चंपावत (उत्तराखंड): उत्तराखंड के सीमांत जनपद चंपावत में पिछले दिनों सामने आए कथित नाबालिग सामूहिक दुष्कर्म मामले में पुलिस ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसने पूरे प्रदेश को चौंका दिया है। जिसे पहले एक जघन्य अपराध माना जा रहा था, वह दरअसल प्रतिशोध की ज्वाला में लिखी गई एक ‘स्क्रिप्टेड’ साजिश निकली। चंपावत की पुलिस अधीक्षक (SP) रेखा यादव ने मामले का पटाक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि नाबालिग के साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था, बल्कि कुछ लोगों को कानूनी शिकंजे में फंसाने के लिए इस पूरे घटनाक्रम को सुनियोजित ढंग से रचा गया था।
साजिश का मुख्य सूत्रधार और प्रतिशोध की कहानी
पुलिस जांच के अनुसार, इस पूरे प्रकरण का मास्टरमाइंड कमल रावत नामक व्यक्ति है। जांच में सामने आया कि कमल रावत पूर्व में किसी अन्य मामले में आरोपी रहा था और जिन तीन व्यक्तियों को उसने इस झूठे केस में फंसाया, उन्होंने उस पुराने मामले में उसके खिलाफ पैरवी की थी। इसी का बदला लेने के लिए कमल रावत ने एक मासूम नाबालिग को ढाल बनाया।
कमल ने नाबालिग को उसके पिता के इलाज और आर्थिक मदद का लालच देकर इस साजिश में शामिल किया। उसने 5 और 6 मई के घटनाक्रम को इस तरह डिजाइन किया कि वह एक वास्तविक अपराध प्रतीत हो।
वैज्ञानिक साक्ष्यों ने खोली पोल
मामले की गंभीरता को देखते हुए SP रेखा यादव ने 10 सदस्यीय एसआईटी (SIT) का गठन किया था। जांच के दौरान जब वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों का मिलान किया गया, तो कहानी की कड़ियां टूटने लगीं:
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मेडिकल रिपोर्ट: मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) और मेडिकल टीम की रिपोर्ट में नाबालिग के शरीर पर न तो कोई बाहरी चोट के निशान मिले और न ही जबरदस्ती या दुष्कर्म की पुष्टि हुई।
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CCTV और CDR: पीड़िता के मोबाइल की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और इलाके के सीसीटीवी फुटेज ने बताया कि वह अपनी मर्जी से अपने एक पुरुष मित्र के साथ विवाह समारोह में गई थी।
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आरोपियों की लोकेशन: तहरीर में नामजद किए गए तीनों आरोपियों की उपस्थिति घटनास्थल पर तकनीकी रूप से प्रमाणित नहीं हो सकी।
योजनाबद्ध तरीके से बुना गया जाल
पुलिस के अनुसार, कमल रावत ने वारदात के लिए 5 मई का दिन चुना, जब नाबालिग अपनी सहेली की शादी में जाने वाली थी। योजना यह थी कि नाबालिग के पुरुष मित्र के घर पर वारदात को अंजाम दिया जाएगा, लेकिन जब वह मित्र वहां से चला गया, तो कमल ने आनन-फानन में किसी अन्य परिचित के घर को चुना। नाबालिग को वहां बंधक जैसी स्थिति में दिखाने का नाटक रचा गया ताकि पुलिस और समाज की सहानुभूति बटोरी जा सके और आरोपियों को कड़ी सजा दिलवाई जा सके।
जब पुलिस ने कड़ाई से और वैज्ञानिक तरीके से पीड़िता की काउंसलिंग की, तो उसने अंततः स्वीकार कर लिया कि उसके साथ कोई गलत काम नहीं हुआ है। उसने कबूल किया कि कमल रावत और उसकी एक महिला मित्र के बहकावे में आकर उसने कोर्ट और पुलिस के सामने झूठे बयान दिए थे।
उत्तराखंड पुलिस की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति
एसपी रेखा यादव ने प्रेस वार्ता में सख्त लहजे में कहा कि उत्तराखंड पुलिस महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाती है, लेकिन कानून का दुरुपयोग भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा, “जितनी तत्परता से हम असली अपराधियों को पकड़ते हैं, उतनी ही कठोरता उन लोगों के खिलाफ भी बरती जाएगी जो निजी दुश्मनी निकालने के लिए व्यवस्था को गुमराह करते हैं और निर्दोषों को फंसाते हैं।”
पृष्ठभूमि: राजनीति और सामाजिक आक्रोश
गौरतलब है कि इस मामले में शुरुआत में भाजपा के एक पूर्व पदाधिकारी का नाम आने से राजनीतिक माहौल गरमा गया था। स्थानीय निवासियों में भारी आक्रोश था और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन भी हुए थे। पिता की तहरीर, जिसमें कहा गया था कि उनकी बेटी एक कमरे में बंधी हुई मिली, ने मामले को अत्यंत संवेदनशील बना दिया था। हालांकि, एसआई प्रियंका मौर्या और उनकी टीम की गहन छानबीन ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।
वर्तमान में, पुलिस डिजिटल साक्ष्यों और फोरेंसिक रिपोर्ट का अंतिम विश्लेषण कर रही है और साजिश में शामिल अन्य लोगों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।



