
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल के दिनों में वहां आरक्षित विधानसभा सीटों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिन पर कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी लोकतांत्रिक आवाज को दबाया जा रहा है, जबकि पाकिस्तान की सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इन विरोधों को कानून-व्यवस्था का मुद्दा बताती हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय संगठनों का कहना है कि दशकों से पाकिस्तान के प्रशासनिक नियंत्रण में रहने के बावजूद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से अपेक्षित विकास हासिल नहीं कर पाया है। शिक्षा के बेहतर आंकड़ों के बावजूद यहां बेरोजगारी बढ़ रही है, आय घट रही है और स्थानीय लोगों में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
दो हिस्सों में बंटा है PoK
पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर मुख्य रूप से दो हिस्सों में विभाजित है। पहला हिस्सा तथाकथित “आजाद जम्मू-कश्मीर” कहलाता है, जबकि दूसरा गिलगित-बाल्टिस्तान है। कुल मिलाकर यह क्षेत्र लगभग 90 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है।
आजाद जम्मू-कश्मीर का अपना राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विधानसभा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि यहां की राजनीति पर पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता और सेना का प्रभाव काफी मजबूत है। दूसरी ओर गिलगित-बाल्टिस्तान लंबे समय से संवैधानिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है।
आरक्षित सीटों पर क्यों भड़का विवाद?
वर्तमान विवाद विधानसभा की 45 सीटों में से 12 सीटों को लेकर है, जिन्हें पाकिस्तान कथित शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखता है। स्थानीय संगठनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए करती हैं।
जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) समेत कई संगठनों का कहना है कि इन सीटों पर चुने जाने वाले प्रतिनिधि स्थानीय आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करते, क्योंकि अधिकांश आरक्षित मतदाता और उम्मीदवार पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। विरोध करने वाले लोगों की मांग है कि इस व्यवस्था को समाप्त किया जाए ताकि स्थानीय लोगों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
जुलाई में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है। इसी कारण बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं।
शिक्षा में आगे, रोजगार में पीछे
PoK की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां की साक्षरता दर पाकिस्तान के राष्ट्रीय औसत से बेहतर बताई जाती है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार आजाद जम्मू-कश्मीर में साक्षरता दर लगभग 77.5 प्रतिशत है, जबकि पाकिस्तान का राष्ट्रीय औसत करीब 62.4 प्रतिशत माना जाता है।
लेकिन शिक्षा के बेहतर स्तर के बावजूद रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान में बेरोजगारी दर जहां लगभग 6 से 7 प्रतिशत के बीच बताई जाती है, वहीं आजाद जम्मू-कश्मीर में यह 11 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय उद्योगों की कमी, निवेश का अभाव और सीमित आर्थिक गतिविधियां इस समस्या के प्रमुख कारण हैं। पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग दूसरे क्षेत्रों या विदेशों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
घटती आय ने बढ़ाई मुश्किलें
आर्थिक मोर्चे पर भी PoK की स्थिति चिंताजनक बताई जाती है। रिपोर्टों के अनुसार 2020 तक यहां प्रति व्यक्ति औसत आय लगभग 1,400 से 1,500 अमेरिकी डॉलर के बीच थी। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में यह घटकर 1,300 से 1,400 डॉलर के बीच पहुंच गई है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी क्षेत्र में लोगों की आय घटती है तो उसका सीधा असर बाजार और स्थानीय व्यापार पर पड़ता है। लोगों की खरीद क्षमता कम होने से व्यापारिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं और नए रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो पाते।
इसके विपरीत पाकिस्तान की प्रति व्यक्ति आय अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है, जिसका एक बड़ा कारण विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों द्वारा भेजी जाने वाली रेमिटेंस है। विदेशों से आने वाला धन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन PoK में इसका लाभ सीमित रूप से ही पहुंच पाता है।
बजट में कटौती ने बढ़ाई चिंता
PoK की आर्थिक चुनौतियों को उस समय और झटका लगा जब पाकिस्तान सरकार ने क्षेत्र के लिए आवंटित बजट में कटौती कर दी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2025 में PoK का बजट लगभग 75 अरब पाकिस्तानी रुपये से घटाकर 63 अरब रुपये कर दिया गया।
स्थानीय नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इस कटौती पर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि पहले से ही सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र में बजट कम होने से विकास परियोजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसी क्षेत्र में लगातार निवेश घटता है तो वहां की आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर हो जाती है। यही कारण है कि PoK में रोजगार, उद्योग और बुनियादी सेवाओं को लेकर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।
बुनियादी सुविधाओं के लिए भी आंदोलन
PoK में केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं, बल्कि बिजली, पानी, महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर भी कई बार बड़े आंदोलन हो चुके हैं। पिछले वर्षों में क्षेत्र के विभिन्न शहरों में लोगों ने बढ़ते बिजली बिलों, महंगे आटे और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों के खिलाफ प्रदर्शन किए थे।
स्थानीय संगठनों का आरोप है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद क्षेत्र के लोगों को उसका पर्याप्त लाभ नहीं मिल रहा। कई बार यह सवाल भी उठाया गया कि जलविद्युत परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली का बड़ा हिस्सा बाहर भेजा जाता है, जबकि स्थानीय आबादी को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलतीं।
राजनीतिक अधिकारों पर उठते रहे सवाल
PoK की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से बहस होती रही है। आलोचकों का आरोप है कि क्षेत्र को पूर्ण राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त नहीं है और महत्वपूर्ण निर्णयों में पाकिस्तान की केंद्रीय संस्थाओं की भूमिका अधिक रहती है।
मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े कई समूहों ने समय-समय पर यह चिंता जताई है कि स्थानीय लोगों को अपनी राजनीतिक आकांक्षाएं खुलकर व्यक्त करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। यही कारण है कि समय-समय पर विरोध प्रदर्शन और असंतोष सामने आता रहता है।
भारत और PoK के विकास मॉडल की तुलना
विश्लेषकों द्वारा अक्सर भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की तुलना भी की जाती है। भारत सरकार ने हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर में आधारभूत ढांचे, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन क्षेत्र में बड़े निवेश की घोषणा की है।
वहीं PoK में निवेश, उद्योग और रोजगार के अवसरों को लेकर लगातार चुनौतियां बनी हुई हैं। यही वजह है कि वहां के लोग समय-समय पर बेहतर सुविधाओं, रोजगार और राजनीतिक अधिकारों की मांग को लेकर आवाज उठाते रहे हैं।



