स्थानों पर सरकारी और निजी भूमि पर अवैध कब्जा किया गया, जबकि ट्रस्ट इन आरोपों से लगातार इनकार करता रहा है।
हाल के दिनों में रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने विश्वविद्यालय परिसर में बने 38 कमरों को अवैध बताते हुए उन्हें ध्वस्त करने का आदेश जारी किया है। प्रशासन का कहना है कि संबंधित निर्माण विकास प्राधिकरण की स्वीकृति के बिना किए गए थे और नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। यदि आदेश पर अमल होता है तो यह विश्वविद्यालय के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी प्रशासनिक कार्रवाइयों में से एक माना जाएगा।
इसी बीच एक और महत्वपूर्ण फैसला सामने आया, जब उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) ने विश्वविद्यालय परिसर से गुजरने वाली मुख्य सड़क को सार्वजनिक मार्ग घोषित कर दिया। यह लगभग तीन किलोमीटर लंबी चार लेन की सीमेंट-कंक्रीट सड़क है, जिसका निर्माण वर्ष 2016-17 में समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान करीब 17 करोड़ रुपये की लागत से कराया गया था। प्रशासन का कहना है कि यह सड़क सार्वजनिक धन से बनी थी और आम लोगों के उपयोग के लिए बनाई गई थी।
बताया जाता है कि वर्ष 2019 में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाने के बाद इस सड़क पर आम लोगों का आवागमन भी बंद हो गया था। यहां तक कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों को भी सड़क के निरीक्षण और रखरखाव के लिए प्रवेश नहीं मिल रहा था। अब विभाग ने सड़क को सार्वजनिक घोषित करते हुए वहां ‘आम रास्ता’ के बोर्ड लगा दिए हैं और स्पष्ट कर दिया है कि इस मार्ग से किसी भी नागरिक को आने-जाने से नहीं रोका जा सकता।
लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों के अनुसार सड़क निर्माण पर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि खर्च हुई थी, इसलिए इसे किसी निजी संस्थान के नियंत्रण में नहीं छोड़ा जा सकता। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि सड़क के रखरखाव और उपयोग का अधिकार सरकार के पास रहेगा और आम जनता इसके उपयोग के लिए स्वतंत्र होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आजम खान का प्रभाव सिर्फ कानूनी मामलों के कारण ही कम नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय तक जेल में रहने और संगठन के भीतर उनकी सक्रियता घटने से भी उनके समर्थकों का दायरा सिमट गया। जिन नेताओं और कार्यकर्ताओं को कभी उनका करीबी माना जाता था, उनमें से कई समय के साथ अलग हो गए या निष्क्रिय हो गए। इसका असर रामपुर की राजनीति में भी दिखाई दिया।
रामपुर लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज कर समाजवादी पार्टी के उस मजबूत गढ़ में सेंध लगा दी, जिसे वर्षों तक आजम खान का राजनीतिक किला माना जाता था। यह परिणाम इस बात का संकेत माना गया कि रामपुर की राजनीति में अब नई परिस्थितियां बन चुकी हैं और आजम खान का पुराना प्रभाव काफी हद तक समाप्त हो चुका है।
हालांकि समाजवादी पार्टी आज भी आजम खान के खिलाफ हो रही कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध करार देती है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि शिक्षा संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है और विपक्षी नेताओं के खिलाफ चुनिंदा कार्रवाई की जा रही है। समाजवादी पार्टी का दावा है कि जौहर यूनिवर्सिटी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है और उसके खिलाफ की जा रही कार्रवाई राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है।
वहीं कांग्रेस ने भी सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल चुनिंदा विपक्षी नेताओं के खिलाफ किया जा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर लगे आरोपों में ऐसी सख्त कार्रवाई नहीं होती। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कानून सभी के लिए समान होना चाहिए और किसी भी कार्रवाई में राजनीतिक भेदभाव नहीं दिखना चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा और प्रशासन का कहना है कि सभी कार्रवाइयां न्यायालय के आदेशों और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जा रही हैं। सरकार का दावा है कि अवैध निर्माण, सरकारी भूमि पर कब्जा और नियमों के उल्लंघन के मामलों में किसी भी व्यक्ति या संस्था को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
कभी उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने वाले आजम खान आज कानूनी चुनौतियों, प्रशासनिक कार्रवाइयों और राजनीतिक कमजोरियों से घिरे हुए हैं। जिस जौहर यूनिवर्सिटी को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि और विरासत के रूप में स्थापित करने का सपना देखा था, वही आज विवादों और सरकारी कार्रवाई के केंद्र में है। आने वाले समय में अदालतों के फैसले और प्रशासनिक कार्रवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि चार दशक तक कायम रहा आजम खान का राजनीतिक वर्चस्व अब पहले जैसा नहीं रहा और रामपुर की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।
