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उत्तर प्रदेश: मां की मौत के बाद बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक कौन? इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने किया स्पष्ट

प्रयागराज: मां की मृत्यु के बाद नाबालिग बच्चे की कस्टडी किसे मिलेगी, इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हालिया फैसले में महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान की है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि मां के निधन के बाद पिता ही बच्चे का प्राकृतिक (Natural) और वैधानिक अभिभावक होता है और सामान्य परिस्थितियों में वही बच्चे की देखभाल के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति माना जाता है।

यह मामला वाराणसी से जुड़े एक 13 महीने के मासूम बच्चे की कस्टडी को लेकर दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका से संबंधित था। याचिकाकर्ता पिता ने कोर्ट से अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी, जो वर्तमान में उसके ननिहाल पक्ष के पास रह रहा था। पिता ने कोर्ट में यह दलील दी कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है और बच्चे के पालन-पोषण तथा भविष्य को सुरक्षित करने में पूरी तरह सक्षम है। इसलिए उसे बच्चे की कस्टडी देने से इनकार करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया कि बच्चा अभी केवल 13 महीने का है। न्यायालय ने कहा कि इतनी कम उम्र में यदि बच्चे को उसके पिता से अलग रखा जाता है, तो भविष्य में उनके बीच भावनात्मक संबंध विकसित होने में बाधा आ सकती है। यह स्थिति न केवल बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए नुकसानदायक हो सकती है, बल्कि पिता के अधिकारों को भी प्रभावित कर सकती है।

मामले में यह भी सामने आया कि बच्चे की मां का निधन फरवरी 2025 में एक असफल आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान हो गया था। इसके बाद से बच्चा ननिहाल पक्ष—मौसा और मौसी—के पास रह रहा था। ननिहाल पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि बच्चे का जन्म समय से पहले हुआ था और उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता है, जो वे बेहतर तरीके से कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान हुई मृत्यु को लेकर कुछ संदेह भी जताए।

हालांकि कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह पाया कि पिता के खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है और न ही ऐसा कोई सबूत है जिससे यह साबित हो कि वह अपनी पत्नी की मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर पिता को उसके बच्चे से अलग नहीं किया जा सकता।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण निर्णय—तेजस्विनी गौड़ बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी (2019)—का भी हवाला दिया। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि मां की मृत्यु के बाद पिता ही बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक होता है और बच्चे की कस्टडी उसे ही दी जानी चाहिए, बशर्ते वह सक्षम और योग्य हो।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि कस्टडी से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत “बच्चे का सर्वोत्तम हित” (Welfare of the Child) होता है। यानी अदालत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चा शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से सुरक्षित और संतुलित वातावरण में पले-बढ़े।

इसी आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आदेश दिया कि बच्चे की कस्टडी तुरंत उसे सौंपी जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि बच्चे का उसके ननिहाल पक्ष से भावनात्मक संबंध बना रहे। इसके लिए कोर्ट ने हर रविवार शाम 4 बजे से दो घंटे तक मुलाकात (विजिटेशन राइट्स) की अनुमति दी है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी भी प्रकार की परिस्थिति उत्पन्न होती है जिससे बच्चे के हित प्रभावित होते हैं, तो संबंधित पक्ष दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

यह फैसला न केवल एक विशेष मामले में न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि ऐसे तमाम मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन भी प्रदान करता है, जहां माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु के बाद बच्चे की कस्टडी को लेकर विवाद उत्पन्न होता है।

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