
देहरादून: संसद में महिला आरक्षण से जुड़े नारी शक्ति वंदन बिल के बाद देशभर में परिसीमन (Delimitation) को लेकर चर्चा फिर से तेज हो गई है। इसी बीच उत्तराखंड में भी इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। बदरीनाथ विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला ने राज्य में परिसीमन को ‘सेवन सिस्टर्स’ यानी पूर्वोत्तर के राज्यों की तर्ज पर लागू करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करना उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और भौगोलिक रूप से विषम राज्य के साथ न्याय नहीं करेगा।
लखपत बुटोला ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां बेहद कठिन हैं। वह स्वयं सीमांत जिले चमोली की बदरीनाथ विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा हुआ क्षेत्र है। उन्होंने इस क्षेत्र के लोगों को देश की “दूसरी रक्षा पंक्ति” बताते हुए कहा कि यहां के नागरिक न केवल सीमाओं की सुरक्षा में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाते हैं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से पूरे देश को लाभ पहुंचाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी विधानसभा का क्षेत्रफल करीब 4043 वर्ग किलोमीटर है, जो कि दिल्ली के कुल क्षेत्रफल (1484 वर्ग किलोमीटर) से भी कहीं अधिक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जहां एक ओर इतनी विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल वाली विधानसभा में केवल एक विधायक है, वहीं दूसरी ओर हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल में कई विधायक हैं। इस असंतुलन को दूर करने के लिए उन्होंने परिसीमन में क्षेत्रफल और भौगोलिक परिस्थितियों को भी प्रमुख आधार बनाने की मांग की।
बुटोला ने यह भी कहा कि वर्ष 2007 के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता जा रहा है। पहले जहां इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व लगभग 58 प्रतिशत था, वह घटकर अब करीब 48 प्रतिशत रह गया है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में यह घटकर 28 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जिससे पहाड़ के मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का गठन ही विशेष भौगोलिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय असंतुलन को ध्यान में रखते हुए किया गया था। अगर परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर होगा, तो पहाड़ी क्षेत्रों की आवाज कमजोर हो जाएगी और राज्य की मूल अवधारणा प्रभावित होगी। उन्होंने राज्य सरकार पर भी इस मुद्दे को लेकर निष्क्रिय रहने का आरोप लगाया।
लखपत बुटोला ने बताया कि वह इस संबंध में पहले ही विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिख चुके हैं और चाहते हैं कि राज्य सरकार केंद्र को प्रस्ताव भेजे। उनका मानना है कि परिसीमन केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए राज्य की ओर से ठोस प्रस्ताव भेजना जरूरी है।
उन्होंने ‘सेवन सिस्टर्स’ मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्वोत्तर के राज्य—अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा—में भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। इसी तरह उत्तराखंड में भी क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है। एक ओर जहां कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर पहाड़ी क्षेत्रों के हितों की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार और केंद्र की प्रतिक्रिया पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड में परिसीमन को लेकर बहस अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह क्षेत्रीय असंतुलन, प्रतिनिधित्व और राज्य की मूल पहचान से जुड़ा एक बड़ा राजनीतिक विषय बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस पर और तेज राजनीतिक हलचल देखने को मिल सकती है।



