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Reading: बंगाल और तमिलनाडु में टूटे वोटिंग के तमाम रिकॉर्ड; 91.83% मतदान के साथ बंगाल ने रचा नया इतिहास, CEC ने कहा- ‘मतदाताओं को सलाम’
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बंगाल और तमिलनाडु में टूटे वोटिंग के तमाम रिकॉर्ड; 91.83% मतदान के साथ बंगाल ने रचा नया इतिहास, CEC ने कहा- ‘मतदाताओं को सलाम’

The Hill India News
Last updated: April 23, 2026 3:31 pm
The Hill India News
Published: April 23, 2026
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Photo: PTI
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कोलकाता/चेन्नई: भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में मतदाताओं ने जिस उत्साह का परिचय दिया है, उसने न केवल राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है, बल्कि आजादी के बाद के तमाम रिकॉर्ड्स को भी ध्वस्त कर दिया है। भीषण गर्मी और तपिश के बावजूद, इन दोनों राज्यों के पोलिंग बूथों पर जो कतारें देखी गईं, वे एक बड़े राजनीतिक बदलाव या फिर सत्ता के प्रति प्रचंड भरोसे की ओर इशारा कर रही हैं।

Contents
आंकड़ों की बाजीगरी: ऐतिहासिक बढ़तमुख्य चुनाव आयुक्त का भावुक संदेशउत्तर बंगाल: बीजेपी के गढ़ में क्या है हलचल?भारी मतदान के क्या हैं राजनीतिक मायने?4 मई का इंतजार: बदलाव या निरंतरता?

आंकड़ों की बाजीगरी: ऐतिहासिक बढ़त

चुनाव आयोग द्वारा जारी शाम 7 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में पहले चरण के तहत 91.83 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2021 के विधानसभा चुनाव में पहले चरण में 84.6 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार बंगाल में लगभग 7 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

वहीं, दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडु में भी मतदाताओं ने जबरदस्त जज्बा दिखाया। यहाँ शाम 7 बजे तक 84.73 प्रतिशत कुल मतदान हुआ, जो 2021 के 71.8 प्रतिशत की तुलना में 12.8 प्रतिशत की भारी बढ़त दर्शाता है। बंगाल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव रिकॉर्ड मतदान का यह स्तर बताता है कि जनता इस बार अपने मत की ताकत को लेकर कितनी सजग है।

मुख्य चुनाव आयुक्त का भावुक संदेश

रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोनों राज्यों के मतदाताओं की सराहना की है। उन्होंने अपने बयान में कहा, “इन दोनों राज्यों के मतदाताओं को मेरा सलाम है। आज़ादी के बाद से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में यह अब तक का सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत है। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) हर उस मतदाता का अभिनंदन करता है जिसने इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नई ऊंचाई दी है।”

उत्तर बंगाल: बीजेपी के गढ़ में क्या है हलचल?

राजनीतिक दृष्टि से सबसे दिलचस्प मुकाबला उत्तर बंगाल की सीटों पर माना जा रहा है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उत्तर बंगाल की 54 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का जबरदस्त दबदबा रहा था। कूचबिहार उत्तर, अलीपुरद्वार और फालाकाटा जैसी सीटों पर बीजेपी ने न केवल जीत दर्ज की थी, बल्कि जीत का अंतर भी काफी बड़ा था।

विशेष रूप से कालचीनी जैसी सीटों पर बीजेपी की जीत का अंतर 15 प्रतिशत तक रहा था। राजबंशी और मतुआ समुदायों के समर्थन के साथ-साथ चाय बागान श्रमिकों के मुद्दों ने पिछले चुनाव में बीजेपी के पक्ष में एकतरफा माहौल बनाया था। उस समय तृणमूल कांग्रेस (TMC) यहाँ केवल 5 सीटें ही जीत पाई थी। इस बार बढ़े हुए मतदान प्रतिशत ने टीएमसी की चिंता बढ़ा दी है या फिर यह ममता बनर्जी की ‘दीदी’ वाली छवि की वापसी का संकेत है, यह तो 4 मई को ही स्पष्ट होगा।

भारी मतदान के क्या हैं राजनीतिक मायने?

राजनीति शास्त्र का एक पुराना सिद्धांत कहता है कि जब मतदान प्रतिशत में इतनी बड़ी उछाल आती है, तो वह अक्सर ‘बदलाव’ (Anti-Incumbency) की लहर होती है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के संदर्भ में कई बार भारी मतदान ‘प्रो-इंकम्बेंसी’ (Pro-Incumbency) यानी सत्ताधारी दल के प्रति अटूट विश्वास का भी प्रतीक रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वोटिंग किसी एक दल के पक्ष में ध्रुवीकृत हुई है, तो जीत का अंतर इतना बड़ा हो सकता है कि विपक्षी दलों के लिए यह सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा। बंगाल में 5 बजे तक ही मतदान 89.93 प्रतिशत तक पहुँच गया था, जो 2021 के मुकाबले करीब 11.91 फीसदी अधिक था। यह स्पष्ट करता है कि मतदाता इस बार ‘मौन’ नहीं है, बल्कि मुखर होकर अपने भविष्य का फैसला कर रहा है।

4 मई का इंतजार: बदलाव या निरंतरता?

तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल, दोनों ही राज्यों की राजनीति का मिजाज एक-दूसरे से काफी अलग है। तमिलनाडु में जहाँ मुकाबला पारंपरिक रूप से दो बड़े क्षेत्रीय दलों के इर्द-गिर्द रहता है, वहीं बंगाल में इस बार फिर ‘दीदी बनाम मोदी’ की सीधी जंग दिखाई दे रही है।

बढ़ते पारे के बीच जिस तरह से महिलाएं, युवा और बुजुर्ग घरों से बाहर निकले, उसने राज्य की राजनीति की नई रूपरेखा तय कर दी है। क्या जनता ने भ्रष्टाचार और स्थानीय मुद्दों को लेकर बदलाव के लिए वोट किया है? या फिर ममता बनर्जी के कल्याणकारी कार्यों ने एक बार फिर उन्हें सत्ता की दहलीज तक पहुँचाने का रास्ता साफ कर दिया है?

इन तमाम सवालों के जवाब 4 मई को मतगणना के दिन मिलेंगे। लेकिन एक बात तो तय है—बंगाल और तमिलनाडु के मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल होकर पूरी दुनिया को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का संदेश दे दिया है।

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