देहरादून/विकासनगर। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के विकासनगर थाना क्षेत्र से जुड़े एक बहुचर्चित और संवेदनशील मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय (पोक्सो) ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने 13 वर्षीय नाबालिग लड़की के अपहरण, बंधक बनाकर जबरन शादी करने और बार-बार दुष्कर्म किए जाने के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे सभी छह आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश (पोक्सो) रजनी शुक्ला की अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
क्या था पूरा मामला? आरोपों की भयावहता
यह मामला 12 अक्टूबर 2020 का है, जिसने उस वक्त पूरे विकासनगर क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था। पीड़िता के अनुसार, जब वह खेतों में शौच के लिए गई थी, तब पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने उसे झांसा देकर बुलाया। आरोप था कि उसे नशीला पदार्थ सुंघाकर बेहोश किया गया और कार में डालकर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ले जाया गया।
पीड़िता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उसे लगभग एक साल तक बंधक बनाकर रखा गया, जहां उसकी मर्जी के खिलाफ एक अधेड़ व्यक्ति से उसकी शादी करवा दी गई। इस दौरान उसके साथ बार-बार शारीरिक शोषण और मारपीट की गई। पुलिस ने इस मामले में सुकरमपाल, सुनील, शशि, लक्ष्मी, संदीप और सविता के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।
अदालती कार्यवाही: अभियोजन पक्ष की विफलता
लंबे समय तक चली सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के बीच तीखी बहस हुई। बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि पूरा मामला झूठा और मनगढ़ंत है, जिसे आपसी रंजिश के चलते बनाया गया है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों का बारीकी से अवलोकन किया।
न्यायाधीश रजनी शुक्ला ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून केवल आरोपों पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों पर चलता है। अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से इस अपराध को अंजाम दिया था। परिणामस्वरूप, अदालत ने सुकरमपाल समेत सभी छह आरोपियों को दोषमुक्त (Acquitted) घोषित कर दिया।
पुलिस जांच के ‘लूपहोल्स’ (खामियां) आए सामने
इस मामले में आरोपियों के बरी होने के पीछे पुलिस जांच की गुणवत्ता एक बड़ी वजह बनकर उभरी है। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने जांच अधिकारी (IO) की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए, जिन्हें अदालत ने भी संज्ञान में लिया:
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कार की बरामदगी न होना: अपहरण में जिस वाहन के इस्तेमाल का दावा किया गया था, पुलिस उसे जांच के दायरे में लाने या बरामद करने में विफल रही।
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डिजिटल साक्ष्यों का अभाव: आरोपियों के बीच आपसी संपर्क या साजिश को साबित करने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और टावर लोकेशन जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी प्रमाण नहीं जुटाए गए।
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वित्तीय लेनदेन: कथित शादी और सौदेबाजी से जुड़े पैसों के लेनदेन का कोई भी दस्तावेजी प्रमाण पुलिस अदालत के समक्ष पेश नहीं कर सकी।
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घटनास्थल का निरीक्षण: कथित बंधक स्थल और शादी के स्थान से जुड़े साक्ष्य संकलन में भी भारी लापरवाही देखी गई।
मेडिकल रिपोर्ट ने कमजोर किया केस
किसी भी दुष्कर्म के मामले में मेडिकल रिपोर्ट सबसे अहम कड़ी होती है, लेकिन इस केस में मेडिकल साक्ष्य भी अभियोजन के पक्ष में नहीं रहे। चिकित्सकों की टीम ने पीड़िता की जांच के बाद अपनी रिपोर्ट में दुष्कर्म के संबंध में कोई निश्चित राय नहीं दी। साथ ही, पीड़िता के शरीर पर ऐसे कोई चोट के निशान या संघर्ष के चिन्ह नहीं पाए गए जो बंधक बनाकर रखने या मारपीट के दावों की पुष्टि करते हों। इस विरोधाभास ने बचाव पक्ष के तर्कों को और मजबूती प्रदान की।
न्याय प्रक्रिया और समाज के सामने खड़े प्रश्न
इस फैसले के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या पुलिस की ढीली जांच के कारण गंभीर अपराधों के आरोपी कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पोक्सो जैसे गंभीर अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में यदि शुरुआती जांच (Investigative stage) में ही वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्य नहीं जुटाए जाते, तो मुकदमे का भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
विकासनगर के इस मामले ने न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर एक नाबालिग के साथ हुए कथित अन्याय की असली परतें क्या थीं, जिन्हें कानून की कसौटी पर नहीं कसा जा सका।



