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Uttarakhand: किच्छा नगर पालिका चुनाव में देरी को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, जानिए पूरा मामला

The Hill India News
Last updated: March 13, 2026 11:49 am
The Hill India News
Published: March 13, 2026
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नैनीताल/रुद्रपुर: उत्तराखंड में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर चल रही खींचतान अब कानूनी चौखट पर और भी तीखी हो गई है। ऊधमसिंह नगर जिले की महत्वपूर्ण किच्छा नगर पालिका में लंबे समय से लंबित चुनाव और वहां प्रशासक की तैनाती को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ में हुई सुनवाई के दौरान सरकार की कार्यप्रणाली और चुनाव टालने की मंशा पर याचिकाकर्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं।

Contents
डेढ़ साल से प्रशासक के भरोसे किच्छा: लोकतंत्र पर सवाल?विवाद की जड़: आरक्षण और सीमा विस्तार का पेंचहाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सरकारी सुस्तीराजनीतिक गलियारों में हलचल

डेढ़ साल से प्रशासक के भरोसे किच्छा: लोकतंत्र पर सवाल?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता नईमूल हुसैन और अन्य के अधिवक्ताओं ने कोर्ट को अवगत कराया कि किच्छा नगर पालिका में पिछले डेढ़ साल से कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है। वर्तमान में नगर पालिका का पूरा कामकाज प्रशासक के माध्यम से चलाया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रदेश की लगभग सभी नगर पालिकाओं में चुनावी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है या गतिमान है, लेकिन किच्छा को जानबूझकर अधर में लटकाया गया है। यह न केवल संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन है, बल्कि स्थानीय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी है।


विवाद की जड़: आरक्षण और सीमा विस्तार का पेंच

किच्छा नगर पालिका चुनाव में देरी के पीछे सबसे बड़ा कारण आरक्षण निर्धारण और वार्डों के परिसीमन को माना जा रहा है। मामले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • अधिसूचना में किच्छा की अनदेखी: 14 दिसंबर 2024 को राज्य सरकार ने प्रदेश के 43 नगर पालिका अध्यक्ष पदों के लिए आरक्षण की प्रस्तावित अधिसूचना जारी की थी। इस सूची में किच्छा नगर पालिका का नाम गायब था, जिससे स्थानीय निवासियों में संशय पैदा हुआ।

  • रोस्टर प्रणाली का उल्लंघन: नियमानुसार, पालिका अध्यक्ष के पदों का निर्धारण उपलब्ध कुल सीटों के आधार पर रोस्टर के अनुसार होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकार ने केवल 43 पदों के आधार पर ही रोस्टर तय किया, जो प्रक्रियात्मक त्रुटि है।

  • गांवों को शामिल करने का विवाद: पूर्व में सरकार ने किच्छा नगर पालिका के कुछ वार्डों को पास के गांवों में शामिल करने का निर्णय लिया था, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। बाद में सरकार ने पुनः इन क्षेत्रों को नगर पालिका में शामिल तो कर लिया, लेकिन चुनाव कराने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए।


हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सरकारी सुस्ती

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व की सुनवाई में नैनीताल हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि सरकार किच्छा नगर पालिका का आरक्षण (Reservation) जल्द से जल्द तय करे। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अब जबकि आरक्षण की स्थिति स्पष्ट हो चुकी है, तब भी सरकार चुनाव की तारीखों की घोषणा करने से बच रही है।

“जब प्रदेश की अन्य पालिकाओं में चुनाव प्रक्रिया संपन्न हो सकती है, तो किच्छा के साथ सौतेला व्यवहार क्यों? आरक्षण तय होने के बाद चुनाव टालने का कोई भी कानूनी आधार शेष नहीं रह जाता।” – याचिकाकर्ता पक्ष


राजनीतिक गलियारों में हलचल

किच्छा नगर पालिका का मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक भी होता जा रहा है। जानकारों का मानना है कि वार्डों के पुनर्गठन और आरक्षण की गणित में फिट न बैठने के कारण सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शह-मात का खेल चल रहा है। प्रशासक शासन के चलते विकास कार्यों की गति और जनता की शिकायतों के निस्तारण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सरकार से इस पर स्पष्ट जवाब मांगा है। यदि सरकार जल्द ही किच्छा नगर पालिका चुनाव के लिए अधिसूचना जारी नहीं करती है, तो कोर्ट इस मामले में कड़े निर्देश पारित कर सकता है। किच्छा की जनता अब इस उम्मीद में है कि उन्हें जल्द ही अपना निर्वाचित नगर निकाय प्रतिनिधि मिलेगा।

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