
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले लागू की गई लंबी अवधि की शराबबंदी को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग के निर्देश के बाद राज्य में लगभग साढ़े नौ दिनों तक शराब की बिक्री और परोसने पर अलग-अलग चरणों में रोक लगा दी गई है। इस फैसले को लेकर जहां एक तरफ प्रशासन इसे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिए जरूरी कदम बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इसे लेकर कड़ा विरोध जताया है और चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
जारी आदेश के अनुसार, 20 अप्रैल से 23 अप्रैल तक राज्य में शराब की बिक्री और परोसने पर पाबंदी लागू रही। इसके बाद 24 अप्रैल को एक दिन के लिए शराब की दुकानें खोली गईं, लेकिन 25 अप्रैल की शाम 6 बजे से 29 अप्रैल तक फिर से पूर्ण प्रतिबंध लागू कर दिया गया। इसके अलावा, मतगणना के दिन यानी 4 मई को भी पूरे राज्य में शराब की दुकानें बंद रहेंगी। इस तरह कुल मिलाकर करीब 9.5 दिन की अवधि में शराब पर प्रतिबंध लागू रहेगा, जिससे राज्य के आबकारी कारोबार पर बड़ा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इस फैसले को लेकर राज्य के कारोबारी वर्ग में भी चिंता देखी जा रही है। शराब कारोबार से जुड़े एक प्रतिनिधि ने बताया कि पहले ही चुनाव आयोग की तरफ से स्टॉक को लेकर सख्त निर्देश दिए गए थे, जिसके तहत सप्लाई और बिक्री सीमित कर दी गई थी। इसके बाद प्रशासनिक बैठक में यह संकेत दिया गया था कि इस बार लगभग 48 घंटे की बजाय 96 घंटे का प्रतिबंध लगाया जा सकता है, लेकिन अंतिम आदेश में अलग-अलग चरणों में लंबे समय तक पाबंदी लागू कर दी गई। कारोबारियों का कहना है कि इससे उनके व्यापार पर भारी नुकसान होगा, खासकर उन दिनों में जब बिक्री सामान्य रूप से अधिक होती है।
आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लगभग 5400 शराब की दुकानें और बार हैं, जहां रोजाना करीब 80 से 90 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस प्रतिबंध से राज्य को लगभग 1400 करोड़ रुपये तक का राजस्व नुकसान हो सकता है। इनमें से अकेले कोलकाता क्षेत्र में ही करीब 900 करोड़ रुपये तक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा, इस फैसले का असर केवल शराब कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रेस्टोरेंट, होटल और फूड इंडस्ट्री पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।
टीएमसी की ओर से इस निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया दी गई है। पार्टी के नेता अरूप चक्रवर्ती ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष भूमिका निभाने के बजाय राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि पहले से ही कई तरह की पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं और अब शराब के साथ-साथ अन्य गतिविधियों पर भी रोक लगाई जा रही है, जिससे आम जनता को परेशानी हो रही है। उन्होंने यहां तक कहा कि यह फैसला राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकता है और इससे चुनावी माहौल प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
दूसरी ओर, प्रशासन और चुनाव आयोग का तर्क है कि चुनाव के दौरान शराब की उपलब्धता पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता, मतदाताओं को प्रभावित करने या कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने जैसी घटनाओं को रोका जा सके। आयोग का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध अस्थायी होते हैं और चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए आवश्यक हैं।
हालांकि, इस पूरे विवाद ने बंगाल की राजनीति में एक नया मुद्दा खड़ा कर दिया है। जहां एक ओर विपक्ष इसे जनता और कारोबारियों पर अतिरिक्त बोझ बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने का अवसर मान रहा है। कुल मिलाकर, शराबबंदी का यह निर्णय अब केवल प्रशासनिक कदम नहीं रह गया है, बल्कि चुनावी राजनीति का एक अहम मुद्दा बन चुका है, जिस पर आने वाले दिनों में और अधिक सियासी बयानबाजी देखने को मिल सकती है।


