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तालिबान की पाबंदियों से अफगानिस्तान पर गहराता संकट: शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर मंडराया बड़ा खतरा

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंध अब देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। खासकर लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार पर लगी पाबंदियों ने न केवल सामाजिक ढांचे को कमजोर किया है, बल्कि आने वाले वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को भी बुरी तरह प्रभावित करने की आशंका बढ़ा दी है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की एक हालिया रिपोर्ट ने इस स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, अगर तालिबान सरकार ने जल्द ही इन प्रतिबंधों को नहीं हटाया, तो वर्ष 2030 तक अफगानिस्तान को 25,000 से अधिक महिला शिक्षक और स्वास्थ्य कर्मियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इनमें लगभग 20,000 महिला शिक्षक और करीब 5,400 महिला स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं। यह संख्या देश के कुल कार्यबल का लगभग 25 प्रतिशत मानी जा रही है, जो किसी भी विकासशील देश के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।

शिक्षा पर सबसे बड़ा असर

तालिबान ने सत्ता में लौटने के बाद लड़कियों की शिक्षा को काफी सीमित कर दिया है। वर्तमान में अफगानिस्तान में लड़कियों को केवल प्राथमिक स्तर तक ही पढ़ाई की अनुमति है, यानी लगभग 12 वर्ष की आयु के बाद उनकी शिक्षा पर रोक लगा दी जाती है। इस फैसले का असर पहले ही लगभग 10 लाख लड़कियों पर पड़ चुका है। यदि यह स्थिति जारी रहती है, तो 2030 तक यह संख्या दोगुनी होकर 20 लाख तक पहुंच सकती है।

इसका सीधा असर देश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ रहा है। जैसे-जैसे पढ़ी-लिखी लड़कियों की संख्या कम होगी, वैसे-वैसे भविष्य में महिला शिक्षकों की उपलब्धता भी घटती जाएगी। अफगानिस्तान जैसे समाज में, जहां कई परिवार अपनी बेटियों को केवल महिला शिक्षकों के पास ही पढ़ने भेजते हैं, वहां यह स्थिति शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से कमजोर कर सकती है।

स्वास्थ्य सेवाओं पर भी खतरा

शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं है। अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत रही हैं, खासकर मातृत्व और महिला स्वास्थ्य से जुड़े क्षेत्रों में। लेकिन महिलाओं के रोजगार पर पाबंदी के कारण यह संख्या तेजी से घट रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक देश में हजारों महिला स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो सकती है, जो 2035 तक और भी गंभीर रूप ले सकती है। अनुमान है कि 2035 तक यह कमी 9,600 तक पहुंच सकती है। इससे महिलाओं और बच्चों को स्वास्थ्य सेवाएं मिलना और भी मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि कई क्षेत्रों में महिलाएं केवल महिला डॉक्टरों या नर्सों से ही इलाज करवाना पसंद करती हैं।

आर्थिक नुकसान भी बड़ा

इस संकट का असर केवल सामाजिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, महिला कार्यबल में गिरावट के कारण अफगानिस्तान को हर साल लगभग 5.3 अरब अफगानी (करीब 84 मिलियन डॉलर) का नुकसान हो सकता है। यह देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.5 प्रतिशत है।

जब किसी देश की आधी आबादी को काम करने और शिक्षा पाने से रोका जाता है, तो उसकी आर्थिक प्रगति भी बाधित हो जाती है। महिलाओं की भागीदारी के बिना कोई भी देश लंबे समय तक स्थिर विकास हासिल नहीं कर सकता।

अंतरराष्ट्रीय अपील और समाधान

यूनिसेफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने तालिबान सरकार से बार-बार अपील की है कि वह महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि अफगानिस्तान की वास्तविक सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को सुरक्षित रखना चाहिए और महिलाओं को शिक्षा तथा रोजगार के अवसर प्रदान करने चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो अफगानिस्तान आने वाले वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों में गंभीर पिछड़ापन झेल सकता है। इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी प्रभावित होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।

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