
नैनीताल/देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, जो कभी अपनी हरी-भरी वादियों और बागों के लिए जानी जाती थी, आज अनियोजित शहरीकरण और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रही है। इस गंभीर पारिस्थितिक संकट पर नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। देहरादून जिले की पहाड़ियों की तलहटी (Foot-hills) में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध निर्माण के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने प्रशासन को आड़े हाथों लिया है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार, मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA), और राज्य जैव विविधता बोर्ड को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
संवेदनशील ढलानों पर धड़ल्ले से निर्माण: याचिकाकर्ता की दलील
यह पूरा मामला देहरादून निवासी रेनू पॉल द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं। शपथ पत्र के माध्यम से बताया गया कि देहरादून के फुटहिल क्षेत्रों में, जहाँ ढलान 30 डिग्री से अधिक है, वहां नियमों को ताक पर रखकर बहुमंजिला इमारतें और व्यावसायिक परिसर खड़े कर दिए गए हैं।
याचिका में कहा गया है कि ये क्षेत्र ‘इकोलॉजिकल सेंसिटिव ज़ोन’ (ESZ) के अंतर्गत आते हैं और भूस्खलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। देहरादून फुटहिल अवैध निर्माण हाईकोर्ट के इस मामले में यह तर्क दिया गया है कि यदि इन निर्माणों को तत्काल नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
2019 के बाद फिर गरमाया मामला
हैरानी की बात यह है कि यह मामला साल 2021 से लंबित था, लेकिन संबंधित विषयों पर साल 2019 के बाद से कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हो सकी थी। याचिकाकर्ता रेनू पॉल ने दोबारा विस्तृत शपथ पत्र पेश कर अदालत को अवगत कराया कि पिछले कुछ वर्षों में स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ी है।
अदालत ने पूर्व में भी इन क्षेत्रों के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी, जिसे लेकर प्रशासन की सुस्ती पर अब हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी निर्माण को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
कंक्रीट के जंगल में बदलता देहरादून: एक चेतावनी
देहरादून का भौगोलिक स्वरूप तेजी से बदल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दून घाटी की तलहटी में स्थित पहाड़ियाँ शहर के लिए ‘स्पंज’ का काम करती हैं, जो वर्षा जल को सोखती हैं। लेकिन अब वहां बिछ रही कंक्रीट की चादर ने जल संचयन की प्रक्रिया को रोक दिया है।
अवैध निर्माण का प्रभाव:
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भूस्खलन का खतरा: 30 डिग्री से अधिक ढलान वाली मिट्टी निर्माण का भार सहने में सक्षम नहीं है।
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जैव विविधता का ह्रास: जैव विविधता बोर्ड की अनदेखी के कारण दुर्लभ वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं।
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जल भराव की समस्या: प्राकृतिक नालों और जल निकासी क्षेत्रों पर अतिक्रमण से मानसून के दौरान बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो रही है।
MDDA और जैव विविधता बोर्ड की भूमिका पर सवाल
हाईकोर्ट ने इस मामले में MDDA (मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण) की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। यह प्राधिकरण शहर के नियोजन और अवैध निर्माण रोकने के लिए जिम्मेदार है, लेकिन फुटहिल क्षेत्रों में बढ़ती इमारतों की कतार इसकी कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करती है। इसके साथ ही, जैव विविधता बोर्ड से भी पूछा गया है कि पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण इन क्षेत्रों में निर्माण की अनुमति कैसे दी जा रही है या उनके संरक्षण के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
क्या होगा अगला कदम?
अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद तय की है। कानून के जानकारों का मानना है कि यदि प्रशासन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाता है, तो हाईकोर्ट निर्माणाधीन परियोजनाओं पर ‘स्टे’ (रोक) लगाने या अवैध घोषित की गई इमारतों को गिराने का आदेश दे सकता है।
देहरादून के नागरिकों और पर्यावरणविदों ने हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप का स्वागत किया है। उनका कहना है कि देहरादून फुटहिल अवैध निर्माण हाईकोर्ट की यह सख्ती ही दून की पहाड़ियों को विनाश से बचा सकती है।
विकास बनाम विनाश की बहस
उत्तराखंड में ‘विकास’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के बीच का संतुलन हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। देहरादून के फुटहिल में हो रहा निर्माण इसी संघर्ष का हिस्सा है। जहाँ एक ओर बिल्डर और रियल एस्टेट लॉबी मुनाफे के लिए नियमों को मरोड़ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति अपना संतुलन खो रही है। नैनीताल हाईकोर्ट का यह ताजा आदेश न केवल देहरादून के लिए, बल्कि पूरे उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक नजीर साबित हो सकता है।
अब सबकी निगाहें तीन हफ्ते बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ सरकार को यह साबित करना होगा कि वह राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए कितनी गंभीर है।



