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उत्तर प्रदेश: शिक्षामित्रों के मानदेय पर सियासत तेज, अखिलेश यादव का BJP पर हमला, ‘40 हजार बनाम 18 हजार’ को लेकर घमासान

The Hill India News
Last updated: April 9, 2026 5:26 am
The Hill India News
Published: April 9, 2026
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों के मानदेय को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए शिक्षामित्रों के मुद्दे को लेकर खुला पत्र जारी किया है। उन्होंने अपने पत्र में जहां एक ओर वर्तमान सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षामित्रों से राजनीतिक समर्थन की अपील भी की है।

दरअसल, हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने शिक्षामित्रों के मानदेय को 10,000 रुपये से बढ़ाकर 18,000 रुपये प्रतिमाह करने का ऐलान किया है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय शिक्षामित्रों को राहत देने के उद्देश्य से लिया गया है और इसे अप्रैल महीने से लागू किया जाएगा। लेकिन विपक्ष इस फैसले को चुनावी दबाव का परिणाम बता रहा है।

अखिलेश यादव ने अपने खुले पत्र में लिखा कि उनके शासनकाल में शिक्षामित्रों को लगभग 40,000 रुपये तक का मानदेय मिलता था। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 9 वर्षों में भाजपा सरकार की नीतियों के कारण शिक्षामित्रों को आर्थिक और मानसिक रूप से काफी नुकसान झेलना पड़ा है। उन्होंने कहा कि अब जब सरकार ने मानदेय बढ़ाया है तो वह भी “डर के कारण” और “एहसान जताते हुए” किया गया कदम है।

सपा प्रमुख ने अपने पत्र में यह भी दावा किया कि शिक्षामित्रों को हर महीने करीब 22,000 रुपये का नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई सरकार को करनी चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की कि पिछले वर्षों का बकाया भी शिक्षामित्रों को दिया जाए। इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने इसे न्याय और सम्मान से जोड़ने की कोशिश की।

अखिलेश यादव ने अपने पत्र में सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने इसे राजनीतिक मोड़ भी दिया। उन्होंने शिक्षामित्रों से अपील की कि वे आगामी चुनावों में भाजपा के खिलाफ मतदान करें। उन्होंने कहा कि अगर हर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 22,000 वोट भाजपा के खिलाफ डाले जाएं, तो सरकार को सत्ता से बाहर किया जा सकता है और ‘पीडीए सरकार’ बनाई जा सकती है।

उन्होंने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि भाजपा सरकार की नीतियों के कारण कई शिक्षामित्र गंभीर मानसिक तनाव में आए और कुछ मामलों में आत्महत्या जैसी घटनाएं भी सामने आईं। सपा ने ऐसे परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए भविष्य में सहयोग का भरोसा भी दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रदेश की राजनीति में शिक्षामित्रों का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया है। जहां एक ओर भाजपा सरकार अपने फैसले को राहत और सुधार का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के तहत लिया गया निर्णय करार दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों की संख्या काफी अधिक है और उनका सीधा प्रभाव चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले समय में और भी ज्यादा गरमा सकता है। सपा इस मुद्दे को जनसमर्थन जुटाने के लिए एक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है।

वहीं, भाजपा की ओर से अभी तक इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि यह फैसला लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने के लिए लिया गया है और इसे राजनीति से जोड़ना उचित नहीं है।

कुल मिलाकर, शिक्षामित्रों के मानदेय का मुद्दा अब केवल आर्थिक नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा चुनावी राजनीति में कितना प्रभाव डालता है और क्या शिक्षामित्रों को वास्तव में उनके बकाया और सम्मान का समाधान मिल पाता है या नहीं।

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