
नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली के 51वें दीक्षांत समारोह में मंगलवार को चिकित्सा जगत के भविष्य और तकनीक के समन्वय पर एक महत्वपूर्ण विमर्श देखने को मिला। समारोह के मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने उभरती हुई तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और चिकित्सा नैतिकता के बीच की बारीक लकीर को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, वह मरीज के बिस्तर के पास खड़े एक डॉक्टर के नैतिक दायित्व और मानवीय स्पर्श का स्थान कभी नहीं ले सकती।
इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा भी उपस्थित रहे, जहाँ देश के भविष्य के डॉक्टरों को डिग्री प्रदान की गई और उन्हें राष्ट्र सेवा का संकल्प दिलाया गया।
AI बनाम मानवीय संवेदना: तकनीक की सीमाएँ
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार किया, लेकिन डॉक्टरों को आगाह भी किया। उन्होंने कहा, “आज AI-संचालित तकनीक चिकित्सा सहित हर क्षेत्र में अपनी पैठ बना रही है। निदान (Diagnosis) से लेकर उपचार की योजना बनाने तक में इसकी मदद ली जा रही है। लेकिन, एक डॉक्टर की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ और उसका ‘मानवीय स्पर्श’ ऐसी चीजें हैं जिन्हें कोई भी कोड या एल्गोरिदम रिप्लेस नहीं कर सकता।”
उन्होंने डॉक्टरों को याद दिलाया कि एक मरीज जब अस्पताल आता है, तो वह केवल इलाज नहीं, बल्कि ढांढस और सहानुभूति की तलाश में भी होता है। उपराष्ट्रपति के शब्दों में, “आपकी चिकित्सा पद्धति से अधिक प्रभावी आपके द्वारा कहे गए कुछ विनम्र शब्द और मरीज के प्रति दिखाई गई संवेदना हो सकती है। कई बार दवा से ज्यादा असर एक डॉक्टर का सकारात्मक व्यवहार करता है।”
डॉक्टरों से अपील: ‘मरीजों के बेतुके सवालों पर न खोएं धैर्य’
चिकित्सा के पेशे में बढ़ते दबाव और डॉक्टरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने ‘धैर्य’ को एक अनिवार्य गुण बताया। उन्होंने युवा डॉक्टरों से विशेष अपील की कि वे मरीजों के प्रति अधिक सहनशील बनें।
अक्सर ग्रामीण या कम शिक्षित पृष्ठभूमि से आने वाले मरीज बीमारी के डर से कई बार ‘बेतुके’ या ‘अजीब’ सवाल पूछ सकते हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा, “जब मरीज आपसे सवाल पूछें, तो चिढ़ने के बजाय धैर्य रखें। यदि आप उन्हें सरल भाषा में चीजों को समझाएंगे, तो वे निश्चित रूप से समझेंगे। एक डॉक्टर और मरीज के बीच का संवाद ही उपचार की पहली सीढ़ी है।”
प्रतिभा पलायन पर रोक और स्वदेश सेवा का आह्वान
दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति ने ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के मुद्दे को भी छुआ। उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि वे ज्ञान के विस्तार के लिए दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में जाएं और वहां के अनुभवों को सीखें। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि शिक्षा और विशेषज्ञता प्राप्त करने के बाद उन्हें अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए वापस लौटना चाहिए।
उन्होंने कहा, “विदेश जाकर अध्ययन करने के अवसर को कभी न गवाएं, लेकिन यह हमेशा याद रखें कि आपके देश और यहां के लोगों को आपकी सेवाओं की सबसे अधिक आवश्यकता है। विकसित भारत के निर्माण में डॉक्टरों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।”
स्वास्थ्य ढांचे का विस्तार और एम्स की भूमिका
समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में नए एम्स (AIIMS) खोलने के सरकार के निर्णय की सराहना की। उन्होंने कहा कि अब दूर-दराज के क्षेत्रों के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दिल्ली की ओर नहीं भागना पड़ता। क्षेत्रीय स्तर पर एम्स की उपलब्धता ने न केवल दिल्ली एम्स का बोझ कम किया है, बल्कि अंतिम छोर तक उत्कृष्ट स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई हैं।
उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की भी प्रशंसा की, जिसने छात्रों की बढ़ती आकांक्षाओं को देखते हुए कई राज्यों में नए चिकित्सा और नर्सिंग कॉलेजों की स्थापना की है। उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि ये कदम भविष्य में देश की स्वास्थ्य प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाएंगे।
एम्स का 51वां दीक्षांत समारोह केवल डिग्री वितरण का उत्सव नहीं रहा, बल्कि इसने चिकित्सा के आधुनिक युग में नैतिकता, तकनीक और राष्ट्रीय कर्तव्य का एक रोडमैप भी तैयार किया। उपराष्ट्रपति के संबोधन ने युवा डॉक्टरों को यह संदेश दिया कि तकनीक एक उपकरण हो सकती है, लेकिन उपचार की असली शक्ति मानवीय सहानुभूति और धैर्य में ही निहित है।



