नई दिल्ली/तेहरान: मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व) से आ रही बेहद सनसनीखेज और चिंताजनक खबरों के बीच दुनिया एक बार फिर तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है। महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी वायुसेना द्वारा ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए जाने के बाद, तेहरान ने भी इसका बेहद करारा और आक्रामक जवाब दिया है। इस बीच वाशिंगटन ने ईरान को सख्त लहजे में अंतिम चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि वह जल्द से जल्द सीजफायर (युद्धविराम) की शर्तें मान ले, अन्यथा अमेरिकी हमले और अधिक विनाशकारी व तेज हो जाएंगे।
इस अमेरिकी धमकी के जवाब में पलटवार करते हुए ईरान की शीर्ष संयुक्त सैन्य कमान ने गुरुवार को दुनिया की सबसे संवेदनशील आर्थिक नस पर हाथ रख दिया है। ईरान ने वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) को पूरी तरह से बंद करने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। ईरान ने दुनिया को खुली चुनौती दी है कि अब तेल टैंकरों और कारोबारी जहाजों समेत कोई भी जहाज इस जलमार्ग को क्रॉस करने की कोशिश करेगा, तो ईरानी सेना उस पर सीधा मिसाइल हमला कर उसे नष्ट कर देगी। ईरान के इस आत्मघाती कदम और दो जहाजों पर हुए हमलों ने भारत समेत पूरी दुनिया के नीति-नियंताओं और अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों की सांसें अटका दी हैं।
होर्मुज के बंद होने का मतलब: क्यों कांप उठती है दुनिया की अर्थव्यवस्था?
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक व्यापार के नजरिए से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) महज एक जलमार्ग नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्ततम समुद्री गलियारा है। भौगोलिक रूप से यह संकरा जलमार्ग फ़ारस की खाड़ी (Persian Gulf) को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा ‘ऑयल चोकपॉइंट’ (Oil Chokepoint) कहा जाता है।
अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में रोज उपभोग होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से बड़े-बड़े टैंकरों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहुंचता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और खुद ईरान जैसे ओपेक (OPEC) के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों का अधिकांश कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) इसी रास्ते के भरोसे दुनिया तक सफर तय करते हैं। वैश्विक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्ट्रेट कुछ दिनों के लिए भी पूरी तरह ठप हो जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे दुनिया भर में अभूतपूर्व मंदी और हाहाकार मच जाएगा।
भारत के लिए क्यों बज गई खतरे की घंटी: ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे बड़ा संकट
ईरान के इस कदम से नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में हलचल तेज हो गई है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर सबसे ज्यादा निर्भर है। भारत अपनी तेल और गैस की कुल खपत का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। आंकड़ों के अनुसार, भारत का लगभग 30% से 50% कच्चा तेल और घरेलू रसोई में इस्तेमाल होने वाली लगभग 70% तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) इसी संवेदनशील जलमार्ग से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचती है।
फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह मार्ग भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुख्य प्रवेश द्वार है। यदि यह मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध रहता है, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की किल्लत होने के साथ-साथ महंगाई अनियंत्रित हो सकती है।
राहत की एक पतली लकीर: इस महासंकट के बीच भारत के लिए एकमात्र राहत की बात यह है कि भू-राजनीतिक समीकरणों के चलते ईरान ने भारत को अपने “मित्र देशों” की सूची में बनाए रखा है। ईरानी कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, भारतीय ध्वज वाले व्यापारिक जहाजों को वहां से सुरक्षित गुजरने की अनुमति दी गई है। इसके बावजूद, युद्ध क्षेत्र में किसी भी अनहोनी या ‘कोलैटरल डैमेज’ की आशंका से भारतीय नौसेना (Indian Navy) बेहद सतर्क है और स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है।
ईरान ने दो जहाजों को बनाया निशाना: कागजी चेतावनी नहीं, एक्शन में आई IRGC
ईरान ने साबित कर दिया है कि उसकी यह चेतावनी महज कोई गीदड़भभकी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों की चिंता को और गहरा करते हुए ईरानी सरकारी मीडिया और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना ने पुष्टि की है कि होर्मुज स्ट्रेट को सील करने के आदेश के बाद नियमों और ईरानी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे दो बड़े वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया है।
इन जहाजों पर मिसाइल या ड्रोन से हमला किया गया है, जिसके बाद होर्मुज स्ट्रेट के मुहाने पर फंसे सैकड़ों अन्य जहाजों के क्रू मेंबर्स के बीच भारी दहशत का माहौल है। बीमा कंपनियों ने इस रूट से गुजरने वाले जहाजों का ‘वॉर रिस्क प्रीमियम’ कई गुना बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक लॉजिस्टिक्स चेन पूरी तरह चरमरा गई है।
अमेरिकी सीजफायर की शर्तों को मानने से ईरान का साफ इनकार
वाशिंगटन से मिल रही रिपोर्टों के मुताबिक, पेंटागन और व्हाइट हाउस ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए अपने एयरक्राफ्ट कैरियर (विमान वाहक पोत) और स्टील्थ फाइटर जेट्स को मिडल ईस्ट में तैनात कर दिया है। अमेरिका का कहना है कि ईरान समर्थित गुटों द्वारा अमेरिकी ठिकानों पर किए जा रहे हमलों के जवाब में यह कार्रवाई जरूरी थी।
हालांकि, ईरान के सर्वोच्च धार्मिक और सैन्य नेतृत्व ने अमेरिकी शर्तों के आगे घुटने टेकने से साफ इनकार कर दिया है। ईरान का मानना है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए जानबूझकर युद्ध थोप रहा है। यदि अमेरिका ने अपने हमले नहीं रोके, तो ईरान इस पूरे क्षेत्र को अमेरिकी सेना के लिए ‘कब्रगाह’ बना देगा।
वैश्विक कूटनीति फेल: संयुक्त राष्ट्र असहाय, वार्ता के रास्ते बंद
इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आपातकालीन बैठक बुलाई गई है, लेकिन अमेरिका और उसके मित्र देशों तथा दूसरी तरफ रूस और चीन के वीटो पावर के चलते कोई ठोस नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है। राजनयिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि यदि अगले 48 घंटों में दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे की बातचीत (Backchannel Diplomacy) शुरू नहीं हुई, तो तेल की सप्लाई रुकने से पूरी दुनिया में एक नया आर्थिक और सैन्य संकट खड़ा होना तय है।



