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Reading: वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा दर्जा देने की तैयारी, मोदी कैबिनेट के फैसले से देशभर में नई बहस
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वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा दर्जा देने की तैयारी, मोदी कैबिनेट के फैसले से देशभर में नई बहस

The Hill India News
Last updated: May 6, 2026 7:19 am
The Hill India News
Published: May 6, 2026
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की पहली बैठक में एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला लिया गया है. सरकार ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम में संशोधन का रास्ता भी साफ हो गया है. इस फैसले के बाद अब वंदे मातरम के अपमान, गायन में बाधा डालने या उसके प्रति असम्मानजनक व्यवहार करने पर भी वही कानूनी कार्रवाई हो सकेगी, जो अभी राष्ट्रगान के मामले में लागू होती है.

सरकार के इस फैसले को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है. कैबिनेट बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा रहा है और इसे केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की भावना का प्रतीक माना जाना चाहिए. इसी आधार पर इसे राष्ट्रगान के समान संवैधानिक और कानूनी संरक्षण देने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है.

प्रस्तावित संशोधन के अनुसार राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम की धारा-3 में बदलाव किया जाएगा. अभी इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान के गायन में बाधा डालता है या किसी सभा में राष्ट्रगान के दौरान अशांति फैलाता है, तो उसे तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. दोबारा अपराध करने पर न्यूनतम एक वर्ष की सजा का प्रावधान भी है. अब यही नियम ‘वंदे मातरम’ पर भी लागू होंगे. यानी भविष्य में इस गीत के अपमान को भी दंडनीय अपराध माना जाएगा.

सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है जब देश ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है. पिछले कुछ महीनों से इस गीत को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. संसद में भी इस विषय पर विशेष चर्चा हुई थी. दिसंबर में आयोजित चर्चा के दौरान कई सांसदों ने मांग उठाई थी कि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के समान दर्जा दिया जाना चाहिए. उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि तुष्टीकरण की राजनीति के कारण इस गीत को लंबे समय तक विवादों में घसीटा गया और इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई.

इसी क्रम में जनवरी महीने में गृह मंत्रालय ने ‘वंदे मातरम’ के गायन और उसके दौरान पालन किए जाने वाले आचरण को लेकर दिशा-निर्देश भी जारी किए थे. सरकारी कार्यक्रमों, विद्यालयों और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजनों में इसके सभी छह अंतरों के गायन पर जोर दिया गया था. इसके बाद संसद के बजट सत्र के समापन के अवसर पर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरों का सामूहिक पाठ भी किया गया था.

पश्चिम बंगाल चुनाव में भी ‘वंदे मातरम’ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा. भारतीय जनता पार्टी ने इसे बंगाली अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया. पार्टी ने राज्यभर में सामूहिक गायन, पदयात्राएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए. चुनावी सभाओं में बंकिम चंद्र चटर्जी की विरासत और उनके योगदान का उल्लेख प्रमुखता से किया गया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने इस मुद्दे के जरिए बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की कोशिश की.

हालांकि सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस भी तेज हो गई है. विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के नाम पर भावनात्मक मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं समर्थकों का तर्क है कि ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारियों की प्रेरणा रहा है और उसे राष्ट्रगान जैसा सम्मान मिलना चाहिए.

अब सभी की नजरें संसद पर टिकी हैं, जहां इस संशोधन विधेयक को पेश किया जाएगा. यदि संसद से मंजूरी मिलती है तो ‘वंदे मातरम’ को आधिकारिक रूप से राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण प्राप्त हो जाएगा. इससे देश की सांस्कृतिक और राजनीतिक बहस में एक नया अध्याय जुड़ने की संभावना है।

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