देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक विशेष अदालत ने दो साल पुराने बहुचर्चित दुष्कर्म और लूट के मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। देहरादून स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट (पॉक्सो/सत्र न्यायालय) ने साक्ष्यों की कमी और बयानों में भारी विरोधाभास के चलते आरोपी को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए बरी कर दिया है।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का अभाव और पीड़िता के बयानों में समय-समय पर आए बदलाव इस फैसले के मुख्य आधार बने।
क्या था पूरा घटनाक्रम?
मामले की जड़ें मई 2023 से जुड़ी हैं। हिमाचल प्रदेश की रहने वाली एक युवती ने देहरादून पुलिस को दी गई शिकायत में आरोप लगाया था कि 3 मई 2023 की रात वह आईएसबीटी (ISBT) जाने के लिए एक टैक्सी में सवार हुई थी। पीड़िता का दावा था कि टैक्सी चालक उसे गंतव्य की ओर ले जाने के बजाय सहारनपुर रोड स्थित एक सुनसान जंगल की ओर ले गया।
आरोप के मुताबिक, चालक ने वाहन को लॉक कर दिया और युवती के साथ जबरन दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया। इतना ही नहीं, शिकायत में यह भी कहा गया था कि आरोपी ने पीड़िता का पर्स और अन्य कीमती सामान लूट लिया और विरोध करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई की और 5 मई 2023 को आरोपी युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
कानूनी प्रक्रिया और दो साल की कैद
गिरफ्तारी के बाद से ही आरोपी न्यायिक हिरासत में था। लगभग दो साल से अधिक समय तक सलाखों के पीछे रहने के बाद, मामले के ट्रायल के दौरान 15 जुलाई 2025 को उसे जमानत मिली थी। इस दौरान बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के बीच लंबी कानूनी बहस चली। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म), 392 (लूट), 341 (गलत तरीके से रोकना) और 411 (चुराया हुआ सामान रखना) के तहत चार्जशीट पेश की थी।
अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु: क्यों बरी हुआ आरोपी?
जिला एवं सत्र न्यायाधीश/एफटीएससी (पॉक्सो) की अदालत ने मामले की बारीकी से समीक्षा की। कोर्ट ने अपने आदेश में उन तकनीकी और तथ्यात्मक खामियों का जिक्र किया, जिन्होंने अभियोजन के केस को कमजोर कर दिया:
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मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि का अभाव: अदालत ने पाया कि घटना के बाद हुई मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या किसी प्रकार की गंभीर चोट के निशान नहीं पाए गए। संबंधित डॉक्टर ने भी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दुष्कर्म की पुष्टि नहीं की थी।
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बयानों में विरोधाभास: सुनवाई के दौरान पीड़िता द्वारा पुलिस को दिए गए प्रारंभिक बयान और अदालत में दर्ज कराए गए बयानों में भारी अंतर पाया गया। घटना के समय, स्थान और परिस्थितियों को लेकर पीड़िता के दावों में निरंतरता की कमी थी।
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बरामदगी पर सवाल: पुलिस ने जिस सामान की बरामदगी का दावा किया था, अदालत ने उसे भी संदेह के घेरे में पाया। साक्ष्यों के जरिए यह स्पष्ट नहीं हो सका कि बरामद सामान वास्तव में पीड़िता का ही था या उसे नियमानुसार जब्त किया गया था।
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एफआईआर में देरी और विसंगतियां: अदालत ने यह भी माना कि प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने और घटना के विवरणों के बीच जो विसंगतियां थीं, उनका लाभ कानूनन आरोपी को मिलना चाहिए।
न्यायपालिका की टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में सजा देने के लिए “संदेह से परे” सबूतों का होना अनिवार्य है। केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर तब जब वैज्ञानिक साक्ष्य (Forensic/Medical Evidence) और मौखिक साक्ष्य आपस में मेल न खाते हों। अदालत ने कहा कि पुलिस जांच और अभियोजन की कहानी में मौजूद विरोधाभास आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देने के लिए पर्याप्त हैं।
इस फैसले के बाद एक बार फिर पुलिस की तफ्तीश के तरीकों और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं। जहां एक ओर गंभीर आरोपों के चलते आरोपी को दो साल जेल में बिताने पड़े, वहीं दूसरी ओर ठोस सबूत न होने के कारण अंततः केस न्यायालय में टिक नहीं सका। फिलहाल, कोर्ट के इस आदेश के बाद आरोपी को सभी धाराओं से दोषमुक्त कर दिया गया है।



