
मुंबई/पुणे: देश के सबसे समृद्ध और विकसित राज्यों में गिने जाने वाले महाराष्ट्र की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। आर्थिक विकास, आधुनिक शहरों और बेहतर शिक्षा सुविधाओं के बावजूद राज्य में जन्म के समय लिंगानुपात लगातार गिरता जा रहा है। सरकारी नमूना पंजीकरण प्रणाली (Sample Registration System-SRS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में हर 1000 लड़कों पर केवल 888 बेटियों का जन्म हो रहा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 914 है। यह आंकड़ा न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
महाराष्ट्र विधानसभा में मई 2026 के अंतिम सप्ताह में प्रस्तुत रिपोर्ट ने इस समस्या को फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 से 2022 के बीच राज्य में प्रति 1000 लड़कों पर औसतन 899 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। यह आंकड़ा देश के औसत 918 से काफी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल सामाजिक असमानता नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में गंभीर जनसांख्यिकीय संकट का संकेत भी है।
आर्थिक तरक्की के बावजूद बेटियों के प्रति भेदभाव
महाराष्ट्र को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। मुंबई, पुणे, नासिक और नागपुर जैसे बड़े शहर उद्योग, व्यापार, शिक्षा और तकनीक के केंद्र हैं। राज्य का प्रति व्यक्ति आय स्तर देश के अधिकांश राज्यों से अधिक है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बेटियों के जन्म को लेकर समाज की सोच क्यों नहीं बदल रही?
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक विकास और सामाजिक विकास हमेशा एक साथ नहीं चलते। आधुनिक जीवनशैली अपनाने के बावजूद समाज के कई हिस्सों में आज भी बेटे को परिवार का वारिस और बुजुर्गों का सहारा माना जाता है, जबकि बेटी को बोझ समझने की मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
शहरों का हाल गांवों से भी ज्यादा चिंताजनक
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच का अंतर है। आमतौर पर यह माना जाता है कि शहरों में शिक्षा का स्तर अधिक होता है, महिलाओं के प्रति जागरूकता बेहतर होती है और लैंगिक समानता को ज्यादा महत्व दिया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के आंकड़े इस धारणा को गलत साबित करते हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले एक दशक में स्थिति में सुधार देखने को मिला है। गांवों में जहां पहले प्रति 1000 लड़कों पर 888 लड़कियां जन्म लेती थीं, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 910 तक पहुंच गया है। यह दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान और सरकारी योजनाओं का कुछ सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। पिछले दशक में शहरों में प्रति 1000 लड़कों पर 908 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया था, लेकिन अब यह संख्या घटकर केवल 885 रह गई है। कुछ रिपोर्टों में यह आंकड़ा 874 तक भी बताया गया है। इसका मतलब है कि आधुनिकता और तकनीकी सुविधाओं से लैस शहरों में बेटियों के प्रति भेदभाव और अधिक गहराता जा रहा है।
क्या अवैध लिंग जांच बन रही है बड़ी वजह?
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि शहरों में गिरते लिंगानुपात के पीछे सबसे बड़ा कारण अवैध लिंग जांच और उसके बाद होने वाले गर्भपात हो सकते हैं। भारत में जन्म से पहले बच्चे का लिंग बताना और उसके आधार पर गर्भपात कराना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद कई जगहों पर यह अवैध कारोबार गुपचुप तरीके से जारी होने की आशंका जताई जाती है।
आसान तकनीकी पहुंच, निजी अस्पतालों और अल्ट्रासाउंड केंद्रों की अधिक संख्या तथा आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता के कारण शहरों में ऐसे मामलों की संभावना अधिक मानी जाती है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों का लिंगानुपात अधिक तेजी से गिर रहा है।
विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता
देश की प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, लेखिका और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की पूर्व प्रोफेसर डॉ. वंदना सोनलकर का कहना है कि महाराष्ट्र का यह पैटर्न नया नहीं है। उनके अनुसार केवल आर्थिक समृद्धि आने से महिलाओं की स्थिति अपने आप बेहतर नहीं हो जाती।
डॉ. सोनलकर का कहना है कि शहरी महाराष्ट्र में तकनीक तक आसान पहुंच ने इस समस्या को और बढ़ाया है। कई परिवार छोटे परिवार की योजना के साथ आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि उनके घर में कम से कम एक बेटा अवश्य हो। यही सोच बेटियों के जन्म के खिलाफ भेदभाव को जन्म देती है।
उन्होंने यह भी कहा कि कानून के बावजूद कुछ मामलों में चिकित्सा क्षेत्र के लोग भी इस अवैध प्रक्रिया में शामिल पाए जाते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो जाती है।
छोटे परिवार और बेटे की चाहत का खतरनाक मेल
सरकारी रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.5 रह गई है। इसका अर्थ है कि औसतन एक महिला केवल एक या दो बच्चों को जन्म दे रही है। जबकि जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर 2.1 होनी चाहिए।
जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार जब परिवार छोटा रखने की प्रवृत्ति बढ़ती है और साथ ही बेटे की चाहत बनी रहती है, तब लिंगानुपात पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कई परिवार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके सीमित बच्चों में कम से कम एक बेटा जरूर हो। इस मानसिकता के कारण बेटियों के जन्म की संभावना कम हो जाती है।
अन्य राज्यों से पीछे छूटा महाराष्ट्र
देश के कई राज्यों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किया है। छत्तीसगढ़ इस सूची में सबसे आगे है, जहां प्रति 1000 लड़कों पर 978 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया है। इसके बाद केरल का स्थान है, जहां यह आंकड़ा 974 है। इन राज्यों ने जागरूकता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से बेहतर परिणाम हासिल किए हैं।
इसके विपरीत महाराष्ट्र, जो आर्थिक रूप से कहीं अधिक मजबूत माना जाता है, इस मामले में काफी पीछे दिखाई देता है। यह दर्शाता है कि केवल आर्थिक विकास ही सामाजिक समानता की गारंटी नहीं दे सकता।
उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा की स्थिति भी चिंताजनक
रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड देश में सबसे खराब स्थिति वाले राज्यों में शामिल है। वहां प्रति 1000 लड़कों पर केवल 872 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया है। दिल्ली में यह आंकड़ा 876 और हरियाणा में 885 है।
हालांकि हरियाणा ने पिछले कुछ वर्षों में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों के जरिए सुधार की दिशा में प्रयास किए हैं, लेकिन अभी भी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
समाज पर पड़ सकते हैं दूरगामी प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लिंगानुपात में यह गिरावट जारी रही तो आने वाले वर्षों में समाज को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लड़कियों की संख्या कम होने से विवाह योग्य महिलाओं की कमी, मानव तस्करी, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि और सामाजिक असंतुलन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इतिहास बताता है कि जहां भी पुरुषों और महिलाओं की संख्या में बड़ा अंतर पैदा हुआ है, वहां सामाजिक तनाव और अपराधों में वृद्धि देखने को मिली है। इसलिए यह केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे समाज की स्थिरता और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सामाजिक सोच में बदलाव लाना होगा। अवैध लिंग जांच के खिलाफ सख्त कार्रवाई, बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना और समाज में लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है।
इसके अलावा स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और शहरी समुदायों में विशेष अभियान चलाकर लोगों को यह समझाना होगा कि बेटा और बेटी दोनों समान हैं। सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।



