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अनिल अंबानी समूह पर सीबीआई का चौतरफा शिकंजा: 17 ठिकानों पर छापेमारी, 27,337 करोड़ के बैंक घोटाले का खुलासा

The Hill India News
Last updated: May 10, 2026 3:39 am
The Hill India News
Published: May 10, 2026
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मुंबई: कॉर्पोरेट जगत की बड़ी हलचलों के बीच, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने शनिवार, 9 मई 2026 को अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस एडीए ग्रुप (Reliance ADA Group) के खिलाफ अपनी जांच को और तेज कर दिया है। जांच एजेंसी ने मुंबई में समूह की तीन प्रमुख कंपनियों से जुड़े 17 अलग-अलग ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। रिलायंस एडीए ग्रुप सीबीआई छापेमारी की यह कार्रवाई बैंकों के हजारों करोड़ रुपये के फंड की कथित धोखाधड़ी और अवैध डायवर्जन के मामले में की गई है।

Contents
इन कंपनियों पर गिरी गाजफर्जी कंपनियों का जाल और ‘कॉमन एड्रेस’ का खेल27,337 करोड़ रुपये का विशाल वित्तीय घाटाशीर्ष अधिकारियों की गिरफ्तारी और कानूनी शिकंजाइंटरमीडियरी कंपनियों की भूमिका की जांच

इन कंपनियों पर गिरी गाज

सीबीआई की इस कार्रवाई का मुख्य केंद्र समूह की तीन महत्वपूर्ण इकाइयां रही हैं:

  1. Reliance Telecom Ltd.

  2. Reliance Commercial Finance Ltd.

  3. Reliance Home Finance Ltd.

जांच एजेंसी के अनुसार, इन कंपनियों और इनके निदेशकों पर आरोप है कि उन्होंने विभिन्न बैंकों से लिए गए ऋण (Loan) का उपयोग उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया जिनके लिए वे लिए गए थे। इसके बजाय, धन को शेल और इंटरमीडियरी कंपनियों के एक जटिल नेटवर्क के जरिए दूसरी जगहों पर डाइवर्ट कर दिया गया।

फर्जी कंपनियों का जाल और ‘कॉमन एड्रेस’ का खेल

8 मई 2026 को विशेष सीबीआई अदालत से प्राप्त सर्च वारंट के बाद की गई इस छापेमारी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक, छापेमारी के दौरान बड़ी संख्या में डिजिटल साक्ष्य और आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद हुए हैं।

जांच में यह भी पाया गया कि कई इंटरमीडियरी कंपनियां, जिनके खातों का उपयोग फंड ट्रांसफर के लिए किया गया था, वे एक ही पते से संचालित हो रही थीं। यह ‘कॉमन एड्रेस’ का पैटर्न फर्जी लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग के शक को और अधिक पुख्ता करता है। जांच एजेंसी अब इन कंपनियों के ‘बेनिफिशियल ओनर्स’ की पहचान करने में जुटी है।

27,337 करोड़ रुपये का विशाल वित्तीय घाटा

अनिल अंबानी समूह के खिलाफ चल रही यह जांच केवल एक या दो मामलों तक सीमित नहीं है। सीबीआई के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में विभिन्न सरकारी बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की शिकायतों के आधार पर कुल सात मामले दर्ज किए गए हैं। इन शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि समूह की कंपनियों ने बैंकिंग प्रणाली को लगभग 27,337 करोड़ रुपये का चूना लगाया है।

यह राशि देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट ऋण धोखाधड़ी मामलों में से एक मानी जा रही है। इससे पहले भी सीबीआई इस मामले में 14 ठिकानों पर तलाशी अभियान चला चुकी है, जिसमें वित्तीय हेराफेरी से जुड़े अहम सुराग हाथ लगे थे।

शीर्ष अधिकारियों की गिरफ्तारी और कानूनी शिकंजा

जांच की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीबीआई पहले ही रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) के दो अत्यंत प्रभावशाली अधिकारियों को गिरफ्तार कर चुकी है। 20 अप्रैल 2026 को डी. विश्वनाथ (जॉइंट प्रेसिडेंट) और अनिल काल्या (वाइस प्रेसिडेंट) को हिरासत में लिया गया था।

डी. विश्वनाथ समूह के बैंकिंग ऑपरेशंस को संभाल रहे थे, जबकि अनिल काल्या फंड मैनेजमेंट और पेमेंट ऑपरेशंस के प्रभारी थे। जांच एजेंसी का मानना है कि इन दोनों अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर फंड का डायवर्जन संभव नहीं था। वर्तमान में दोनों आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं और उनके द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर ही शनिवार की छापेमारी को अंजाम दिया गया है।

इंटरमीडियरी कंपनियों की भूमिका की जांच

सीबीआई की टीम अब उन मध्यस्थ कंपनियों के दफ्तरों और निदेशकों के घरों की तलाशी ले रही है, जिन्होंने बैंक फंड को डाइवर्ट करने के लिए ‘ब्रिज’ के रूप में काम किया। इन कंपनियों के खातों के फोरेंसिक ऑडिट की तैयारी की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पैसा अंतिम रूप से कहां गया। शक है कि इस धन का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में संपत्तियां खरीदने या अन्य गैर-कानूनी निवेशों में इस्तेमाल किया गया हो सकता है।

रिलायंस एडीए ग्रुप सीबीआई छापेमारी ने एक बार फिर भारतीय कॉर्पोरेट जगत में गवर्नेंस और कर्ज प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर समूह की कंपनियां पहले से ही वित्तीय संकट और दिवाला प्रक्रिया (Insolvency) का सामना कर रही हैं, वहीं सीबीआई का यह ताजा प्रहार अनिल अंबानी समूह की मुश्किलें और अधिक बढ़ा सकता है।

आने वाले दिनों में सीबीआई कुछ अन्य निदेशकों और प्रमोटरों को पूछताछ के लिए समन भेज सकती है। बाजार विशेषज्ञों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि इस जांच का प्रभाव समूह की शेष संपत्तियों की नीलामी और बैंकों की रिकवरी प्रक्रिया पर क्या पड़ेगा।

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