मानद पीएचडी पर छिड़ी बहस: योगी आदित्यनाथ ने रविकिशन पर ली चुटकी, जानिए क्या कहते हैं नियम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सांसद रविकिशन के बीच हल्के-फुल्के अंदाज़ में होने वाली नोकझोंक एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मुद्दा बना रविकिशन को मिली मानद पीएचडी (Honorary PhD) की उपाधि। एक कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने इस विषय पर मजाकिया अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी डिग्री “सिर्फ गले में टांगने के काम आती है”, जिससे न तो कोई डॉक्टर बन जाता है और न ही प्रोफेसर।
दरअसल, कार्यक्रम में बोलते हुए योगी आदित्यनाथ ने एक किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वे एक बार रविकिशन से मिले, तो उन्होंने शिकायत की कि मुख्यमंत्री ने उन्हें पीएचडी मिलने पर बधाई नहीं दी। इस पर योगी ने जवाब दिया कि यह मानद उपाधि है, कोई अकादमिक डिग्री नहीं। उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई इस आधार पर अपने नाम के आगे “डॉक्टर” या “प्रोफेसर” लगाने लगे, तो यह भ्रम पैदा कर सकता है। उन्होंने हंसी-मजाक में यह भी जोड़ा कि “अगर ऐसा डॉक्टर इलाज करने लगे तो क्या होगा?”
यह बयान सामने आने के बाद मानद उपाधियों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। आम लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर मानद पीएचडी क्या होती है और इसे पाने के बाद व्यक्ति किन उपाधियों का इस्तेमाल कर सकता है।
क्या होती है मानद पीएचडी?
मानद पीएचडी (Honorary Doctorate) किसी भी विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली एक विशेष सम्मान उपाधि होती है। यह उन व्यक्तियों को दी जाती है जिन्होंने अपने क्षेत्र—चाहे वह कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा, राजनीति या कोई अन्य क्षेत्र हो—में असाधारण योगदान दिया हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह डिग्री नियमित पढ़ाई, शोध या परीक्षा के माध्यम से हासिल नहीं की जाती, बल्कि यह एक प्रतीकात्मक सम्मान होती है।
भारत में केवल मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय ही ऐसी उपाधियां प्रदान कर सकते हैं। आमतौर पर यह सम्मान दीक्षांत समारोह के दौरान दिया जाता है और इसे एक उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, न कि शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण के रूप में।
क्या नाम के आगे ‘डॉ.’ या ‘प्रोफेसर’ लगाया जा सकता है?
इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुसार, मानद पीएचडी प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने नाम के आगे “Dr.” (डॉक्टर) नहीं लगा सकता। ऐसा करना भ्रामक माना जाता है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि व्यक्ति ने वास्तविक शोध कार्य कर यह डिग्री अर्जित की है।
इसी तरह “प्रोफेसर” की उपाधि भी केवल उन लोगों के लिए होती है जो किसी शैक्षणिक संस्थान में उस पद पर नियुक्त होते हैं। केवल मानद उपाधि मिलने से कोई व्यक्ति प्रोफेसर नहीं बन जाता।
हालांकि, यदि कोई व्यक्ति अपनी मानद उपाधि का उल्लेख करना चाहता है, तो उसे अपने नाम के साथ “Honoris Causa” या “(Hon.)” लिखना होता है। उदाहरण के लिए, “XYZ (Hon. PhD)” या “Doctor of Letters (Honoris Causa)” जैसे प्रारूप का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्या मानद डिग्री का कोई व्यावहारिक उपयोग है?
मानद उपाधि का उद्देश्य केवल सम्मान देना होता है। इसे किसी नौकरी, पद या पेशेवर लाभ के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। यह किसी भी तरह से शैक्षणिक योग्यता का विकल्प नहीं है। इसलिए इसे केवल एक प्रतिष्ठित सम्मान के रूप में ही देखा जाता है।
क्यों उठती है बार-बार बहस?
मानद उपाधियों को लेकर विवाद और बहस इसलिए भी होती है क्योंकि कई बार लोग इसका गलत उपयोग कर लेते हैं या इससे जुड़ी सीमाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में सरकार और नियामक संस्थाएं समय-समय पर यह स्पष्ट करती रहती हैं कि इन उपाधियों का सही उपयोग क्या है।
योगी आदित्यनाथ का बयान भले ही मजाकिया अंदाज में दिया गया हो, लेकिन इसके जरिए एक गंभीर संदेश जरूर गया है—सम्मान अपनी जगह है, लेकिन नियमों का पालन करना भी उतना ही जरूरी है।
कुल मिलाकर, मानद पीएचडी एक सम्मानजनक उपलब्धि जरूर है, लेकिन यह किसी शैक्षणिक डिग्री का विकल्प नहीं है। इसलिए इसे उसी रूप में स्वीकार करना और उपयोग करना ही सही तरीका है।



