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नंदा गौरा योजना: ‘बेटियों की उच्च शिक्षा से खिलवाड़ क्यों?’ उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से दो हफ्ते में मांगा जवाब

नैनीताल: उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के दावों के बीच एक हैरान करने वाला प्रशासनिक ढुलमुलपन सामने आया है। राज्य की महत्वाकांक्षी नंदा गौरा योजना का लाभ चमोली जिले की सैकड़ों मेधावी छात्राओं को न मिलने पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले में दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य के महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग समेत संबंधित महकमों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। माननीय न्यायालय ने बेहद तल्ख लहजे में पूछा है कि पात्र होने के बावजूद इन बालिकाओं को अब तक योजना का प्रतिलाभ क्यों नहीं दिया गया? अदालत ने सरकार को दो सप्ताह के भीतर पूरी स्थिति स्पष्ट करने का आदेश देते हुए अगली सुनवाई के लिए 29 जून की तिथि तय की है।

अजीबोगरीब प्रशासनिक विसंगति: जब बाकी बैचों को मिला लाभ, तो 2022-23 की छात्राएं क्यों छूटीं?

यह पूरा मामला राज्य सरकार की कार्यप्रणाली और बजटीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जनहित याचिका में इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है कि राज्य में वर्ष 2020-21 और हालिया वर्ष 2024-25 के बैच की छात्राओं को नंदा गौरा योजना का लाभ सुचारू रूप से दिया गया है। ऐसे में यह समझ से परे है कि केवल वर्ष 2022-23 के बैच की छात्राओं के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?

न्यायालय में सुनवाई के दौरान यह बिंदु बेहद संवेदनशील बनकर उभरा कि यदि योजना का मूल उद्देश्य समान रूप से सभी को लाभ पहुंचाना है, तो एक विशेष शैक्षणिक सत्र की छात्राओं को प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार कैसे बनाया जा सकता है? इस बजटीय विसंगति के कारण चमोली जैसे सुदूर और पर्वतीय क्षेत्र की छात्राओं का भविष्य अधर में लटक गया है।

चमोली की 439 छात्राओं का भविष्य दांव पर: सामाजिक कार्यकर्ता ममता नेगी ने उठाई आवाज

इस पूरे मामले को उजागर करने का श्रेय चमोली जिले की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता ममता नेगी को जाता है। उन्होंने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर गरीब और वंचित तबके की उन बेटियों की आवाज को कानूनी मंच दिया, जिनकी सुनवाई सचिवालय के गलियारों में नहीं हो रही थी। ममता नेगी विगत कई वर्षों से चमोली के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का अनुकरणीय कार्य कर रही हैं।

याचिका के अनुसार, वर्ष 2022-23 में चमोली जिले की 439 बालिकाओं ने विषम परिस्थितियों के बावजूद इंटरमीडिएट (12वीं) की परीक्षा ससम्मान उत्तीर्ण की थी। नंदा गौरा योजना के स्थापित नियमों और गाइडलाइंस के मुताबिक, इन सभी छात्राओं को आगे की उच्च शिक्षा (Higher Education) जारी रखने के लिए सरकार की ओर से ₹51,000 की वित्तीय प्रोत्साहन राशि दी जानी थी।

याचिकाकर्ता का पक्ष:

“यह केवल ₹51,000 का मामला नहीं है, बल्कि यह उन गरीब बेटियों के सपनों की कीमत है जो पैसों के अभाव में कॉलेज की दहलीज पर कदम रखने से कतरा रही हैं। सभी बालिकाओं ने साल 2023 में ही अपने दस्तावेज और मानक पूरे कर स्कूल के माध्यम से संबंधित विभाग को भेज दिए थे। प्रशासन के चक्कर काट-काटकर थकने के बाद हमें न्यायपालिका की शरण लेनी पड़ी।”

फाइलों में दबा 2.45 करोड़ का बजट: विभाग ने मांगी राशि, सरकार ने साधी चुप्पी

इस मामले का सबसे स्याह पहलू यह है कि विभागीय स्तर पर लापरवाही नहीं थी, बल्कि शासन स्तर पर बजट की फाइल को दबाकर रखा गया है। याचिका में प्रस्तुत दस्तावेजों से यह साफ हुआ है कि चमोली के संबंधित विभाग ने पात्र 439 छात्राओं को भुगतान करने के लिए राज्य सरकार से कुल ₹2 करोड़ 45 लाख के बजट की मांग की थी।

विभाग ने इसके लिए बकायदा पत्राचार किया और सरकार को अवगत कराया कि यदि यह राशि जारी नहीं की गई, तो बालिकाओं की उच्च शिक्षा बाधित हो जाएगी। इसके बावजूद, शासन स्तर से न तो इस राशि को स्वीकृत किया गया और न ही कोई वैकल्पिक बजटीय व्यवस्था की गई। यह स्थिति तब है जब सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है।

उच्च शिक्षा का संकट: कैसे संवरेगा बेटियों का उज्ज्वल भविष्य?

पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां वैसे ही चुनौतीपूर्ण हैं, और ऐसे में आर्थिक तंगी बेटियों की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन जाती है। इंटरमीडिएट पास करने के बाद कॉलेज की फीस, किताबों का खर्च और हॉस्टल या आवागमन का व्यय वहन करना इन गरीब परिवारों के लिए असंभव सा होता है। सरकार की नंदा गौरा योजना इसी खाई को पाटने के लिए बनाई गई थी ताकि ₹51,000 की एकमुश्त सहायता से छात्राएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और उच्च शिक्षा हासिल कर सकें।

लेकिन चमोली की इन 439 छात्राओं के मामले में प्रशासनिक उदासीनता ने उनके उज्ज्वल भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। कई छात्राओं का दाखिला पैसे न होने के कारण छूटने की कगार पर है। जनहित याचिका में माननीय अदालत से पुरजोर मांग की गई है कि बेटियों के हित को सर्वोपरि रखते हुए राज्य सरकार को तत्काल प्रभाव से बजट जारी करने के सख्त निर्देश दिए जाएं।

अदालत के हस्तक्षेप से जगी न्याय की उम्मीद

उत्तराखंड हाईकोर्ट का इस मामले में कड़ा रुख अपनाना इस बात का संकेत है कि अब सरकार इस संवेदनशील मुद्दे से पल्ला नहीं झाड़ सकती। मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा संबंधित विभागों से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब करना और 29 जून की त्वरित तारीख तय करना यह दर्शाता है कि अदालत बालिकाओं के मौलिक और शैक्षणिक अधिकारों को लेकर कितनी गंभीर है।

अब पूरी राज्य की नजरें देहरादून के प्रशासनिक गलियारों पर टिकी हैं कि क्या सरकार अदालत की फटकार के बाद नींद से जागेगी और चमोली की इन बेटियों को उनके हक की नंदा गौरा योजना की राशि समय रहते प्रदान करेगी? यदि ऐसा नहीं होता है, तो आगामी 29 जून को सरकार को न्यायालय के भीतर भारी असहजता का सामना करना पड़ सकता है।

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